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डीएम प्रतीक जैन की सक्रिय पहल से मिली बड़ी सफलता,, सिरोबगड़ भूस्खलन ट्रीटमेंट को केंद्र की मंजूरी, 95.12 करोड़ की परियोजना स्वीकृत,, डीएम के नेतृत्व में केदारनाथ–बद्रीनाथ यात्रा होगी सुरक्षित, स्थानीय लोगों को मिलेगी राहत

इन्तजार रजा हरिद्वार- डीएम प्रतीक जैन की सक्रिय पहल से मिली बड़ी सफलता,,

सिरोबगड़ भूस्खलन ट्रीटमेंट को केंद्र की मंजूरी, 95.12 करोड़ की परियोजना स्वीकृत,,

डीएम के नेतृत्व में केदारनाथ–बद्रीनाथ यात्रा होगी सुरक्षित, स्थानीय लोगों को मिलेगी राहत

रुद्रप्रयाग।
जिलाधिकारी प्रतीक जैन के नेतृत्व में जिला प्रशासन रुद्रप्रयाग के अथक प्रयासों का बड़ा परिणाम सामने आया है। राष्ट्रीय राजमार्ग-07 (पूर्व में एनएच-58) पर स्थित सिरोबगड़ क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही भूस्खलन की गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए भारत सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने भूस्खलन ट्रीटमेंट कार्य को स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह महत्वपूर्ण परियोजना वार्षिक योजना 2025-26 के अंतर्गत स्वीकृत की गई है, जिसकी कुल लागत 95.12 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है।

सिरोबगड़ भूस्खलन क्षेत्र लंबे समय से चारधाम यात्रा और स्थानीय जनजीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था। बारिश के मौसम में यहां बार-बार मार्ग अवरुद्ध हो जाता था, जिससे श्रद्धालुओं को घंटों नहीं बल्कि कई-कई दिनों तक फंसे रहना पड़ता था। जिलाधिकारी प्रतीक जैन ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए इसे प्राथमिकता में शामिल किया और संबंधित विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए कि इसका स्थायी समाधान केंद्र सरकार के सहयोग से कराया जाए।

डीएम प्रतीक जैन की मॉनिटरिंग से मजबूत हुआ प्रस्ताव

जिलाधिकारी प्रतीक जैन के निर्देश पर सिरोबगड़ क्षेत्र का कई बार स्थलीय निरीक्षण कराया गया। तकनीकी विशेषज्ञों की टीम से भू-वैज्ञानिक परीक्षण कराए गए और भूस्खलन की वास्तविक वजहों का गहन अध्ययन किया गया। इसके बाद राज्य लोक निर्माण विभाग के माध्यम से एक विस्तृत, तकनीकी और व्यवहारिक प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा गया।

प्रारंभ में राज्य लोक निर्माण विभाग द्वारा 96.11 करोड़ रुपये की लागत का प्रस्ताव तैयार किया गया था। मंत्रालय स्तर पर परीक्षण और आवश्यक संशोधन के बाद इस परियोजना को 95.12 करोड़ रुपये की लागत के साथ स्वीकृति दी गई। अधिकारियों का कहना है कि डीएम प्रतीक जैन द्वारा लगातार फॉलोअप, पत्राचार और समन्वय न किया जाता तो यह स्वीकृति इतनी शीघ्रता से संभव नहीं हो पाती।

आधुनिक तकनीक से होगा भूस्खलन का स्थायी उपचार

स्वीकृत परियोजना के अंतर्गत सिरोबगड़ में चेनाज 350.767 से 350.938 किलोमीटर तक भूस्खलन ट्रीटमेंट कार्य किया जाएगा। इस कार्य में अत्याधुनिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, ताकि भविष्य में भूस्खलन की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके।

परियोजना के तहत पहाड़ी ढलानों पर मौजूद ढीली चट्टानों की स्केलिंग,
हाई टेन्साइल केबल नेट,
डीटी मेष (DT Mesh)
और रॉक एंकर के माध्यम से ढलानों को मजबूती प्रदान की जाएगी। इन तकनीकों से चट्टानों के अचानक खिसकने की संभावना काफी हद तक समाप्त हो जाएगी और सड़क लंबे समय तक सुरक्षित बनी रहेगी।

यह संपूर्ण कार्य ईपीसी (EPC – Engineering, Procurement and Construction) आधार पर कराया जाएगा, जिससे कार्य की गुणवत्ता, समयबद्धता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

चारधाम यात्रा और स्थानीय लोगों को मिलेगी बड़ी राहत

सिरोबगड़ भूस्खलन ट्रीटमेंट कार्य की स्वीकृति से श्री केदारनाथ धाम और श्री बद्रीनाथ धाम की यात्रा पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और सुगम होगी। यह मार्ग चारधाम यात्रा की रीढ़ माना जाता है और इसके सुचारु संचालन से लाखों श्रद्धालुओं को लाभ मिलेगा।

इसके साथ ही रुद्रप्रयाग जिले के स्थानीय निवासियों, व्यापारियों, वाहन चालकों, एंबुलेंस सेवाओं और आपातकालीन व्यवस्थाओं को भी बड़ी राहत मिलेगी। स्कूल, अस्पताल, बाजार और अन्य आवश्यक सेवाओं तक निर्बाध पहुंच सुनिश्चित होगी।

डीएम प्रतीक जैन का स्पष्ट संदेश

जिलाधिकारी प्रतीक जैन ने परियोजना की स्वीकृति पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि जनसुरक्षा और जनसुविधा जिला प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि सिरोबगड़ भूस्खलन ट्रीटमेंट कार्य से न केवल राष्ट्रीय राजमार्ग अधिक सुरक्षित होगा, बल्कि चारधाम यात्रा के दौरान आने वाली चुनौतियों में भी बड़ी कमी आएगी।

डीएम ने यह भी कहा कि प्रशासन भविष्य में भी जिले के अन्य संवेदनशील और आपदा संभावित क्षेत्रों की पहचान कर समय रहते आवश्यक कदम उठाएगा, ताकि किसी भी आपदा से जनहानि और अव्यवस्था को रोका जा सके।

स्थायी समाधान की दिशा में ऐतिहासिक कदम

कुल मिलाकर डीएम प्रतीक जैन के नेतृत्व में सिरोबगड़ भूस्खलन ट्रीटमेंट कार्य की स्वीकृति रुद्रप्रयाग जिले के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है। यह परियोजना न केवल एक लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान है, बल्कि यह दर्शाती है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, तकनीकी दक्षता और केंद्र–राज्य समन्वय से जनहित के बड़े कार्य सफलतापूर्वक पूरे किए जा सकते हैं।

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