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एक्सपायरी दूध–दवाइयों से बच्चों की जान से खिलवाड़ के भ्रष्टाचार की गुमनाम हुई कार्रवाई,, सलेमपुर आंगनबाड़ी बना था योजनाओं की कब्रगाह,, जांच पूरी, दोषी चिन्हित… फिर भी कार्रवाई गुमनाम क्यों?,, जांच हुई पूरी, रिपोर्ट तैयार… फिर ब्रेक किसने लगाया?,, कारण बताओ नोटिसबाजी: भ्रष्टाचार का सबसे आसान कवच,, कौन जिम्मेदार? नीचे से ऊपर तक जवाबदेही तय हो लेकिन कब

उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद के बहादराबाद ब्लॉक अंतर्गत ग्राम सलेमपुर महदुद में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र से सामने आया मामला अब केवल एक केंद्र की लापरवाही नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम की साख और नीयत पर सवाल खड़ा करता है। पंचायत परिसर स्थित आंगनबाड़ी केंद्र संख्या–20 से भारी मात्रा में एक्सपायरी दूध और आयरन की दवाइयां मिलने के बाद जिस तरह से हड़कंप मचा था, उसी अनुपात में अब कार्रवाई की फाइल गुमनाम होती दिख रही है।

इन्तजार रजा हरिद्वार- एक्सपायरी दूध–दवाइयों से बच्चों की जान से खिलवाड़ के भ्रष्टाचार की गुमनाम हुई कार्रवाई,,
सलेमपुर आंगनबाड़ी बना था योजनाओं की कब्रगाह,,
जांच पूरी, दोषी चिन्हित… फिर भी कार्रवाई गुमनाम क्यों?,,

जांच हुई पूरी, रिपोर्ट तैयार… फिर ब्रेक किसने लगाया?,,

कारण बताओ नोटिसबाजी: भ्रष्टाचार का सबसे आसान कवच,,

कौन जिम्मेदार? नीचे से ऊपर तक जवाबदेही तय हो लेकिन कब

उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद के बहादराबाद ब्लॉक अंतर्गत ग्राम सलेमपुर महदुद में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र से सामने आया मामला अब केवल एक केंद्र की लापरवाही नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम की साख और नीयत पर सवाल खड़ा करता है। पंचायत परिसर स्थित आंगनबाड़ी केंद्र संख्या–20 से भारी मात्रा में एक्सपायरी दूध और आयरन की दवाइयां मिलने के बाद जिस तरह से हड़कंप मचा था, उसी अनुपात में अब कार्रवाई की फाइल गुमनाम होती दिख रही है।

