अलर्टइन्वेस्टिगेशनउत्तराखंडएक्सक्लूसिव खबरें

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का मुद्दा उठा राष्ट्रीय मंच पर,, हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दायर की याचिका,, भारत सरकार से कूटनीतिक हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की मांग

इन्तजार रजा हरिद्वार- बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का मुद्दा उठा राष्ट्रीय मंच पर,,

हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दायर की याचिका,,

भारत सरकार से कूटनीतिक हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की मांग

हरिद्वार। पड़ोसी देश में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ कथित अत्याचारों और हिंसक घटनाओं को लेकर हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने बड़ा कदम उठाया है। भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट, हरिद्वार की ओर से , नई दिल्ली में एक विस्तृत याचिका दायर कर इस पूरे प्रकरण में संज्ञान लेने की मांग की गई है।

याचिका अरुण भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदोरिया एडवोकेट (पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह) तथा चेतन भदोरिया (एलएलबी अध्ययनरत) द्वारा संयुक्त रूप से दाखिल की गई है। याचिका में सचिव, तथा सचिव, , भारत सरकार को विपक्षी पक्षकार बनाते हुए आयोग से आवश्यक अनुशंसा और कार्रवाई की अपील की गई है।

“यह केवल विदेशी घटना नहीं, मानवता का प्रश्न”

याचिका में कहा गया है कि बांग्लादेश में हिंदू समुदाय एक अल्पसंख्यक वर्ग है, जो पिछले कुछ वर्षों से विशेषकर हाल के समय में विभिन्न मीडिया रिपोर्टों, अंतरराष्ट्रीय समाचार स्रोतों और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार हिंसा और उत्पीड़न का सामना कर रहा है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि धार्मिक पहचान के आधार पर मंदिरों को नुकसान पहुंचाने, मूर्तियों की तोड़फोड़, हत्या, बलात्कार, अपहरण, मारपीट और जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि भय और असुरक्षा के कारण बड़ी संख्या में हिंदू परिवार पलायन को विवश हो रहे हैं। इसे केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा न मानकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में रखा गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अल्पसंख्यकों के अधिकार अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं और संधियों के तहत संरक्षित हैं और ऐसे मामलों में वैश्विक समुदाय की जिम्मेदारी बनती है।

भारत की नैतिक और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी पर जोर

याचिका में तर्क दिया गया है कि भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य राष्ट्र है और मानवाधिकारों की रक्षा का वैश्विक समर्थक रहा है। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते भारत की नैतिक और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसे मामलों में उचित कूटनीतिक पहल करे।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि बांग्लादेश में हिंदू समुदाय का भारत से ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहा है। इसलिए यह केवल एक विदेशी देश का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि मानवता, अल्पसंख्यक संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता से जुड़ा विषय है।हालांकि घटनाएं विदेशी क्षेत्राधिकार से संबंधित हैं, फिर भी याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास यह अधिकार है कि वह भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और कूटनीतिक दायित्वों के संदर्भ में आवश्यक अनुशंसा करे।

आयोग से की गई प्रमुख मांगें

याचिकाकर्ताओं ने आयोग से निम्नलिखित प्रमुख मांगें की हैं—

  1. गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से इस विषय में तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की जाए।
  2. भारत सरकार को आवश्यक कूटनीतिक पहल करने हेतु अनुशंसा की जाए।
  3. इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की सिफारिश की जाए।
  4. बांग्लादेश सरकार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बनाने का सुझाव दिया जाए।
  5. पीड़ित समुदाय को अंतरराष्ट्रीय संरक्षण और न्याय दिलाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाने की अनुशंसा की जाए।

याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह मामला किसी एक व्यक्ति या समूह का नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के अस्तित्व, सम्मान और सुरक्षा का प्रश्न है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

हरिद्वार से राष्ट्रीय स्तर तक गूंज

भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट द्वारा उठाया गया यह कदम हरिद्वार से राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बन गया है। अधिवक्ताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी देश विशेष के खिलाफ अभियान चलाना नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित कराना है।

अब देखना यह होगा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस याचिका पर किस प्रकार संज्ञान लेता है और केंद्र सरकार को क्या अनुशंसाएं करता है। यदि आयोग इस मामले को गंभीरता से लेता है, तो यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच सकता है। फिलहाल, हरिद्वार के अधिवक्ताओं की यह पहल एक संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय विषय को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का प्रयास मानी जा रही है, जिसमें मानवता, न्याय और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को केंद्र में रखा गया है।

Related Articles

Back to top button