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सरकारी जमीन की रजिस्ट्री का कथित खेल! गढ़ गांव में किसने बिछाई कानून को ठेंगा दिखाने वाली बिसात? 60 दिन का कानुनी नोटिस फिर भी सरकारी गोयरा जमीन की सुरक्षा पर सवाल!….= ग्राम समाज की बताई जा रही खाली जमीन को अतिक्रमण से बचाने के लिए ठोस कदमों का इंतजार; ग्राम प्रधान और ग्रामीणों ने उठाई सुरक्षा की मांग, फील्ड अधिकारियों की कथित रिपोर्टिंग पर भी सवाल—खसरा नंबर 489 गोयरा सरकारी भुमि का विवाद अब प्रशासन की कार्यशैली की परीक्षा!

### ग्राम प्रधान और ग्रामीणों की गुहार पर कब जागेगा प्रशासन? गढ़ गांव की ग्राम समाज भूमि को अतिक्रमण से बचाने की मांग, कार्रवाई पर टिकी निगाहें… ### 60 दिन का कानूनी नोटिस, फील्ड रिपोर्टिंग पर सवाल! खसरा नंबर 489 ,, 489एम की निष्पक्ष जांच और सरकारी जमीन की सुरक्षा को लेकर जिलाधिकारी से निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद…

सरकारी जमीन की रजिस्ट्री का कथित खेल! गढ़ गांव में किसने बिछाई कानून को ठेंगा दिखाने वाली बिसात? 60 दिन का कानुनी नोटिस, फिर भी सरकारी गोयरा जमीन की सुरक्षा पर सवाल!….=

ग्राम समाज की बताई जा रही खाली जमीन को अतिक्रमण से बचाने के लिए ठोस कदमों का इंतजार; ग्राम प्रधान और ग्रामीणों ने उठाई सुरक्षा की मांग, फील्ड अधिकारियों की कथित रिपोर्टिंग पर भी सवाल—खसरा नंबर 489एम का विवाद अब प्रशासन की कार्यशैली की परीक्षा!

हरिद्वार। सरकारी जमीन पर कथित कब्जे और विवादित बैनामे का मामला अब केवल राजस्व अभिलेखों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक कार्यवाही की निष्पक्षता और जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। ग्राम पंचायत गढ़ में खसरा नंबर 489 को लेकर उठे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि संबंधित भूमि ग्राम समाज की है और अभी खाली पड़ी है, तो उसे अतिक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए अब तक ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?

मामले में अधिवक्ता नितिन कुमार की ओर से 12 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड सरकार, हरिद्वार प्रशासन और संबंधित पक्षों को कानूनी नोटिस भेजे जाने की बात सामने आई है। नोटिस में भूमि के राजस्व रिकॉर्ड, कथित बैनामे और कार्रवाई में देरी को लेकर सवाल उठाते हुए 60 दिनों के भीतर आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई है। हालांकि, आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभागों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

खाली जमीन पर अतिक्रमण का खतरा, फिर सुरक्षा के इंतजाम गायब कहां?

इस पूरे विवाद में सबसे अहम पहलू यह है कि संबंधित जमीन अभी खाली पड़ी बताई जा रही है। ऐसे में ग्राम समाज की संपत्ति को संभावित अतिक्रमण से बचाना प्रशासन और संबंधित राजस्व अधिकारियों के लिए प्राथमिकता का विषय होना चाहिए।

बताया गया है कि ग्राम प्रधान गढ़ और ग्रामीणों ने भी जमीन को सुरक्षित रखने की बात उठाई है और 04-02-2026 को ग्राम प्रधान और ग्राम वासियों ने एक प्रार्थना पत्र दिया था जिस पर कार्रवाई का परिणाम जीरो बताया गया है। यदि ग्रामीणों की ओर से भूमि की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई है, तो प्रशासन के सामने यह सवाल स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है कि मौके की स्थिति का सत्यापन कर भूमि की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए गए?

आखिर विवाद का अंतिम फैसला होने तक सार्वजनिक भूमि को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या मौके की वास्तविक स्थिति की जांच कर भूमि की पहचान सुनिश्चित की गई? क्या राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर सीमांकन और सुरक्षा के उपायों पर विचार हुआ? इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों की कार्रवाई और आधिकारिक अभिलेखों से ही मिल सकेगा।

फील्ड अधिकारियों की रिपोर्टिंग पर सवाल, उच्चाधिकारियों तक क्या और क्यों पहुंच रही पूरी अधुरी जानकारीयां ?

मामले में एक और गंभीर आरोप यह है कि कुछ फील्ड अधिकारियों ने कथित तौर पर वास्तविक स्थिति को उच्चाधिकारियों के सामने सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया। आरोप लगाने वाले पक्ष का दावा है कि मामले को तोड़-मरोड़कर या उलझे हुए तरीके से पेश किए जाने के कारण निर्णायक कार्रवाई की भूमिका पर संदेह पैदा हुआ है।

यदि किसी मामले में मौके की वास्तविक स्थिति और अधिकारियों की रिपोर्ट में अंतर है, तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। हालांकि, किसी अधिकारी की रिपोर्ट को गलत या भ्रामक ठहराने से पहले संबंधित रिपोर्ट, निरीक्षण विवरण, राजस्व अभिलेख और शिकायतों का मिलान किया जाना आवश्यक है।

अब प्रशासन के सामने यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि संबंधित अधिकारियों ने मौके पर क्या पाया, उच्चाधिकारियों को क्या रिपोर्ट भेजी और ग्राम प्रधान तथा ग्रामीणों की शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई।

सवाल सीधा है—क्या उच्चाधिकारियों तक जमीन की वास्तविक स्थिति पहुंची है, या फिर फाइलों में दर्ज विवरण के आधार पर ही मामला आगे बढ़ रहा है?