मुख्यमंत्री आंचल अमृत योजना और पोषण योजनाओं के तहत जिन बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को पोषण मिलना था, वही सामग्री पंचायत भवन में सड़ती मिली। सवाल यह नहीं कि दूध और दवाएं एक्सपायर कैसे हुईं, बल्कि सवाल यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री समय पर क्यों नहीं बांटी गई? और अगर बांटी गई थी तो फिर पंचायत परिसर में यह सब कैसे मिला?
जांच हुई पूरी, रिपोर्ट तैयार… फिर ब्रेक किसने लगाया?
मामले के सामने आते ही तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के निर्देश पर सीडीओ के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित की गई थी। जांच कमेटी ने भौतिक सत्यापन किया, रजिस्टर देखे, स्टॉक की स्थिति जांची और पूरी रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजने की बात कही। प्रशासनिक स्तर पर यह भी स्वीकार किया गया कि दोषियों की पहचान हो चुकी है।
इसके बावजूद आज स्थिति यह है कि —
न कोई ठोस विभागीय कार्रवाई सामने आई
न किसी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सुपरवाइज़र या सीडीपीओ पर निलंबन
न कोई एफआईआर
न किसी सप्लायर की भूमिका पर सार्वजनिक खुलासा
यानी जांच पूरी, लेकिन कार्रवाई शून्य।
कारण बताओ नोटिसबाजी: भ्रष्टाचार का सबसे आसान कवच
सूत्रों की मानें तो पूरा मामला एक बार फिर “कारण बताओ नोटिस” की फाइल में समेटने की तैयारी में है। वही पुराना फॉर्मूला —
नोटिस दो, जवाब लो, संतोषजनक मान लो और फाइल दबा दो।
लेकिन सवाल यह है कि
👉 क्या बच्चों की सेहत से खिलवाड़ भी नोटिस से निपट जाएगा?
👉 क्या एक्सपायरी दवाइयों का मामला केवल प्रशासनिक चूक है या आपराधिक लापरवाही?
यदि सरकारी रिकॉर्ड में 100 प्रतिशत वितरण दिखाया गया और जमीनी हकीकत में दूध–दवाइयां सड़ती मिलीं, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि डाटा फर्जीवाड़ा और योजनाबद्ध भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
फर्जी वितरण, फर्जी डाटा और फील्ड में सन्नाटा
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों की उपस्थिति नाममात्र
कई दिनों तक ताले
फिर भी पोर्टल पर “सभी लाभार्थियों को वितरण पूर्ण”
सवाल उठते हैं —
क्या फर्जी लाभार्थियों के नाम जोड़कर वितरण दिखाया गया?
क्या फर्जी हस्ताक्षर और रजिस्टर के सहारे पोर्टल अपडेट हुआ?
क्या कभी भौतिक सत्यापन हुआ भी या नहीं?
अगर जवाब “नहीं” है, तो यह सीधे तौर पर डिजिटल सिस्टम के दुरुपयोग और निगरानी तंत्र की विफलता को उजागर करता है।
बच्चों की थाली में पोषण नहीं, सिस्टम की सड़ांध
मुख्यमंत्री आंचल अमृत योजना, मिशन पोषण 2.0 और महिला–बाल विकास विभाग की योजनाएं कागज़ों में भले ही सफल दिख रही हों, लेकिन सलेमपुर महदुद का यह मामला बताता है कि जमीनी हकीकत बेहद डरावनी है।
यहां बच्चों को मिलने वाला दूध समय पर नहीं पहुंचा
एक्सपायर होकर सड़ गया और अंत में पंचायत भवन में पड़ा मिला यानी योजना का लाभ बच्चों तक नहीं, बल्कि फाइलों और पोर्टल तक सीमित रह गया।
कौन जिम्मेदार? नीचे से ऊपर तक जवाबदेही तय हो
इस पूरे मामले में जिम्मेदारी केवल आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पर डालकर नहीं टाली जा सकती। सवाल उठता है —
सुपरवाइज़र कहां थे?
सीडीपीओ ने कब निरीक्षण किया?
ब्लॉक स्तर पर स्टॉक की मॉनिटरिंग क्यों नहीं हुई?
सप्लाई करने वाली एजेंसी की गुणवत्ता जांच कहां थी?
अगर हर स्तर पर निगरानी होती, तो एक्सपायरी दूध और दवाइयां कभी इस हालत में नहीं मिलतीं।
CBI या SIT नहीं तो कम से कम स्वतंत्र ऑडिट जरूरी
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों की मांग थी कि —
पूरे जनपद के आंगनबाड़ी केंद्रों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए
डिजिटल डाटा और फील्ड रिपोर्ट का क्रॉस वेरिफिकेशन हो
दोषियों के नाम सार्वजनिक कर कड़ी कार्रवाई की जाए
यदि अब भी मामला दबा दिया गया, तो यह पूरे उत्तराखंड में एक खतरनाक मिसाल बनेगा, जहां बच्चों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले बेखौफ रहेंगे।
अब निगाहें शासन पर
सलेमपुर महदुद का यह मामला केंद्र की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की परीक्षा थी।
जांच रिपोर्ट तैयार है।
दोषी चिन्हित हैं।
अब सवाल सिर्फ एक है —
क्या शासन सख्ती दिखाएगा या यह भ्रष्टाचार की ये फाइल भी गुमनाम कार्यवाही के ढेर में गुमनाम हो जाएगी?
अगर कार्रवाई में ढिलाई हुई, तो यह सिर्फ एक गांव की हार नहीं होगी, बल्कि सरकारी योजनाओं पर जनता के भरोसे की सबसे बड़ी हार साबित होगी।

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