हरिद्वार भूमि घोटाले में शासन का निर्णायक हस्तक्षेप 4 वरिष्ठ अधिकारियों पर गिरी गाज, शासन ने भेजा कड़ा संदेश, जांच अधिकारी नियुक्त, दोषियों को सख्त सजा की तैयारी, क्या भुमि ‘कय’ में नियमों को किया गया नजरअंदाज, जांच अधिकारी नियुक्त, दस्तावेजों की गहन समीक्षा जांच शुरू, भ्रष्टाचार के विरुद्ध धामी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति
इन्तजार रजा हरिद्वार- हरिद्वार भूमि घोटाले में शासन का निर्णायक हस्तक्षेप
4 वरिष्ठ अधिकारियों पर गिरी गाज, शासन ने भेजा कड़ा संदेश,
जांच अधिकारी नियुक्त, दोषियों को सख्त सजा की तैयारी, क्या भुमि ‘कय’ में नियमों को किया गया नजरअंदाज, जांच अधिकारी नियुक्त, दस्तावेजों की गहन समीक्षा जांच शुरू, भ्रष्टाचार के विरुद्ध धामी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति

हरिद्वार | उत्तराखंड के धार्मिक नगर हरिद्वार से एक चौंकाने वाला भूमि घोटाला सामने आया है, जिसमें नगर निगम के भीतर कथित भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी के गंभीर आरोप लगे हैं। इस घोटाले को लेकर शासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, एक वरिष्ठ वित्त अधिकारी को कारण बताओ नोटिस भेजा है, तथा एक सेवानिवृत्त कर्मचारी का सेवा विस्तार रद्द करते हुए उसके खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। शासन द्वारा लिए गए इन कड़े निर्णयों को प्रशासनिक हलकों में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
क्या भुमि के ‘कय’ में भारी अनियमितता, नियमों को किया गया नजरअंदाज
यह पूरा प्रकरण सराय क्षेत्र की उस नगर निगम की भूमि से जुड़ा है, जिसे कथित रूप से नियमों को दरकिनार करते हुए अवैध रूप से ‘कय’ कर दिया गया। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि यह भूमि लेनदेन किसी वैध प्रक्रिया अथवा उच्च स्तर की स्वीकृति के बिना किया गया, जिससे न केवल सरकारी संपत्ति को नुकसान हुआ, बल्कि बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता की भी पुष्टि हुई।
सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल से संकेत मिले कि उक्त भूमि को कुछ चुनिंदा लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाने की मंशा से स्थानांतरित किया गया, जिससे शासन ने इस पूरे मामले की विस्तृत जांच की घोषणा की है।
चार अधिकारी निलंबित, भ्रष्टाचार पर सख्त रुख
शासन ने इस मामले में प्रथमदृष्टया दोषी पाए गए नगर निगम, हरिद्वार के चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। इनमें प्रभारी सहायक नगर आयुक्त श्री रविन्द्र कुमार दयाल, प्रभारी अधिशासी अभियंता श्री आनन्द सिंह मिश्रवाण, कर एवं राजस्व अधीक्षक श्री लक्ष्मीकांत भट्ट, और अवर अभियंता श्री दिनेश चन्द्र काण्डपाल शामिल हैं। निलंबन आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि इन अधिकारियों की भूमिका भूमि घोटाले में संदिग्ध पाई गई है और उनके विरुद्ध प्रारंभिक जांच में गंभीर लापरवाही के प्रमाण मिले हैं।
शासन ने यह भी स्पष्ट किया कि यह न केवल प्रशासनिक गलती है, बल्कि यह एक गहरा षड्यंत्र है जिससे सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर प्राइवेट हित साधे गए।
जांच अधिकारी नियुक्त, दस्तावेजों की गहन समीक्षा शुरू
उत्तराखंड शासन ने प्रकरण की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने के लिए गन्ना एवं चीनी विभाग के सचिव श्री रणवीर सिंह चौहान को जांच अधिकारी के रूप में नियुक्त किया है। उन्हें यह निर्देश दिया गया है कि वे इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों, प्रक्रियाओं, और निर्णयों की विस्तारपूर्वक समीक्षा कर सात कार्यदिवसों में रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
