1947-48 में पाकिस्तान का नाजायज़ कब्ज़ा, 78 हज़ार वर्ग किलोमीटर आज भी बाहर,, 1994 का संसद प्रस्ताव केवल काग़ज़ नहीं, हर सरकार का संवैधानिक दायित्व,, नए भारत की हुंकार: हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रपति–प्रधानमंत्री को लिखा पत्र

इन्तजार रजा हरिद्वार- 1947-48 में पाकिस्तान का नाजायज़ कब्ज़ा, 78 हज़ार वर्ग किलोमीटर आज भी बाहर,,
1994 का संसद प्रस्ताव केवल काग़ज़ नहीं, हर सरकार का संवैधानिक दायित्व,,
नए भारत की हुंकार: हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रपति–प्रधानमंत्री को लिखा पत्र


हरिद्वार।
सन 1947-48 में कबायली हमलावरों और पाकिस्तान की सेना की प्रत्यक्ष सहायता से भारत के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर की लगभग 78,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर पाकिस्तान द्वारा नाजायज़ कब्ज़ा कर लिया गया था। यह ऐतिहासिक सच्चाई आज भी भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़ा गंभीर प्रश्न बनी हुई है। सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह भूमि आज भी पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े में है।
इसी राष्ट्रीय सरोकार को केंद्र में रखते हुए हरिद्वार के वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण भदौरिया, अधिवक्ता कमल भदौरिया तथा एलएलबी अध्ययनरत चेतन भदौरिया ने देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और महामहिम राष्ट्रपति महोदय को एक विस्तृत पत्र भेजकर इस मुद्दे पर ठोस कार्रवाई की माँग की है। पत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि यह विषय केवल इतिहास या भावनाओं से जुड़ा नहीं, बल्कि भारत की संसद द्वारा पारित एक जीवंत राष्ट्रीय संकल्प से जुड़ा हुआ है।
22 फरवरी 1994: संसद का ऐतिहासिक और सर्वसम्मत प्रस्ताव
पत्र में उल्लेख किया गया है कि 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें यह स्पष्ट घोषणा की गई थी कि जम्मू-कश्मीर का संपूर्ण क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाले हिस्से को वापस लाना भारत का दायित्व है। यह प्रस्ताव किसी एक दल, सरकार या समय तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभु संसद की सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रतीक था।
अधिवक्ताओं ने अपने पत्र में यह भी रेखांकित किया कि यह प्रस्ताव केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संवैधानिक और नैतिक दायित्व उत्पन्न करता है, जो प्रत्येक निर्वाचित सरकार पर लागू होता है। संसद के संकल्प को केवल अभिलेखों या फाइलों तक सीमित रखना, उस राष्ट्रीय भावना के साथ अन्याय है, जिसके साथ यह प्रस्ताव पारित किया गया था।
1947 वाला भारत नहीं, आज का भारत सशक्त और निर्णायक
पत्र में वर्तमान भारत की बदली हुई वैश्विक स्थिति का विशेष उल्लेख किया गया है। अधिवक्ताओं का कहना है कि 1947-48 का भारत आज के भारत से बिल्कुल अलग था। आज भारत एक सशक्त अर्थव्यवस्था, मजबूत सैन्य क्षमता और वैश्विक मंच पर प्रभावशाली कूटनीतिक उपस्थिति वाला राष्ट्र है। ऐसे में यह अपेक्षा और भी प्रबल हो जाती है कि 1994 के ऐतिहासिक संसद प्रस्ताव को अब क्रियान्वयन के स्तर पर लाया जाए।
उन्होंने लिखा है कि नया भारत केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और निर्णायक नीति अपनाने की क्षमता रखता है। ऐसे में पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाली 78,000 वर्ग किलोमीटर भूमि को वापस लेने के लिए ठोस कूटनीतिक, संवैधानिक और राजनीतिक कदम उठाए जाने चाहिए।
राष्ट्रीय सम्मान और भविष्य की पीढ़ियों का प्रश्न
अधिवक्ताओं ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि यह मुद्दा केवल भू-भाग का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान, संप्रभुता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है। यदि संसद के संकल्पों को लागू नहीं किया गया, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और संसदीय गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से यह आग्रह किया गया है कि वे इस विषय को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए रणनीतिक पहल की शुरुआत करें, ताकि पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े को समाप्त कर भारत की भूमि को वापस देश की सीमा में लाया जा सके।
देशव्यापी बहस की ज़रूरत
हरिद्वार के अधिवक्ताओं की यह पहल केवल एक पत्र तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे देशव्यापी विमर्श की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। उनका कहना है कि जब संसद ने संकल्प लिया है, तो उसे लागू कराने के लिए जनमत, राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवैधानिक साहस—तीनों का एक साथ आना आवश्यक है।
नया भारत अब केवल अतीत को याद करने वाला नहीं, बल्कि अधूरे संकल्पों को पूरा करने वाला भारत बन चुका है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 1994 के संसद प्रस्ताव को लेकर केंद्र सरकार आगे क्या ठोस कदम उठाती है



