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कलियर दरगाह गोलक प्रकरण में ‘बहाली’ ने बढ़ाए सवाल,, कथित अनियमितता के आरोपी फिर सेवा में—जांच की फाइल ठंडी, क्या पारदर्शिता पर डाल पर्दा?,, हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंचे शिकायतकर्ता, प्रशासनिक तंत्र पर उठे गंभीर प्रश्न,, पारदर्शिता ही समाधान,,  नये साहब/स्थानीय बड़े साहब…..देहरादून कनेक्शन— भ्रष्टाचार की फाइल की दिशा बदली?,, “खिलाड़ी साहबो” की भूमिका पर भी चर्चाएं,, धामी सरकार की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी नीति की प्री-परीक्षा

इन्तजार रजा हरिद्वार- कलियर दरगाह गोलक प्रकरण में ‘बहाली’ ने बढ़ाए सवाल,,

कथित अनियमितता के आरोपी फिर सेवा में—जांच की फाइल ठंडी, क्या पारदर्शिता पर डाल पर्दा?,,

हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंचे शिकायतकर्ता, प्रशासनिक तंत्र पर उठे गंभीर प्रश्न,,

पारदर्शिता ही समाधान,,  नये साहब/स्थानीय बड़े साहब…..देहरादून कनेक्शन— भ्रष्टाचार की फाइल की दिशा बदली?,,

“खिलाड़ी साहबो” की भूमिका पर भी चर्चाएं,,

धामी सरकार की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी नीति की प्री-परीक्षा

की गोलक गिनती से जुड़ा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। जिस प्रकरण में कथित वित्तीय अनियमितता के आरोपों की जांच चल रही थी, उसी मामले में संबंधित कर्मियों की बहाली ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक संदिग्ध बना दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या जांच पूरी हो चुकी है, या फिर फाइलों की दिशा बदल दी गई है?

बहाली के फैसले ने उठाए नए प्रश्न

सूत्रों के अनुसार, गोलक गिनती के दौरान कथित अनियमितता के आरोप में जिन कर्मचारियों के खिलाफ जांच प्रारंभ की गई थी, उन्हें पुनः कार्यभार सौंप दिया गया है। आधिकारिक स्तर पर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या उन्हें क्लीन चिट दी गई है, या जांच लंबित रहते हुए ही बहाली की गई है।

यदि आरोप निराधार थे, तो विस्तृत जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
और यदि जांच अधूरी है, तो बहाली की इतनी जल्दबाजी क्यों?

यह भी चर्चा में है कि दरगाह प्रशासन में हालिया नेतृत्व परिवर्तन के बाद फाइल की दिशा बदली। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

“खिलाड़ी साहब” की भूमिका पर भी चर्चाएं

नये साहब और रुड़की क्षेत्र के एक प्रभावशाली साहब, इन दोनों साहबों को स्थानीय स्तर पर “खिलाड़ी साहब” के नाम से संबोधित किया जाना जरूरी है, की कथित भूमिका को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल जरूर उठ रहे हैं कि क्या प्रशासनिक संरक्षण ने जांच की धार को कुंद कर दिया?

यह उल्लेखनीय है कि इस पूरे प्रकरण में अब तक न तो स्पष्ट आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ है और न ही विस्तृत विभागीय निष्कर्ष सार्वजनिक किए गए हैं।

फाइल ‘धड़ाम’ या प्रक्रिया पूरी?

प्रकरण से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, गोलक गिनती के दौरान कथित रूप से धनराशि जेब में रखने की घटना पर स्पष्टीकरण तलब किया गया था। जवाब को असंतोषजनक बताते हुए रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजी गई थी।

लेकिन उसके बाद घटनाक्रम किस दिशा में बढ़ा—इस पर प्रशासनिक स्तर पर चुप्पी है।

क्या विभागीय जांच पूरी हो गई?
क्या संबंधित अधिकारियों ने लिखित क्लीन चिट दी?
या फिर फाइल को तकनीकी आधार पर बंद कर दिया गया?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर अब तक सामने नहीं आया है।

शिकायतकर्ता और माननीय हाईकोर्ट पहुंचे

शिकायतकर्ता का अगला कदम—हाईकोर्ट
इस मामले को लगातार उठाने वाले अधिवक्ता अरुण कुमार भदौरिया ने संकेत दिए हैं कि वे इस पूरे घटनाक्रम को न्यायिक चुनौती देने की तैयारी में हैं। सूत्रों के अनुसार, मामला जल्द ही उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में पहुंच सकता है।
यदि ऐसा होता है, तो देहरादून से लेकर हरिद्वार तक की प्रशासनिक प्रक्रिया न्यायिक कसौटी पर परखी जाएगी