इस जांच में भूमि ‘कय’ प्रक्रिया के पीछे की सभी प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रियाओं की जांच की जाएगी—जैसे कि स्वीकृति पत्र, नगर निगम बोर्ड की बैठक के संकल्प, राजस्व रिकॉर्ड्स, और संपत्ति संबंधी अभिलेख। इससे उन सभी व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट होगी जिन्होंने या तो सीधे या परोक्ष रूप से इस अनियमितता में योगदान दिया।
वित्त अधिकारी को नोटिस, सेवा विस्तार रद्द
मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन ने नगर निगम की वरिष्ठ वित्त अधिकारी सुश्री निकिता बिष्ट को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। उनसे पूछा गया है कि क्यों न उनके खिलाफ भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। उन्हें अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए सात दिन का समय दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, सेवा विस्तार पर कार्यरत सेवानिवृत्त संपत्ति लिपिक श्री वेदपाल का सेवा विस्तार तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। उनके विरुद्ध उत्तराखंड सिविल सर्विसेज रेगुलेशन के अनुच्छेद 351(ए) के अंतर्गत अनुशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई है। यह निर्णय दर्शाता है कि शासन अब सेवानिवृत्त कर्मियों के सेवा विस्तार को ‘अनुशासन से परे’ मानने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाने के मूड में है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध धामी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति
इस मामले में की गई त्वरित और कठोर कार्रवाई दर्शाती है कि उत्तराखंड शासन अब शहरी निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगा। नगर निकायों में वर्षों से यह शिकायत रही है कि भूमि, भवन और संपत्ति के मामलों में पारदर्शिता का घोर अभाव है। अक्सर देखा गया है कि निगम की परिसंपत्तियों को मामूली दामों में निजी व्यक्तियों को सौंप दिया जाता है।
अब शासन की मंशा स्पष्ट है—भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस और अनियमितताओं पर तत्काल दंड।
लोक प्रतिक्रिया: कड़ी कार्रवाई की मांग
शासन की कार्रवाई पर हरिद्वार के नागरिकों की तीव्र प्रतिक्रिया सामने आई है। जहां कुछ नागरिकों ने सरकार की तत्परता और साहसिक निर्णयों की सराहना की है, वहीं बड़ी संख्या में लोग यह भी मांग कर रहे हैं कि केवल निलंबन से काम नहीं चलेगा, बल्कि दोषियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएं।
स्थानीय अधिवक्ताओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों का मानना है कि यदि दोषी अधिकारियों को दंडित नहीं किया गया तो यह कार्रवाई अधूरी मानी जाएगी और इससे गलत संदेश जाएगा।
भविष्य की दृष्टि: व्यापक ऑडिट और नीतिगत बदलाव की आवश्यकता
यह घोटाला केवल एक isolated घटना नहीं है। यह नगर निकायों में गहराई तक फैले भ्रष्टाचार की एक कड़ी है। शासन को इस अवसर का उपयोग करते हुए नगर निगमों की संपत्ति प्रबंधन प्रणाली में पारदर्शिता लाने, ई-गवर्नेंस अपनाने और नियमित ऑडिट व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता है।
सूत्रों के अनुसार, शासन निकट भविष्य में सभी नगर निकायों की संपत्ति संबंधी व्यवस्थाओं की स्वतंत्र ऑडिट कराने पर विचार कर रहा है, ताकि भविष्य में ऐसे घोटाले दोहराए न जा सकें।
हरिद्वार भूमि घोटाला एक चेतावनी है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र में थोड़ी सी ढील भी सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग का कारण बन सकती है। उत्तराखंड शासन की त्वरित और निर्णायक कार्रवाई एक मजबूत संदेश है कि भ्रष्टाचार को अब किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन यह लड़ाई तब तक अधूरी रहेगी जब तक दोषियों को कानून के अनुसार सजा न दी जाए और सिस्टम में स्थायी सुधार लागू न किए जाएं।



