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सरकारी अस्पताल की लापरवाही बनी शर्मनाक,, फर्श पर बच्चे को जन्म देने वाली गर्भवती महिला का मामला पहुँचा मानवाधिकार आयोग,, सीएमओ हरिद्वार से 8 दिसंबर तक मांगी गई स्पष्ट आख्या, कार्रवाई न होने पर कठोर आदेश की चेतावनी

धर्मनगरी हरिद्वार में एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया है। एक गर्भवती महिला को अस्पताल में भर्ती न किए जाने के कारण उसे अस्पताल के फर्श पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। यह घटना अब उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग, देहरादून की संज्ञान में आ चुकी है। आयोग ने इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) हरिद्वार से 8 दिसंबर 2025 तक विस्तृत आख्या (रिपोर्ट) तलब की है।

Intzar Raza Haridwar–सरकारी अस्पताल की लापरवाही बनी शर्मनाक,,
फर्श पर बच्चे को जन्म देने वाली गर्भवती महिला का मामला पहुँचा मानवाधिकार आयोग,,
सीएमओ हरिद्वार से 8 दिसंबर तक मांगी गई स्पष्ट आख्या, कार्रवाई न होने पर कठोर आदेश की चेतावनी

हरिद्वार, 13 नवंबर 2025 —
धर्मनगरी हरिद्वार में एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया है। एक गर्भवती महिला को अस्पताल में भर्ती न किए जाने के कारण उसे अस्पताल के फर्श पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। यह घटना अब उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग, देहरादून की संज्ञान में आ चुकी है। आयोग ने इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) हरिद्वार से 8 दिसंबर 2025 तक विस्तृत आख्या (रिपोर्ट) तलब की है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि आदेश के अनुरूप समय पर जवाब नहीं दिया गया तो आयोग “विचारोपरांत यथोचित आदेश” पारित कर सकता है। यह संकेत इस ओर इशारा करता है कि दोषियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ प्रशासनिक जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है।

इस गंभीर प्रकरण को लेकर हरिद्वार निवासी अरुण भदोरिया (एडवोकेट), कमल भदोरिया (एडवोकेट) और चेतन भदोरिया (एल.एल.बी. छात्र) ने मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड में एक औपचारिक याचिका दायर की थी। यह याचिका आयोग में दिनांक 16 अक्टूबर 2025 को रजिस्टर्ड की गई, जिसके बाद आयोग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई करते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी से जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ताओं ने आयोग को अवगत कराया कि महिला को प्रसव पीड़ा के बावजूद सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों ने भर्ती नहीं किया, जिससे उसे अस्पताल के फर्श पर ही प्रसव करना पड़ा। यह घटना न केवल मानवता के खिलाफ है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की संवेदनहीनता का जीवंत उदाहरण भी है।

आयोग ने अपने नोटिस में यह भी कहा है कि गर्भवती महिलाओं से इस तरह का व्यवहार स्वास्थ्य सेवाओं के मूल उद्देश्यों के विरुद्ध है। अस्पताल प्रशासन की यह लापरवाही न केवल नैतिक अपराध है बल्कि संविधान में निहित जीवन और गरिमा के अधिकार का खुला उल्लंघन भी है।

स्थानीय समाजसेवियों और अधिवक्ताओं ने इस मामले पर नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि हरिद्वार जैसे प्रमुख जिले में इस तरह की घटनाएं सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाती हैं। उन्होंने मांग की है कि दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में किसी भी गर्भवती महिला को इस तरह की पीड़ा न झेलनी पड़े। फिलहाल, अब सबकी निगाहें उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग और मुख्य चिकित्सा अधिकारी हरिद्वार के आगामी कदम पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मामले में पीड़िता को न्याय मिलेगा या फिर यह भी किसी फाइल में दबकर रह जाएगा।

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