सीडीओ हरिद्वार आकांक्षा कोण्डे की पहल से ‘खुशी समूह’ की खिली किस्मत,, ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना ने हरचंदपुर की महिलाओं को बनाया लखपति दीदी,, गेंदे की खुशबू से सजी समृद्धि की राह, छह माह में ₹4.21 लाख का शुद्ध लाभ

इन्तजार रजा हरिद्वार- सीडीओ हरिद्वार आकांक्षा कोण्डे की पहल से ‘खुशी समूह’ की खिली किस्मत,,
ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना ने हरचंदपुर की महिलाओं को बनाया लखपति दीदी,,
गेंदे की खुशबू से सजी समृद्धि की राह, छह माह में ₹4.21 लाख का शुद्ध लाभ

हरिद्वार, 18 जुलाई 2025
मुख्य विकास अधिकारी हरिद्वार श्रीमती आकांक्षा कोण्डे के निर्देशन और प्रेरणा से जनपद हरिद्वार में ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में एक नई आशा और आर्थिक स्वतंत्रता की रोशनी जगाई है। इसी प्रयास का ज्वलंत उदाहरण है नारसन ब्लॉक के हरचंदपुर गांव का ‘खुशी स्वयं सहायता समूह’, जिसने गेंदे की फूलों की खेती को व्यवसाय बनाकर केवल छह माह में ₹4.21 लाख का शुद्ध लाभ अर्जित किया और “लखपति दीदी” योजना को ज़मीन पर साकार किया।
यह सफलता महज आंकड़े नहीं, बल्कि उन सैकड़ों महिलाओं की मेहनत, धैर्य और समर्पण की गाथा है, जिन्हें पहले कोई पूछता भी नहीं था। और अब, वे न सिर्फ अपने घरों की जिम्मेदारियों को संभाल रही हैं, बल्कि एक सफल व्यावसायिक इकाई चला रही हैं।
आंचल देवी के नेतृत्व में ‘खुशी समूह’ ने रचा इतिहास
16 जनवरी, 2025 को गठित ‘खुशी स्वयं सहायता समूह’ की अध्यक्षा श्रीमती आंचल देवी हैं। पहले समूह की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी और फूलों की खेती केवल सीमित स्तर पर होती थी। तभी एनआरएलएम (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) की टीम गांव पहुंची और महिलाओं को समूह में संगठित होने, प्रशिक्षण प्राप्त करने और व्यावसायिक सोच अपनाने के लिए प्रेरित किया।
समूह को ‘ग्रामोत्थान (रीप)’ परियोजना से तकनीकी और वित्तीय सहायता मिली, जिससे उनकी फूलों की खेती को व्यवसायिक रूप मिल सका। उन्हें वैज्ञानिक खेती, विपणन, मूल्य निर्धारण और बचत के गुर सिखाए गए।
सीडीओ की देखरेख में तैयार हुआ 10 लाख का विस्तृत प्लान
मुख्य विकास अधिकारी आकांक्षा कोण्डे की सीधी निगरानी और मार्गदर्शन में समूह को ग्राम मुंडलाना की ‘श्री राधे कृष्णा बहुद्देश्यीय स्वायत्त सहकारिता (सीएलएफ)’ से जोड़ा गया। वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए एक सशक्त 10 लाख रुपये की व्यावसायिक योजना तैयार की गई:
- ₹3 लाख बैंक ऋण के रूप में
- ₹1 लाख समूह द्वारा स्वयं का अंशदान
- ₹6 लाख परियोजना द्वारा अनुदान के रूप में
इस योजना से समूह को वह पूंजी प्राप्त हुई जिसकी उसे वर्षों से दरकार थी। अब उनके पास बीज, खाद, श्रमिक, भूमि किराया और परिवहन की लागतें उठाने की पर्याप्त व्यवस्था है।
गेंदे की खेती से ₹9 लाख की बिक्री, ₹4.21 लाख का लाभ
‘खुशी समूह’ ने 9 बीघा जमीन पर गेंदे के फूलों की खेती की और पिछले छह महीनों में बेहतरीन परिणाम सामने आए:
- 20,000 पौधे खरीदे गए ₹12 प्रति पौधे की दर से = ₹2,40,000 की लागत
- 30,000 किलो फूल बेचे ₹30 प्रति किलो = ₹9,00,000 कुल बिक्री
- शुद्ध लाभ: ₹4,21,800
यह सफलता ना केवल आर्थिक रूप से गौरव की बात है, बल्कि यह ‘लखपति दीदी’ योजना के धरातल पर कार्यान्वयन का ठोस प्रमाण भी है।
सीडीओ हरिद्वार आकांक्षा कोण्डे: “यह सिर्फ शुरुआत है”
मुख्य विकास अधिकारी आकांक्षा कोण्डे ने समूह की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा:

“हमारी प्राथमिकता है कि हर गांव की महिला आर्थिक रूप से सशक्त हो, आत्मनिर्भर बने और अपने परिवार की रीढ़ बन सके। खुशी समूह की सफलता दिखाती है कि जब सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और पूंजी मिले, तो महिलाएं किसी भी क्षेत्र में कमाल कर सकती हैं। यह केवल एक मॉडल नहीं, बल्कि पूरे जिले के लिए एक प्रेरणा है।”
अब महिलाएं हैं बैंक, बाजार और समाज की अगुआ
शुरुआत में जिन महिलाओं को अपने ही गांव में व्यवसाय करना मुश्किल लगता था, आज वे पूरे ब्लॉक में अपनी पहचान बना चुकी हैं। समूह की अध्यक्ष आंचल देवी ने बताया:
“पहले हमें खुद पर भी यकीन नहीं था। लेकिन सीडीओ मैडम और उनकी टीम के सहयोग से आज हम अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, घर चला रहे हैं और अपने हौसले से नई उड़ान भर रहे हैं।”
इस बदलाव की सबसे खास बात यह है कि महिलाएं अब सिर्फ श्रमिक नहीं रहीं, वे फैसले ले रही हैं, बजट बना रही हैं और बिक्री के आंकड़े पढ़ रही हैं।
गांव-गांव फैलेगा यह मॉडल
ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना की योजना है कि इसी मॉडल को अन्य विकासखंडों के अल्ट्रा पूवर हाउसहोल्ड्स तक पहुंचाया जाए। इससे पहले जो समूह केवल बचत तक सीमित थे, अब वो व्यावसायिक इकाइयों में बदल रहे हैं। नारसन ब्लॉक के बाद रूहलकी, भगवानपुर, लक्सर और बहादराबाद में भी इसी तरह की परियोजनाएं शुरू की जाएंगी।
फूलों से महकी राह, उम्मीदों से रोशन भविष्य
‘खुशी स्वयं सहायता समूह’ की यह कहानी सिर्फ खेती की नहीं, बल्कि सपनों की फसल उगाने की कहानी है। यह दिखाता है कि सरकारी योजनाएं जब सही इरादों और नेतृत्व के साथ मिलती हैं, तो वे सिर्फ कागजों की शोभा नहीं बनतीं, बल्कि हकीकत में बदलाव का जरिया बनती हैं।



