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चुनावी रण में हरिद्वार की एंट्री! CEC ज्ञानेश कुमार के समर्थन में NHRC पहुंचे पांच याचिकाकर्ता, विपक्ष के आरोपों और प्रदर्शनों की जांच की मांग… SIR विवाद पर गरमाई सियासत के बीच एडवोकेट अरुण भदोरिया समेत पांच याचिकाकर्ताओं का बड़ा कदम, NHRC से केंद्र और निर्वाचन आयोग की तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब करने की अपील; संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया

चुनावी रण में हरिद्वार की एंट्री! CEC ज्ञानेश कुमार के समर्थन में NHRC पहुंचे पांच याचिकाकर्ता, विपक्ष के आरोपों और प्रदर्शनों की जांच की मांग…

SIR विवाद पर गरमाई सियासत के बीच एडवोकेट अरुण भदोरिया समेत पांच याचिकाकर्ताओं का बड़ा कदम, NHRC से केंद्र और निर्वाचन आयोग की तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब करने की अपील; संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया

हरिद्वार। देश की चुनावी सियासत में SIR को लेकर मचे घमासान के बीच अब हरिद्वार से भी एक महत्वपूर्ण कानूनी पहल सामने आई है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग, उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों और विभिन्न स्थानों पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच हरिद्वार के पांच याचिकाकर्ताओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), नई दिल्ली का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता की रक्षा करने, मौजूदा विवाद की तथ्यात्मक पड़ताल कराने और कथित गैरकानूनी हस्तक्षेप की पुष्टि होने पर नियमानुसार कार्रवाई की संस्तुति करने की मांग की गई है।

याचिका दाखिल करने वालों में अरुण कुमार भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट, सुमेधा भदोरिया एडवोकेट, चेतन भदोरिया और शाहनवाज मलिक शामिल हैं। याचिका पर 9 अक्टूबर 2026 की तारीख दर्ज है। इसमें भारत संघ, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत निर्वाचन आयोग और दिल्ली के पुलिस आयुक्त को प्रतिवादी बनाया गया है।

इस कानूनी पहल ने चुनावी विवाद के बीच एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता कैसे सुरक्षित रहे और राजनीतिक आरोपों की जांच किस प्रक्रिया के तहत हो?

SIR पर सियासी संग्राम, हरिद्वार से दिल्ली तक पहुंचा मामला!

याचिका में कहा गया है कि भारत निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। इसकी जिम्मेदारी देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित करना है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ SIR के क्रियान्वयन और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर विपक्षी राजनीतिक दल आरोप लगा रहे हैं। उनके इस्तीफे की मांग की जा रही है और विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं।

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि याचिकाकर्ता शांतिपूर्ण राजनीतिक विरोध अथवा निर्वाचन आयोग की वैध आलोचना के अधिकार का विरोध नहीं करते। उनका कहना है कि चिंता उस स्थिति को लेकर है, जिसमें किसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख पर कथित रूप से धमकी, जबरदस्ती या किसी अन्य गैरकानूनी माध्यम से दबाव बनाने की बात सामने आए।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि जांच में ऐसे किसी हस्तक्षेप की पुष्टि होती है, तो यह निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और नागरिकों के निष्पक्ष चुनाव संबंधी अधिकारों के लिए गंभीर विषय हो सकता है।

हालांकि, विपक्षी दलों के आरोपों और याचिकाकर्ताओं की आशंकाओं को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मामले की वास्तविक स्थिति तथ्यों और सक्षम प्राधिकारी की जांच से ही स्पष्ट होगी।

‘राजनीतिक विरोध पर रोक नहीं, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी’

याचिका के सातवें और आठवें बिंदु में याचिकाकर्ताओं ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा है कि शिकायत का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल की विचारधारा अथवा शांतिपूर्ण विरोध को रोकना नहीं है। इसके बजाय निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से काम करने देने पर जोर दिया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि किसी संवैधानिक पदाधिकारी के कामकाज में कोई वास्तविक त्रुटि सामने आती है, तो उसका परीक्षण संविधान और कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक व्यवस्था के संबंध में अनुच्छेद 324(5) का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि किसी गंभीर शिकायत का समाधान कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए, न कि किसी कथित गैरकानूनी दबाव के माध्यम से।

याचिका का केंद्रीय तर्क यही है कि राजनीतिक विरोध और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला, लेकिन अंतिम निर्णय पर अभी नजर

याचिका में 5 अक्टूबर 2026 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने की मांग से संबंधित मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम आदेश देने से इनकार किए जाने का उल्लेख भी किया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने इस घटनाक्रम को अपने तर्क के समर्थन में रखा है। उनका कहना है कि संवैधानिक पदाधिकारी के विरुद्ध किसी भी कार्रवाई के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।

हालांकि, अंतरिम राहत देने से इनकार किए जाने को किसी मामले में आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। न्यायालय के आदेश का वास्तविक अर्थ और दायरा उसके आधिकारिक पाठ के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए।

इसलिए इस घटनाक्रम को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों के खारिज होने के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

NHRC से तीन प्रमुख मांगें, केंद्र और निर्वाचन आयोग से रिपोर्ट लेने की अपील

याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से प्रमुख रूप से तीन प्रकार की कार्रवाई का अनुरोध किया गया है।

पहली मांग: केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से वर्तमान विवाद, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोपों तथा अपनाई गई संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया पर तथ्यात्मक रिपोर्ट प्राप्त की जाए।

दूसरी मांग: यदि जांच में किसी व्यक्ति या राजनीतिक समूह द्वारा धमकी, हिंसा, जबरदस्ती अथवा किसी अन्य गैरकानूनी माध्यम से मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयोग के स्वतंत्र कामकाज में हस्तक्षेप की पुष्टि होती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की संस्तुति की जाए।

तीसरी मांग: निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता और नागरिकों के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन संबंधी अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजी जाएं। याचिकाकर्ताओं ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 और धारा 17 का भी उल्लेख किया है। इन प्रावधानों के तहत आयोग की जांच संबंधी शक्तियों और रिपोर्ट मांगने की भूमिका का हवाला देते हुए मामले पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। आयोग इस याचिका पर क्या कदम उठाएगा, यह उसके अधिकार क्षेत्र और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

2027 के चुनावों से पहले संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर बहस तेज

आगामी चुनावों के मद्देनजर निर्वाचन आयोग की भूमिका और उसकी स्वतंत्रता को लेकर होने वाली बहस का राजनीतिक महत्व भी है। याचिकाकर्ताओं ने इसी संदर्भ में आयोग की निष्पक्षता और नागरिकों के चुनाव संबंधी अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया है। अब निगाहें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अगले कदम पर रहेंगी। क्या आयोग संबंधित पक्षों से रिपोर्ट मांगेगा? क्या याचिका में उठाए गए सवालों पर कोई औपचारिक कार्रवाई होगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब सामने आना बाकी है।

हरिद्वार से दाखिल इस याचिका ने राष्ट्रीय चुनावी विवाद में एक नया कानूनी पहलू जोड़ दिया है। एक तरफ SIR को लेकर विपक्ष के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समर्थन में संवैधानिक प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल उठाया गया है। अब आगे की तस्वीर तथ्यों, कानूनी प्रक्रिया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के रुख से साफ होगी। फिलहाल, इस पूरे मामले में किसी भी आरोप को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले संबंधित दस्तावेजों और सक्षम संस्थाओं की कार्रवाई का इंतजार करना जरूरी है।

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