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रावण दहन की परंपरा पर उठे सवाल! मानवाधिकार आयोग पहुंची याचिका, भदौरिया एसोसिएट अधिवक्ताओं ने उठाई पुतला दहन रोकने की मांग… हरिद्वार के अधिवक्ताओं की पहल से धार्मिक-सांस्कृतिक बहस तेज, रावण की विद्वता, शिवभक्ति और साहित्यिक पक्षों पर चर्चा कराने की मांग; गृह एवं संस्कृति विभाग समेत कई विभागों को बनाया पक्षकार

रावण दहन की परंपरा पर उठे सवाल! मानवाधिकार आयोग पहुंची याचिका, भदौरिया एसोसिएट अधिवक्ताओं ने उठाई पुतला दहन रोकने की मांग…

हरिद्वार के अधिवक्ताओं की पहल से धार्मिक-सांस्कृतिक बहस तेज, रावण की विद्वता, शिवभक्ति और साहित्यिक पक्षों पर चर्चा कराने की मांग; गृह एवं संस्कृति विभाग समेत कई विभागों को बनाया पक्षकार

हरिद्वार। दशहरे पर रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले जलाने की सदियों पुरानी परंपरा को लेकर उत्तराखंड में एक नई बहस छिड़ गई है। हरिद्वार के कुछ अधिवक्ताओं ने रावण के पुतला दहन पर सवाल उठाते हुए उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून में याचिका दायर की है। याचिका में रावण के पुतले के दहन पर रोक लगाने, लोगों को इसके लिए प्रेरित न करने तथा उसके विद्वतापूर्ण, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्षों को सामने लाने की मांग की गई है।

इस पहल के बाद दशहरे की परंपरा, धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक पात्रों के बहुआयामी व्यक्तित्व और सार्वजनिक आयोजनों की प्रकृति को लेकर चर्चा तेज होने की संभावना है। हालांकि, याचिका दायर होना अपने आप में किसी परंपरा पर प्रतिबंध लगने या मानवाधिकार उल्लंघन साबित होने के समान नहीं है। इस संबंध में आयोग का रुख और आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।

रावण के पुतला दहन पर सवाल, अधिवक्ताओं ने आयोग से हस्तक्षेप की लगाई गुहार

प्राप्त जानकारी के अनुसार, याचिका दायर करने वालों में हरिद्वार के अधिवक्ता अरुण भदोरिया, अधिवक्ता कमल भदोरिया, अधिवक्ता सुमेधा भदोरिया, एलएलबी के विद्यार्थी चेतन भदोरिया तथा अधिवक्ता रेखा पांडे शामिल हैं। याचिका में उत्तराखंड शासन के गृह विभाग और संस्कृति विभाग, पुलिस महानिदेशक, प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों, नगर निकायों और दशहरा आयोजन समितियों को पक्षकार बनाया गया है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि रावण को केवल नकारात्मक पात्र के रूप में देखने के बजाय उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि भारतीय रामायण परंपरा में रावण को लंकापति, विद्वान, तपस्वी, भगवान शिव का भक्त और विभिन्न विधाओं का ज्ञाता बताया गया है। ऐसे में उसके ज्ञान, साधना, संगीत और धार्मिक साहित्य से जुड़े पक्षों पर भी समाज में चर्चा होनी चाहिए।

याचिका में मांग की गई है कि रावण के पुतला दहन पर रोक लगाने और लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित न करने के विषय पर आयोग विचार करे। साथ ही, रावण से जुड़े साहित्यिक एवं धार्मिक पक्षों को समझाने के लिए संगोष्ठियां, शैक्षिक कार्यक्रम और वैकल्पिक सांस्कृतिक आयोजन प्रोत्साहित किए जाएं।

शिवभक्ति से शिव तांडव स्तोत्र तक, रावण के व्यक्तित्व के दूसरे पक्ष सामने लाने की मांग

याचिका में रावण की विद्वता, तपस्या, शिवभक्ति और संगीत संबंधी परंपराओं का उल्लेख किया गया है। रावण के नाम से प्रचलित शिव तांडव स्तोत्र संस्कृत की भक्ति-काव्य परंपरा में विशेष स्थान रखता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पौराणिक पात्रों के मूल्यांकन में उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को समझना चाहिए और धार्मिक-साहित्यिक परंपराओं का अध्ययन प्रमाणित स्रोतों के आधार पर किया जाना चाहिए।

