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फर्जी पत्रकारों की भरमार पर सवाल,, शांत‍िकुंज कार्यक्रम में अव्यवस्था ने खोली पोल,, अब हरिद्वार में पत्रकार सत्यापन जरुरी अनिवार्य!,, चिंता क्या पत्रकारिता सिर्फ एक पहचान-पत्र वाला व्यवसाय बनकर रह जाएगी,, क्या “हर हाथ में कैमरा और गले में कार्ड मतलब पत्रकार? यह कौनसा नया मीडिया मॉडल?”

इन्तजार रजा हरिद्वार- फर्जी पत्रकारों की भरमार पर सवाल,,

शांत‍िकुंज कार्यक्रम में अव्यवस्था ने खोली पोल,,

अब हरिद्वार में पत्रकार सत्यापन जरुरी अनिवार्य!,,

चिंता क्या पत्रकारिता सिर्फ एक पहचान-पत्र वाला व्यवसाय बनकर रह जाएगी,,

क्या “हर हाथ में कैमरा और गले में कार्ड मतलब पत्रकार? यह कौनसा नया मीडिया मॉडल?”

हरिद्वार—धार्मिक नगरी और राष्ट्रीय मीडिया हब बनने की होड़ में जुटा शहर अब एक नई समस्या से जूझ रहा है—फर्जी पत्रकारों के बढ़ते आतंक से। शांतिकुंज में आयोजित हालिया कार्यक्रम में हुई अव्यवस्था ने इस मुद्दे को फिर से सबसे सामने ला दिया है। कुछ लोगों के हाथ में फर्जी प्रेस कार्ड, बनावटी माइक्रोफोन और बिना प्रमाणित डिजिटल पोर्टल देखकर आयोजक, पुलिस और प्रशासन तक परेशान हो गए।

स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि लोग अब असली और नकली पत्रकार में फर्क तक नहीं कर पा रहे। कई लोग सिर्फ पहचान, दबाव, फायदे और पहुंच बनाने के नाम पर स्वयं को पत्रकार बताने लगे हैं। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर सीधा आघात पड़ रहा है।

असली पत्रकार दबे, फर्जी उभरे — सवालों में मीडिया की साख

हरिद्वार के वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि शहर में असली पत्रकारों की मेहनत और वर्षों की पहचान अब इन कथित पत्रकारों के कारण धूमिल होती जा रही है।

वे साफ तौर पर कहते हैं—

“प्रेस क्लब और सक्रिय संगठनों में वर्षों का अनुभव रखने वाले पत्रकार मौजूद हैं, लेकिन उनकी आवाज़ और पहचान इन फर्जी और अवसरवादी लोगों के शोर में दब जाती है।”

जो लोग न तो न्यूज रूम की समझ रखते हैं और न पत्रकारिता की बुनियादी भाषा, वे आज खुद को राष्ट्रीय चैनल का संवाददाता बताकर घूम रहे हैं। यही लोग प्रशासनिक दफ्तरों, पुलिस लाइनों, नेताओं और सामाजिक कार्यक्रमों में अनुचित लाभ लेने में सबसे आगे खड़े दिखते हैं।

SOP की घोषणा — उम्मीद, लेकिन कार्रवाई का इंतजार

शांतिकुंज कार्यक्रम में हुए अफरातफरी के बाद जिलाधिकारी ने पत्रकार पहचान सत्यापन के लिए SOP तैयार करने की घोषणा की है, जो असली पत्रकारों के लिए उम्मीद की किरण है।

लेकिन सवाल यह है—
▶ SOP कागजों में रहेगी या ज़मीन पर उतरेगी?
▶ फर्जी कार्ड धारकों पर कार्रवाई होगी या सबकुछ फिर धुंध में खो जाएगा?

क्योंकि हरिद्वार में सैकड़ों पोर्टल सिर्फ वॉट्सऐप से चल रहे हैं, जिनकी न तो कोई RNI रजिस्ट्रेशन है और न कानूनी अनुमति। यही पोर्टल और कार्टनों में छपवा लिए गए प्रेस कार्ड इस अव्यवस्था की जड़ हैं।

प्रशासन, प्रेस परिषद और पुलिस को मिलकर कार्रवाई करनी होगी

अब वक्त आ गया है कि सरकार, प्रशासन और पत्रकार संगठनों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। यह केवल छवि का सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता का संकट है।

आवश्यक कदम इस प्रकार हो सकते हैं:

  • ✔ RNI/PIB आधारित पत्रकार पंजीकरण
  • ✔ अवैध प्रेस कार्ड छापने वालों पर FIR
  • ✔ पोर्टल और चैनलों की वैधता की जांच
  • ✔ प्रेस पास जारी करने की सख्त प्रक्रिया
  • ✔ फर्जी पत्रकारों पर कानूनी प्रतिबंध

क्यों जरूरी है यह कार्रवाई?

क्योंकि पत्रकार समाज की निगरानी करता है—
लेकिन जब खुद पत्रकारिता ही अव्यवस्थित और संदिग्ध हो जाए तो भरोसा कैसे बचेगा?

आज लोग यह कहने लगे हैं—

“हर हाथ में कैमरा और गले में कार्ड मतलब पत्रकार? यह कौनसा नया मीडिया मॉडल है?”

यह स्थिति सामान्य नहीं है। यह हरिद्वार की पत्रकारिता की नींव पर हमला है।

समाप्ति नहीं — शुरुआत

शांतिकुंज कार्यक्रम ने सिर्फ एक घटना नहीं दिखाई, बल्कि एक गंभीर चेतावनी दे दी है—

अब और देर की तो हरिद्वार में पत्रकारिता सिर्फ एक पहचान-पत्र वाला व्यवसाय बनकर रह जाएगी।

जिलाधिकारी का SOP बनाना स्वागत योग्य कदम है, लेकिन जब तक कानूनी कार्रवाई और सख्त नियंत्रण नहीं होगा, तब तक नकली पत्रकारों की दुकानें चलती रहेंगी और असली पत्रकारों की आवाज़ दबती रहेगी।

अब एक ही मांग — हरिद्वार को चाहिए साफ, सत्य और प्रमाणित पत्रकारिता!

क्योंकि पत्रकारिता सम्मान है—
सिर्फ कार्ड नहीं।

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