आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का पूर्ण कार्य बहिष्कार! हरिद्वार में गरज उठी महिलाओं की आवाज,, रितेश चौहान ने चेतावनी दी- मांगें पूरी न हुईं तो पूरे उत्तराखंड में चलेगा आंदोलन,, कांग्रेस नेताओं का समर्थन, 11 सूत्रीय मांगों पर सरकार पर दबाव

इन्तजार रजा हरिद्वार- आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का पूर्ण कार्य बहिष्कार! हरिद्वार में गरज उठी महिलाओं की आवाज,,
रितेश चौहान ने चेतावनी दी- मांगें पूरी न हुईं तो पूरे उत्तराखंड में चलेगा आंदोलन,,
कांग्रेस नेताओं का समर्थन, 11 सूत्रीय मांगों पर सरकार पर दबाव
**हरिद्वार (विशेष संवाददाता):** उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में आंगनबाड़ी कार्यकर्ती, सेविका और मिनी कर्मचारी संगठन ने अपनी लंबित मांगों को लेकर पूर्ण कार्य बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। संगठन की जिलाध्यक्ष रितेश चौहान के नेतृत्व में सैकड़ों महिलाओं ने विकास भवन और कलेक्ट्रेट परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि जब तक सरकार उनकी 11 सूत्रीय मांगों को स्वीकार नहीं करती, आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहेंगे और कोई भी कार्य नहीं किया जाएगा।
यह आंदोलन केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं है। संगठन का कहना है कि प्रदेश स्तर पर भी इसी तरह की तैयारियां चल रही हैं। 14 मार्च 2026 को देहरादून में आयोजित रैली के दौरान मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने की कोशिश को प्रशासन ने रोका था, जिसके बाद आक्रोश बढ़ गया। महिलाओं ने आरोप लगाया कि उन्हें भेड़-बकरियों की तरह गाड़ियों में ठूंसकर ले जाया गया, जो बेहद अपमानजनक था।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की पीड़ा: शोषण और उपेक्षा की कहानी

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बच्चों के पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और माताओं की देखभाल का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। फिर भी उन्हें न्यूनतम सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। रितेश चौहान ने ज्ञापन में विस्तार से बताया कि लंबे समय से मांगें लंबित हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।
संगठन के अनुसार, कार्यकर्ताओं को महज 4,500 रुपये मासिक मानदेय मिलता है, जो उनके कार्य की जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है। उन्होंने मांग की है कि मानदेय में 140 रुपये प्रतिदिन की बढ़ोतरी की जाए और केंद्र सरकार को 1,150 रुपये प्रतिदिन का प्रस्ताव भेजा जाए। इसके अलावा, सेवा निवृत्ति के बाद 300 कोटि का भुगतान, सुपरवाइजर पद पर 60 वर्ष की बजाय 62 वर्ष तक सेवा, 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति पर एक लाख रुपये की एकमुश्त राशि, पेंशन योजना आदि प्रमुख मांगें शामिल हैं।
एक कार्यकर्ता ने भावुक होते हुए बताया, “हम पूरे दिन केंद्र पर बच्चों को खिलाते-पिलाते हैं, घर-घर जाकर सर्वे करते हैं, लेकिन हमारे लिए कोई सुरक्षा नहीं। फोन की स्थिति खराब है, कोई भत्ता नहीं मिलता। नंदा गौरा योजना का लाभ भी हमें नहीं दिया जा रहा।”
11 सूत्रीय मांगें: क्या है पूरा एजेंडा?
आंगनबाड़ी संगठन ने निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी हैं:
1. आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय में राज्य सरकार द्वारा 140 रुपये प्रतिदिन की वृद्धि और केंद्र सरकार को 1,150 रुपये प्रतिदिन का प्रस्ताव भेजा जाए।
2. आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बिना किसी अर्हता पूर्ति के 300 कोटि का भुगतान।
3. सुपरवाइजर पद पर 60 वर्ष की बजाय 62 वर्ष तक सेवा।
4. सेवानिवृत्ति पर एक लाख रुपये की एकमुश्त राशि।
5. पेंशन योजना लागू की जाए।
6. केवाईसी/फेस कैप्चरिंग में सुधार।
7. भवन किराए में बढ़ोतरी और माता समिति के खाते में रिचार्ज।
8. अन्य विभागों के कार्य के लिए 1,000 रुपये प्रतिमाह।
9. नंदा गौरा योजना का लाभ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को भी।
10. फोन की खराब स्थिति पर तुरंत सुधार।
11. वर्ष 2022-23 में गर्भवती महिलाओं को पीएमएमबीवाई का पैसा न मिलने का मुद्दा सुलझाया जाए।
इन मांगों को लेकर महिलाएं काफी आक्रोशित हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र में बैठकर केवल पोषण ट्रैकर पर काम नहीं करेंगी, बल्कि सरकार के अन्य कार्य भी बंद रखेंगी।
कांग्रेस नेताओं का समर्थन, रितेश चौहान की अगुवाई
हरिद्वार कांग्रेस नेताओं ने भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का पूरा समर्थन किया है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत समेत स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल हुए। रितेश चौहान ने कहा, “हमारी मांगें जायज हैं। अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो पूरे प्रदेश में आंदोलन तेज किया जाएगा।”ब्लॉक अध्यक्ष कविता चौहान ने भी महिलाओं की पीड़ा को साझा करते हुए कहा कि लंबे समय से शोषण हो रहा है। प्रदर्शन में किरण, हितेश चौहान, विजय लक्ष्मी, नीरा देवी, पूनम रानी आदि बड़ी संख्या में मौजूद रहीं।
आंगनबाड़ी केंद्रों पर क्या असर पड़ेगा?
आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों का पोषण, टीकाकरण, प्री-स्कूल शिक्षा और गर्भवती महिलाओं की देखभाल ठप हो जाएगी। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां ये केंद्र एकमात्र सहारा होते हैं, वहां प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ेगा। संगठन का कहना है कि यह जबरन बहिष्कार नहीं बल्कि मजबूरी है, क्योंकि बिना सम्मान और उचित वेतन के काम करना असंभव हो गया है।
जिला प्रशासन ने ज्ञापन दिया जायेगा और इसे शीर्ष स्तर पर भेजा जाए लेकिन कार्यकर्ताएं अब इंतजार नहीं करना चाहतीं। उन्होंने साफ कहा- “जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, केंद्रों पर ताला लगा रहेगा।”
यह आंदोलन केवल आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का नहीं, बल्कि पूरे बाल विकास और महिला सशक्तिकरण से जुड़ा मुद्दा है। रितेश चौहान और उनके संगठन की यह लड़ाई अगर सफल हुई तो हजारों महिलाओं की जिंदगी बदलेगी। सरकार को अब जल्द फैसला लेना होगा, वरना उत्तराखंड में महिला आंदोलन की नई लहर उठ सकती है।



