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ऊर्जा निगमों में हड़ताल पर सख्ती,, उत्तराखंड सरकार ने तीनों पावर कंपनियों में लागू किया एस्मा,, अधिसूचना जारी होते ही हड़ताल पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध, उल्लंघन पर होगी कड़ी कार्रवाई

इन्तजार रजा हरिद्वार- ऊर्जा निगमों में हड़ताल पर सख्ती,,

उत्तराखंड सरकार ने तीनों पावर कंपनियों में लागू किया एस्मा,,

अधिसूचना जारी होते ही हड़ताल पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध, उल्लंघन पर होगी कड़ी कार्रवाई

देहरादून, 17 फरवरी 2026।
उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश की बिजली व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए तीनों ऊर्जा निगमों में एस्मा लागू कर दिया है। प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार अब राज्य की सभी प्रमुख बिजली कंपनियों में हड़ताल पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध रहेगा। आदेश के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित कर्मचारियों और संगठनों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

सरकार ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब ऊर्जा क्षेत्र में विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलन और विरोध की गतिविधियां तेज हो रही थीं। खासकर उत्पादन और परिसंपत्तियों से जुड़े मामलों में कर्मचारी संगठनों की नाराजगी सामने आ रही थी। शासन का स्पष्ट कहना है कि बिजली जैसी अत्यावश्यक सेवा में किसी भी प्रकार की बाधा आम जनता के हितों के खिलाफ होगी, इसलिए सख्त निर्णय लिया गया है।

यूपीसीएल, पिटकुल और यूजेवीएनएल में लागू हुआ कानून

सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के तहत राज्य की तीनों प्रमुख ऊर्जा कंपनियों —
(यूपीसीएल),
(पिटकुल) और
(यूजेवीएनएल)
में हड़ताल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।

इन तीनों निगमों में अब (एस्मा) प्रभावी रहेगा। इस कानून के तहत यदि कोई कर्मचारी या संगठन कार्य बहिष्कार, हड़ताल या सेवाओं में बाधा उत्पन्न करता है तो उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

ऊर्जा विभाग के सूत्रों के अनुसार, अधिसूचना जारी होते ही तीनों निगमों के प्रबंधन ने भी अपने-अपने स्तर पर आंतरिक आदेश जारी कर दिए हैं। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण की व्यवस्था हर हाल में निर्बाध बनी रहनी चाहिए।

आंदोलनों की पृष्ठभूमि में आया सख्त निर्णय

हाल के दिनों में ऊर्जा क्षेत्र में कई मुद्दों को लेकर असंतोष देखा गया। डाकपत्थर क्षेत्र में यूजेवीएनएल की जमीनों को निजी हाथों में सौंपने के आरोपों को लेकर कर्मचारी संगठनों और स्थानीय लोगों द्वारा आंदोलन चलाया जा रहा है। वहीं केंद्र सरकार के निजीकरण से जुड़े प्रस्तावित बिल के विरोध में भी ऊर्जा कर्मचारियों द्वारा एक दिवसीय हड़ताल की जा चुकी है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए शासन ने एहतियाती कदम उठाया है। सरकार का मानना है कि बिजली सेवा अत्यावश्यक श्रेणी में आती है और इसमें किसी भी प्रकार की रुकावट से अस्पतालों, पेयजल आपूर्ति, उद्योगों और आम नागरिकों पर सीधा असर पड़ सकता है।

ऊर्जा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य में लगातार बढ़ती बिजली मांग और आगामी गर्मी के मौसम को देखते हुए व्यवस्था बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसे में यदि हड़ताल होती है तो व्यापक जनहित प्रभावित हो सकता है।

सरकार का तर्क – जनहित सर्वोपरि

शासन का स्पष्ट संदेश है कि कर्मचारी अपनी मांगें संवैधानिक दायरे में रख सकते हैं, लेकिन अत्यावश्यक सेवाओं को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। एस्मा लागू करने का उद्देश्य किसी संगठन को निशाना बनाना नहीं, बल्कि जनहित की रक्षा करना है।

सरकार का कहना है कि वार्ता के रास्ते खुले हैं और यदि कर्मचारियों को किसी नीति या निर्णय से आपत्ति है तो वह संवाद के माध्यम से समाधान निकाल सकते हैं। लेकिन हड़ताल जैसी कार्रवाई अब कानूनन प्रतिबंधित रहेगी।

कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया पर निगाह

हालांकि अधिसूचना जारी होने के बाद कर्मचारी संगठनों की ओर से औपचारिक प्रतिक्रिया सामने आनी बाकी है, लेकिन माना जा रहा है कि इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। ऊर्जा क्षेत्र के संगठनों का कहना रहा है कि निजीकरण और परिसंपत्तियों के हस्तांतरण जैसे मुद्दों पर सरकार को पारदर्शिता बरतनी चाहिए।

अब देखना होगा कि सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच संवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि बिजली व्यवस्था से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

जनता पर क्या होगा असर?

एस्मा लागू होने के बाद फिलहाल बिजली आपूर्ति पर किसी व्यवधान की संभावना कम हो गई है। सरकार का दावा है कि उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए संतुलन जरूरी है — एक ओर कर्मचारियों की मांगें और दूसरी ओर आम जनता की जरूरतें। ऐसे में आने वाले दिनों में संवाद और समाधान की प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

उत्तराखंड सरकार का यह फैसला ऊर्जा क्षेत्र में अनुशासन और निरंतरता बनाए रखने की दिशा में एक सख्त प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कर्मचारी संगठन आगे क्या रुख अपनाते हैं और क्या वार्ता के जरिए गतिरोध समाप्त हो पाता है।

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