पंचायत परिसर सलेमपुर आंगनबाड़ी केंद्र से एक्सपायरी आयरन दवाऐ और एक्सपायर्ड दूध भारी मात्रा में मिलने से मचा हड़कंप,, बच्चों की जान से खिलवाड़ या योजनाओं की कब्रगाह बना सलेमपुर ?,, सलेमपुर आंगनबाड़ी केंद्र से उठे सवालों ने हिलाया सिस्टम,, एक्सपायरी दवाइयां और दूध मिलने से मचा हड़कंप, क्या (कारण बताओं ”नोटिसबाजी’) से टल जायेगी कार्रवाई,, भ्रष्टाचार के ढेर पर सलेमपुर में सड़ती योजनाएं,, आखिर इतनी बड़ी मात्रा में दवाइयां और दूध एक्सपायर कैसे हो गया? क्या यह सामान उन बच्चों तक पहुंचा ही नहीं, जिनके लिए भेजा गया था? क्या पोषण योजना के तहत बनाया गया डाटा पूरी तरह से फर्जी था, जिससे यह दिखाया गया कि सामान वितरित हो चुका है?

इन्तजार रजा हरिद्वार- पंचायत परिसर सलेमपुर आंगनबाड़ी केंद्र से एक्सपायरी आयरन दवाऐ और एक्सपायर्ड दूध भारी मात्रा में मिलने से मचा हड़कंप,,
बच्चों की जान से खिलवाड़ या योजनाओं की कब्रगाह बना सलेमपुर ?,, सलेमपुर आंगनबाड़ी केंद्र से उठे सवालों ने हिलाया सिस्टम,,
एक्सपायरी दवाइयां और दूध मिलने से मचा हड़कंप, क्या (कारण बताओं ”नोटिसबाजी’) से टल जायेगी कार्रवाई,, भ्रष्टाचार के ढेर पर सलेमपुर में सड़ती योजनाएं,,
- आखिर इतनी बड़ी मात्रा में दवाइयां और दूध एक्सपायर कैसे हो गया?
- क्या यह सामान उन बच्चों तक पहुंचा ही नहीं, जिनके लिए भेजा गया था?
- क्या पोषण योजना के तहत बनाया गया डाटा पूरी तरह से फर्जी था, जिससे यह दिखाया गया कि सामान वितरित हो चुका है?
हरिद्वार | इन्तज़ार रज़ा
उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के ग्राम सलेमपुर मेहदूद में बच्चों की सेहत से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पंचायत परिसर स्थित आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 20 से भारी मात्रा में एक्सपायरी दवाइयां और मुख्यमंत्री पोषण योजना के तहत वितरित किया जाने वाला दूध खराब हालत में बरामद हुआ है। ये सामग्री उन बच्चों के लिए भेजी गई थी जो कुपोषण की कगार पर हैं, लेकिन यह पंचायत भवन में ही सड़ती मिली, जिससे स्पष्ट होता है कि योजना की क्रियान्वयन प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी है।
क्या फर्जी आंकड़ों के दम पर दिखाया गया वितरण, सवालिया निशान का रंग?
ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्र में अक्सर ताले लगे रहते हैं, बच्चों की उपस्थिति लगभग नाममात्र होती है, फिर भी सरकारी पोर्टल पर शत-प्रतिशत वितरण का दावा किया गया है। सवाल उठता है:
- क्या फर्जी लाभार्थियों के नाम दर्ज कर कागज़ों में वितरण दिखाया गया?
- क्या भौतिक सत्यापन कभी हुआ ही नहीं?
- यदि नहीं, तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सुपरवाइज़र और सीडीपीओ की भूमिका क्या थी?
यह मामला सीधे तौर पर फर्जी डाटा एंट्री और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, जहां योजना का उद्देश्य नहीं, फॉर्मेलिटी पूरी करना ही प्राथमिकता बन चुका है।
एक्सपायर्ड सड़े दूध और दवाओं के पीछे छुपे सिस्टम की सड़ांध
दूध और दवाएं केंद्र में ही क्यों पड़ी थीं? क्या इनका स्टॉक कभी अपडेट नहीं किया गया? क्या किसी अधिकारी ने कभी यह जांचा कि सामग्री वितरित हो रही है या नहीं?