इस पूरे प्रकरण में सक्रिय भूमिका निभाने वाले अधिवक्ता ने संकेत दिए हैं कि वे मामले को अब उच्च न्यायालय में चुनौती देने जा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष है तो उसे सार्वजनिक किया जाए, और यदि अनियमितता पाई गई है तो आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

उत्तराखंड की न्यायिक व्यवस्था में अब इस मामले की अगली कड़ी देखी जा सकती है, क्योंकि मामला संभवतः की दहलीज तक पहुंच सकता है।

आस्था बनाम प्रशासन

और क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए कलियर दरगाह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विश्वास का केंद्र है। गोलक में आने वाली राशि आम श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि गिनती प्रक्रिया पर सवाल उठें और फिर आरोपियों की बहाली हो जाए, तो यह विश्वास पर सीधा असर डालता है।

कौन जिम्मेदार?. आरोप-प्रत्यारोप में दबी सच्चाई?

इस पूरे प्रकरण में सुपरवाइजर और तहसील कर्मियों के बीच कथित तौर पर आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति बनी रही। सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
क्या गोलक गिनती के दौरान प्रक्रियात्मक चूक हुई?
क्या सीसीटीवी फुटेज की जांच हुई?
क्या गवाहों के बयान विधिवत दर्ज हुए?
या फिर फाइल को तकनीकी आधार पर बंद कर दिया गया?

अब स्थिति यह बन गई है कि आरोप एक-दूसरे पर लगाए जा रहे हैं। सुपरवाइजर और तहसील कर्मियों के बीच परस्पर आरोप-प्रत्यारोप की चर्चा है। लेकिन अंतिम सत्य क्या है?

क्या किसी को औपचारिक रूप से दोषी ठहराया गया?
या फिर पूरी फाइल को ‘क्लीन चिट’ के साथ बंद कर दिया गया?

यदि क्लीन चिट दी गई है, तो सार्वजनिक आदेश जारी क्यों नहीं हुआ?
यदि जांच शेष है, तो बहाली का औचित्य क्या है?

पारदर्शिता ही समाधान,,  नये साहब/स्थानीय बड़े साहब…..देहरादून कनेक्शन— भ्रष्टाचार की फाइल की दिशा बदली?

सूत्रों के अनुसार, दरगाह प्रशासन में हालिया फेरबदल के बाद देहरादून में बैठे एक वरिष्ठ अधिकारी की सक्रियता बढ़ी। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि फाइल की समीक्षा देहरादून स्तर पर हुई और उसके बाद बहाली का रास्ता साफ हुआ।
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या स्थानीय जांच रिपोर्ट पर बाहरी प्रशासनिक प्रभाव पड़ा?
यदि सब कुछ नियमसम्मत था, तो पारदर्शी प्रेस ब्रीफिंग क्यों नहीं?
यदि कोई दबाव नहीं था, तो आदेशों का आधार सार्वजनिक क्यों नहीं?

दरगाह प्रशासन के नए नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करें। आधिकारिक प्रेस नोट, जांच रिपोर्ट और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए—तभी संदेह की परतें हटेंगी।

अन्यथा, यह धारणा मजबूत होती जाएगी कि सच कहीं फाइलों के बोझ तले दब गया है।

अब निगाहें न्यायालय और जिला प्रशासन पर हैं। क्या जांच की पूरी कहानी सामने आएगी? या यह मामला भी प्रशासनिक भूलभुलैया में उलझा रहेगा?

जनता का सवाल साफ है—
क्या आस्था की गोलक सुरक्षित है, या व्यवस्था पर भरोसा डगमगा गया?

नए साहब की अग्निपरीक्षा देहरादून से ऑपरेट कर रहे नये साहब के लिए यह पहला बड़ा परीक्षण माना जा रहा था। क्या वे पारदर्शिता की मिसाल पेश करेंगे?
क्या जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होगी?
क्या जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दब जाएगा?
अब पूरा मामला तीन शहरों—कलियर, रुड़की और देहरादून—के प्रशासनिक गलियारों में गूंज रहा है।
जनता का सवाल सीधा है—
क्या बहाली से सच दब गया, या सच सामने आने वाला है?
आस्था की गोलक पर उठे सवालों का जवाब अब शब्दों से नहीं, दस्तावेज़ों से देना होगा।

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