हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग,, क्या धार्मिक आस्था बनाम संवैधानिक अधिकारों की बहस में धामी सरकार,, 1916 के बायलॉज से लेकर 2026 की राजनीति तक गरमाया मुद्दा

इन्तजार रजा हरिद्वार- हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग,,
क्या धार्मिक आस्था बनाम संवैधानिक अधिकारों की बहस में धामी सरकार,,
1916 के बायलॉज से लेकर 2026 की राजनीति तक गरमाया मुद्दा

विश्व प्रसिद्ध हरिद्वार कुंभ मेला एक बार फिर धार्मिक आस्था, कानून और राजनीति के संगम पर खड़ा नजर आ रहा है। प्रस्तावित कुंभ मेला क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग ने उत्तराखंड की राजनीति और संत समाज में नई बहस छेड़ दी है। गंगा सभा और कुछ प्रमुख संतों की ओर से उठाई गई इस मांग के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बयान दिया है कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है और सभी पहलुओं को देखते हुए निर्णय लिया जाएगा।
हरिद्वार को सनातन परंपरा में मोक्षदायिनी नगरी माना जाता है। गंगा नदी, हर-की-पौड़ी और कुंभ मेला न केवल धार्मिक आयोजन हैं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी हैं। ऐसे में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग को संत समाज ‘धार्मिक पहचान की रक्षा’ से जोड़कर देख रहा है, जबकि विपक्ष और मानवाधिकार से जुड़े लोग इसे संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ बता रहे हैं।
संत समाज की मांगः ‘आस्था से कोई समझौता नहीं’
गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम का कहना है कि गंगा सनातन धर्म की जीवनरेखा है और कुंभ मेला पूर्णतः धार्मिक आयोजन है। उन्होंने कहा कि हर-की-पौड़ी सहित कुंभ क्षेत्र के सभी घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जानी चाहिए। उनके अनुसार यह मांग नई नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और कानूनी आधार पर टिकी हुई है।
नितिन गौतम का तर्क है कि वर्ष 1916 में गंगा सभा और तीर्थ पुरोहितों की मांग पर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में म्युनिसिपल बायलॉज बनाए थे। इन बायलॉज के तहत हर-की-पौड़ी क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का प्रावधान किया गया था, जो आज भी प्रभावी बताए जाते हैं। संत समाज का मानना है कि इन नियमों को फिर से सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
कई संतों का कहना है कि कुंभ के दौरान श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक भावनाएं सर्वोपरि होती हैं। उनका तर्क है कि गैर-हिंदुओं की मौजूदगी से कभी-कभी धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन होता है, जिससे श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत होती हैं।
विदेशी श्रद्धालु और संस्कृति का सवाल
दूसरी ओर, हरिद्वार कुंभ हमेशा से केवल हिंदू श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं रहा है। कुंभ के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक और शोधकर्ता भी यहां आते हैं, जो भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और योग-दर्शन को समझने में रुचि रखते हैं। कई विदेशी साधु-संत भी सनातन परंपरा को अपनाकर कुंभ में भाग लेते रहे हैं।
धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि सनातन धर्म की पहचान उसकी उदारता और समावेशी दृष्टिकोण रही है। ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध लगाने से भारत की सांस्कृतिक छवि पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कोई गैर-हिंदू गंगा में आस्था रखता है या भारतीय संस्कृति को समझना चाहता है, तो उसे कुंभ क्षेत्र से बाहर रखना कितना उचित होगा।
राजनीति और संविधान के बीच धामी सरकार
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयान के बाद यह साफ हो गया है कि सरकार इस मुद्दे को हल्के में नहीं ले रही है। भाजपा के कुछ नेता इसे ‘धार्मिक आस्था की रक्षा’ से जोड़कर समर्थन दे रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इसे चुनावी राजनीति और जनता का ध्यान भटकाने का प्रयास बता रहे हैं।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र में धर्म के आधार पर प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हो सकता है। उनका तर्क है कि यदि कुंभ मेला राज्य द्वारा आयोजित और प्रबंधित किया जाता है, तो वह केवल एक धर्म तक सीमित नहीं रह सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार 1916 के बायलॉज की वर्तमान में वैधता और उनकी संवैधानिक समीक्षा एक बड़ा सवाल है। यदि सरकार इन नियमों को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह मामला अदालत तक जा सकता है।
आस्था, कानून और भविष्य की राह
हरिद्वार कुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का फैसला केवल धार्मिक भावना के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों, अंतरराष्ट्रीय छवि और सामाजिक समरसता को ध्यान में रखकर लिया जाना होगा।
फिलहाल यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति में गर्माया हुआ है। संत समाज अपने रुख पर अडिग है, विपक्ष सवाल उठा रहा है और धामी सरकार संतुलन साधने की कोशिश में नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार आस्था और संविधान के बीच किस तरह का रास्ता चुनती है, और क्या 2026 का कुंभ मेला किसी ऐतिहासिक फैसले का गवाह बनेगा।