यदि ये दवाएं और दूध एक्सपायर हो गए, तो इसका साफ अर्थ है कि इनका समय पर उपयोग ही नहीं किया गया। यानी यह पूरा मामला केवल यह नहीं कि लापरवाही हुई, बल्कि यह एक गंभीर चूक और संगठित तरीके से योजनाओं को फर्जी डाटा के माध्यम से सफल दिखाने का प्रयास रहा।
कारण बताओं ‘नोटिसबाजी’ से नहीं होगा समाधान – ज़रूरत है सख्त ऑडिट की
मामला सामने आते ही संबंधित विभागों ने ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर खानापूर्ति का आसान रास्ता निकाल रखा है। लेकिन यह तो वही पुराना ढर्रा है – नोटिस दो, जवाब लो, और फिर फाइल दबा दो।
- कोई एफआईआर नहीं
- कोई जिम्मेदार निलंबित नहीं
- कोई नाम सार्वजनिक नहीं
अगर योजना का फिजिकल आउटपुट और डिजिटल रजिस्टर मेल नहीं खाते, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि डेटा फर्जीवाड़ा हो सकता है।
क्या डिजिटल पोर्टल पर हुई होगी हेराफेरी –क्या कागज़ों में माल बांट दिया गया
राज्य सरकार की योजनाएं अब डिजिटल पोर्टल पर अपडेट होती हैं। लेकिन जब धरातल पर दूध और दवाएं सड़ी मिलीं, और पोर्टल पर “सभी लाभार्थियों को वितरण पूर्ण” दिखाया गया, तो सवाल यह है:
- क्या लाभार्थियों के नाम गठित करके वितरण दिखाया गया?
- क्या फर्जी हस्ताक्षर या प्रिंटेड रजिस्टर के जरिए यह खेल खेला गया?
- क्या ग्राम स्तरीय अधिकारियों ने कभी क्रॉस वेरिफिकेशन किया?
यह स्पष्ट करता है कि पोषण योजना का लाभ नहीं बच्चों तक गया, बल्कि डिजिटल सिस्टम में डाटा एंट्री करने वालों और निरीक्षण के नाम पर घूमने वालों के फायदे में गया।
क्या यहां सरकारी योजनाओं का डेटा मैनेजमेंट – महज एक झूठा आईना हो सकता है
इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं में डाटा मैनेजमेंट कैसे झूठ का आईना बनता जा रहा है। जबतक ऑडिट नहीं होगा, तब तक यह पता नहीं चलेगा कि:
- कितने बच्चों के नाम ‘डुप्लीकेट’ हैं?
- कितनी यूनिट दूध की वास्तव में वितरित हुई?
- किन-किन गांवों में भी ऐसी ही स्थिति है?
यह मामला एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सांठगांठ और सड़ांध का प्रमाण है।
CBI या SIT जांच नहीं तो कम से कम स्वतंत्र ऑडिट तो हो
ग्रामीणों की मांग है कि:
- पूरे ब्लॉक के आंगनबाड़ी स्टॉक की जांच स्वतंत्र एजेंसी से करवाई जाए
- लाभार्थियों के नाम, वितरण तिथि और हस्ताक्षरों की फिजिकल जांच की जाए
- पोषण योजना की डिजिटल एंट्री और जमीनी हकीकत को मिलाकर क्रॉस ऑडिट कराया जाए
यदि अब भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इससे न केवल बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में रहेगा, बल्कि यह प्रशासनिक निष्क्रियता की खुली छूट को दर्शाएगा।
क्या डाटा में खेल, ज़मीन पर फेल
ग्राम सलेमपुर मेहदूद की यह घटना इस बात का प्रमाण है कि योजनाओं की असफलता का असली कारण फील्ड में फर्जीवाड़ा और रिपोर्टिंग में हेराफेरी है। जबतक सरकारी योजना की मॉनिटरिंग केवल कम्प्यूटर स्क्रीन पर होती रहेगी और जमीनी हकीकत की जांच नहीं की जाएगी, तब तक सड़ी योजनाएं, सड़ी दवाइयां और सड़ा सिस्टम ही मिलेगा।
अब देखने वाली बात यह है कि प्रशासन इसको फाइलों में दबाते है या फिर मनरेगा घोटाले की तरह जिले भर में एक गंभीर जांच की शुरुआत करती है।
(‘Daily Live Uttarakhand’ के विशेष संवाददाता इन्तजार रजा की फील्ड रिपोर्टिंग पर आधारित )



