स्कूलों, अस्पतालों और रिहायशी इलाकों के बीच ‘यार दा ठेका’, प्रशासन की आंखों पर क्यों है पट्टी! सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवहेलना, जिला आबकारी हरिद्वार पर गंभीर सवाल?,, मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान, मुख्य सचिव से आबकारी अधिकारियों तक नोटिस जारी

इन्तजार रजा हरिद्वार- स्कूलों, अस्पतालों और रिहायशी इलाकों के बीच ‘यार दा ठेका’, प्रशासन की आंखों पर क्यों है पट्टी!
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवहेलना, जिला आबकारी हरिद्वार पर गंभीर सवाल?,,
मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान, मुख्य सचिव से आबकारी अधिकारियों तक नोटिस जारी

हरिद्वार के जगजीतपुर क्षेत्र में संचालित शराब का ठेका “यार दा ठेका” अब केवल एक मदिरा दुकान नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की धज्जियां और मानवाधिकारों के उल्लंघन का प्रतीक बनता जा रहा है। ठेके के ठीक आसपास DAV पब्लिक स्कूल, श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल, अचीवर होम पब्लिक स्कूल, महर्षि विद्या मंदिर, शिवदिल पब्लिक स्कूल, शांति मेमोरियल पब्लिक स्कूल, सरकारी प्राथमिक विद्यालय, कई अस्पताल और रूद्र विहार, शिव विहार, राजा गार्डन, अरिहंत विहार, मानसी एनक्लेव, गोपाल बस्ती जैसी घनी रिहायशी कॉलोनियां स्थित हैं।

इन क्षेत्रों में रहने वाले परिवार, अभिभावक और स्कूली बच्चों की दिनचर्या इस ठेके के कारण बुरी तरह प्रभावित हो रही है। शराबियों का जमावड़ा, सड़क पर हंगामा, जाम और झगड़े अब रोजमर्रा की तस्वीर बन चुके हैं, लेकिन जिला आबकारी विभाग हरिद्वार इस पूरे मामले में आंख मूंदे बैठा है।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश, फिर भी नियमों की धज्जियां
याचिकाकर्ताओं अरुण भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, चेतन भदौरिया (LLB), आयुष जायसवाल (LLB), शाहनवाज मलिक (LLB) ने राज्य मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड, देहरादून में याचिका दायर कर स्पष्ट किया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम के. बालू’ (15 दिसंबर 2016) के फैसले में साफ निर्देश दिए थे कि राष्ट्रीय व राज्य राजमार्ग से 500 मीटर के दायरे में कोई भी शराब की दुकान संचालित नहीं हो सकती, यह नियम शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों पर समान रूप से लागू है और उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी है।

इसके बावजूद जगजीतपुर स्थित यह शराब का ठेका खुलेआम नियमों को ठेंगा दिखाते हुए संचालित किया जा रहा है।

शिकायतें, आदेश और फिर भी ‘शून्य कार्रवाई’
याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर आबकारी विभाग उत्तराखंड ने जिला आबकारी अधिकारी हरिद्वार को कार्रवाई के निर्देश दिए, लेकिन जिला आबकारी अधिकारी ने न तो मौके की जांच की, न ही शिकायत से संबंधित कोई तथ्य सीएम पोर्टल पर सही तरीके से अपलोड किए।
22 मार्च 2025 को सीएम पोर्टल पर जो रिपोर्ट डाली गई, वह किसी अन्य व्यक्ति की शिकायत से संबंधित थी। जब याचिकाकर्ताओं ने दोबारा शिकायत की तो किसी दूसरी शिकायत की रिपोर्ट अपलोड कर मामला बंद कर दिया गया।
इसके बाद 27 जुलाई 2025 को आबकारी आयुक्त देहरादून श्री पी.एस. गरबियाल ने स्पष्ट आदेश दिए कि शिकायतकर्ता से वार्ता कर विस्तृत जांच की जाए और 7 दिन के भीतर आख्या प्रस्तुत की जाए। यह आदेश भी जिला आबकारी हरिद्वार ने खुलेआम नजरअंदाज कर दिया।
यही नहीं, संयुक्त आबकारी आयुक्त गढ़वाल मंडल श्री रमेश सिंह ने पत्र संख्या 427 जारी कर चेतावनी दी कि यदि मदिरा दुकान नियमावली 1968 और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप नहीं पाई जाती तो संबंधित आबकारी निरीक्षक पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। इसके बावजूद कोई जांच नहीं, कोई कार्रवाई नहीं, सिर्फ पुरानी रिपोर्ट दोबारा अपलोड कर दी गई कि “दुकान नियमानुसार है”।
बच्चों पर गलत प्रभाव, सड़क पर अराजकता
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाते हैं और सामने शराब का ठेका देखते हैं तो यह उनके मन पर गलत संदेश डालता है। शराब पीकर लोग सड़क पर ही हंगामा करते हैं, झगड़े होते हैं, यातायात बाधित रहता है। यह स्थिति मानवाधिकारों के सीधे उल्लंघन की ओर इशारा करती है।

मानवाधिकार आयोग ने दिखाई सख्ती
लगातार अनदेखी और प्रशासनिक मनमानी के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड ने इस मामले को गंभीर मानते हुए याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। आयोग ने मुख्य सचिव उत्तराखंड शासन, आयुक्त आबकारी विभाग उत्तराखंड और जिला आबकारी अधिकारी हरिद्वार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि जगजीतपुर की इस मदिरा दुकान को राज्य राजमार्ग से 500 मीटर दूर नियमानुसार स्थानांतरित किया जाए और जिला आबकारी हरिद्वार के उन अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए, जिन्होंने उच्च अधिकारियों और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की।