हालांकि, याचिका में यह दृष्टिकोण भी सामने रखा गया है कि किसी पात्र की विद्वता या धार्मिक साधना उसके नैतिक आचरण से जुड़े प्रश्नों को समाप्त नहीं कर देती। ज्ञान के साथ सदाचार, विनम्रता, न्याय, स्त्री सम्मान और संयम जैसे मूल्यों का पालन भी आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं की मांग है कि दशहरे के अवसर पर केवल पुतला दहन तक सीमित रहने के बजाय ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएं, जिनमें ज्ञान, विवेक, नैतिकता, साहित्य और सामाजिक सुधार का संदेश दिया जा सके। रामायण की विभिन्न क्षेत्रीय एवं साहित्यिक परंपराओं पर आधारित शैक्षिक गतिविधियां भी इस दिशा में उपयोगी हो सकती हैं।

अहंकार और अन्याय के खिलाफ संदेश पर भी जोर, वैकल्पिक आयोजनों का सुझाव

याचिका में रावण के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर चर्चा के साथ सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध जागरूकता बढ़ाने की बात कही गई है। इसमें अहंकार, अन्याय, हिंसा और स्त्री-असम्मान जैसी प्रवृत्तियों के त्याग का संदेश देने वाले कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दिया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने संबंधित समुदायों, धार्मिक संगठनों, विद्वानों और नागरिक समाज से परामर्श लेकर शांतिपूर्ण एवं वैकल्पिक उत्सवों को प्रोत्साहित करने की मांग भी रखी है। उनका कहना है कि रावण से संबंधित धार्मिक और साहित्यिक परंपराओं के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित अध्ययन सामग्री तैयार कर आम जनता को उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी जानी चाहिए।

याचिका में उत्तराखंड शासन के गृह एवं संस्कृति विभाग से इस विषय पर उनका पक्ष और उपलब्ध नीतिगत जानकारी प्राप्त करने पर विचार करने का अनुरोध भी किया गया है।

पर्यावरण और सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया, आतिशबाजी व प्रदूषण पर ध्यान देने की मांग

रावण दहन से जुड़े आयोजनों में पर्यावरण और सार्वजनिक सुरक्षा के पहलुओं को भी याचिका का हिस्सा बनाया गया है। इसमें आतिशबाजी से होने वाले वायु एवं ध्वनि प्रदूषण, भीड़ प्रबंधन और अग्नि सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की बात कही गई है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सार्वजनिक आयोजनों में पर्यावरणीय मानकों और अग्नि सुरक्षा के नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस दृष्टिकोण से दशहरा आयोजनों की व्यवस्थाओं की समीक्षा और सुरक्षित आयोजन के उपायों पर विचार किया जा सकता है।

धार्मिक परंपरा बनाम वैकल्पिक दृष्टिकोण, अब आयोग के रुख पर निगाहें

दशहरा भारतीय समाज का एक प्रमुख पर्व है, जिसे अनेक स्थानों पर बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। पारंपरिक रामायण कथाओं में रावण का वध और उसका पुतला दहन अहंकार, अन्याय तथा अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है। वहीं, याचिकाकर्ता रावण के विद्वतापूर्ण और धार्मिक पक्षों पर भी पर्याप्त चर्चा किए जाने की आवश्यकता उठा रहे हैं।

ऐसे में इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि राज्य मानवाधिकार आयोग याचिका में उठाए गए तर्कों और मांगों पर क्या रुख अपनाता है। फिलहाल याचिका में की गई मांगों को आयोग के अंतिम निर्णय या सरकार द्वारा किसी प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

हरिद्वार से उठी यह पहल दशहरे की परंपरा, पौराणिक पात्रों की व्याख्या और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के स्वरूप पर एक नई चर्चा को जन्म दे सकती है। अब यह देखना होगा कि आयोग इस मामले में संबंधित विभागों से जवाब मांगता है या याचिका पर आगे कोई अन्य कार्यवाही करता है।

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