सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,, 50 साल नहीं, मालिकाना हक़ असली दस्तावेज़ तय करेगा,, किरायेदार सिर्फ रहने का अधिकार रखता है, मालिक बनने का नहीं

इन्तजार रजा हरिद्वार- सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,,
50 साल नहीं, मालिकाना हक़ असली दस्तावेज़ तय करेगा,,
किरायेदार सिर्फ रहने का अधिकार रखता है, मालिक बनने का नहीं

देश में मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच वर्षों से चल रहे विवादों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किरायेदार चाहे 10 साल, 20 साल या 50 साल से रह रहा हो, वह घर का मालिक नहीं बन सकता। यह निवास केवल अनुमति पर आधारित होता है, मालिकाना हक़ पर नहीं।
कोर्ट ने कहा कि अब यह तर्क कि “हम तो पीढ़ियों से रह रहे हैं, इसलिए घर हमारा हो गया” किसी भी कानूनी लड़ाई में मान्य नहीं होगा। यह फैसला उन मकान मालिकों के लिए राहत की खबर है जिनके घरों में किरायेदार वर्षों से कब्ज़े जैसा व्यवहार कर रहे थे और अदालतों में मामला लंबित था।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि adverse possession (कब्जे के आधार पर मालिकाना हक़ पाने का सिद्धांत) किरायेदार पर लागू नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि किरायेदार चाहे जितने समय तक किराए के घर में रहे, वह इस आधार पर अधिकार नहीं जता सकता कि वह उस घर का मालिक बन गया है।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किराया समझौता एक कानूनी व्यवस्था है, न कि स्वामित्व का अधिकार। इसलिए उसे वही करना होगा जो किरायेदारी समझौते में लिखा है — यानी किराया देना, घर खाली करने की शर्तें मानना और मालिक के अधिकारों का सम्मान करना।
कई राज्यों में यह देखा जाता है कि किराये पर रहने वाले लोग धीरे-धीरे घर पर कब्ज़े का दावा करने लगते हैं, जबकि मालिक को अपने ही घर में असहाय स्थिति में रहना पड़ता है। ऐसे मामलों में अदालत का यह निर्णय आने वाले समय में कानूनी दिशा तय करेगा और न्याय व्यवस्था में स्पष्टता बढ़ाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से किराया कानूनों में नई मजबूती आएगी और अवैध कब्जों और लंबी मुकदमों की संख्या घटेगी। यह फैसला संपत्ति अधिकारों को मजबूती प्रदान करता है और साफ संदेश देता है कि कानून कब्ज़े को नहीं, मालिकाना हक़ को प्राथमिकता देता है।
वहीं मालिकों का कहना है कि यह फैसला संतोषजनक है क्योंकि वर्षों से कई लोग किराए के नाम पर मकानों को अपनी पीढ़ीगत संपत्ति जैसा इस्तेमाल कर रहे थे।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय किरायेदारों और घर मालिकों के अधिकारों की सीमाएं स्पष्ट करता है और संपत्ति विवादों में एक मजबूत मिसाल स्थापित करता है।