खसरा नंबर 343/16 से 489 तक, राजस्व रिकॉर्ड खोलेगा विवाद की परतें

कानूनी नोटिस के मुताबिक, विवादित भूमि का पुराना खसरा नंबर 343/16 बताया गया है, जबकि चकबंदी के बाद इसका नंबर 489, 489म होने का उल्लेख किया गया है। नोटिस भेजने वाले पक्ष का दावा है कि संबंधित जमीन राजस्व अभिलेखों में ग्राम समाज की गोयरा भूमि के रूप में दर्ज है।

यदि यह दावा राजस्व रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है, तो भूमि पर निजी स्वामित्व के दावे और कथित बैनामे के आधार की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके लिए पुराने और वर्तमान खसरा रिकॉर्ड, चकबंदी अभिलेख, खतौनी, भूमि के नक्शे तथा संबंधित रजिस्ट्री दस्तावेजों का परीक्षण किया जाना चाहिए।

साथ ही यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि कथित बैनामा किस भूमि से संबंधित है, उसे निष्पादित करने के लिए कौन-से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और भूमि की कानूनी स्थिति का सत्यापन किस स्तर पर हुआ।

अभी इन सवालों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वास्तविक स्थिति दस्तावेजों की जांच और संबंधित पक्षों के जवाब से ही सामने आएगी।

ग्राम प्रधान और ग्रामीणों की मांग और शिकायत पर प्रशासन का अगला कदम क्या होगा?

मामले में ग्राम प्रधान और ग्रामीणों की ओर से जमीन को सुरक्षित रखने की मांग उठाए जाने की बात कही गई है। ऐसे में प्रशासन के लिए जरूरी है कि शिकायतों को केवल कागजी औपचारिकता तक सीमित न रखते हुए मौके की स्थिति का निष्पक्ष सत्यापन कराया जाए।

यदि भूमि सार्वजनिक उपयोग अथवा ग्राम समाज की संपत्ति के रूप में दर्ज है, तो लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसकी सुरक्षा के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। किसी भी कथित अवैध कब्जे, निर्माण या दस्तावेजी अनियमितता पर कार्रवाई से पहले तथ्यों की पुष्टि और संबंधित पक्षों को नियमानुसार सुनवाई का अवसर देना भी जरूरी होगा।

60 दिन का कानूनी नोटिस, अब जवाबदेही की परीक्षा

अधिवक्ता नितिन कुमार की ओर से भेजे गए नोटिस में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के तहत 60 दिनों के भीतर आवश्यक कार्रवाई की मांग किए जाने का उल्लेख है। नोटिस भेजने वाले पक्ष ने उचित कदम नहीं उठाए जाने की स्थिति में सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी दी है।

अब निगाहें जिलाधिकारी हरिद्वार और संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर टिकी हैं। क्या भूमि के रिकॉर्ड की विस्तृत जांच होगी? क्या ग्राम प्रधान और ग्रामीणों की शिकायतों का सत्यापन किया जाएगा? क्या फील्ड अधिकारियों की रिपोर्ट और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान होगा? और सबसे अहम, क्या विवाद का अंतिम निर्णय होने तक जमीन को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे?

इन सभी सवालों का जवाब प्रशासनिक कार्रवाई से ही सामने आएगा।

बड़ा सवाल: सरकारी जमीन सुरक्षित कौन करेगा?

गढ़ गांव की इस जमीन से जुड़ा विवाद कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है। यदि भूमि ग्राम समाज की है, तो उसके संरक्षण की व्यवस्था क्या है? यदि कथित बैनामे पर सवाल हैं, तो दस्तावेजों की जांच कब होगी? और यदि फील्ड रिपोर्टिंग पर संदेह जताया जा रहा है, तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा कौन करेगा?

फिलहाल आरोपों की पुष्टि होना बाकी है, लेकिन खाली पड़ी बताई जा रही जमीन की सुरक्षा और शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अब जरूरत है कि प्रशासन रिकॉर्ड की पड़ताल करे, मौके की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे और कानून के अनुसार पारदर्शी कार्रवाई करे—ताकि ग्राम समाज की जमीन को लेकर उठे सवालों का जवाब अटकलों से नहीं, तथ्यों से मिले।

अब देखना होगा कि 60 दिन के कानूनी नोटिस के बाद हरिद्वार प्रशासन क्या कार्रवाई करता है। क्या ग्राम समाज की गोयरा जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाएगा और कथित फर्जी बैनामे के मामले में संबंधित लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जाएगा? फिलहाल ग्रामीणों की निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।

 

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