कलियर शरीफ में उर्स-ए-मुबारक की रौनक,, 🟡 हज़रत बाबा गुलाम जिलानी साबरी को अकीदतमंदों का ख़िराज-ए-अक़ीदत,, 🔴 चादरपोशी, ग़ुस्ल और महफ़िल-ए-समाअ के साथ फ़िज़ा हुई रूहानी

इन्तजार रजा हरिद्वार 🟢 कलियर शरीफ में उर्स-ए-मुबारक की रौनक,,
🟡 हज़रत बाबा गुलाम जिलानी साबरी को अकीदतमंदों का ख़िराज-ए-अक़ीदत,,
🔴 चादरपोशी, ग़ुस्ल और महफ़िल-ए-समाअ के साथ फ़िज़ा हुई रूहानी
पिरान कलियर (हरिद्वार)। सूफी सिलसिले की रूहानी परंपराओं को जीवंत करते हुए हज़रत बाबा गुलाम जिलानी साबरी रहमतुल्लाह अलैह का 16वां सालाना उर्स मुबारक इस वर्ष बड़े अदब, एहतराम और अकीदत के साथ अंजाम पाया। तीन दिनों तक चले इस पाक मौके पर दरगाह शरीफ की फिज़ा इबादत, मोहब्बत और इंसानियत के पैग़ाम से सराबोर रही। देश के कोने-कोने से आए जायरीनों ने दरगाह पर हाज़िरी देकर चादर और फूल पेश किए तथा अपने दिलों की मुरादें लेकर दुआओं में मशगूल नजर आए।
उर्स की शुरुआत कुरआनख़्वानी और फ़ातेहा ख़्वानी से हुई, जिसके बाद दरगाह परिसर को रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया गया। शाम ढलते ही दरगाह की रौनक अपने शबाब पर पहुंच गई, जहां अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ पड़ा। हर ज़ुबान पर दुरूदो-सलाम और हर दिल में मोहब्बत का जज़्बा दिखाई दिया। सूफी परंपरा के मुताबिक, उर्स को एक रूहानी मिलन का दिन माना जाता है, जहां बंदा अपने रब से करीब होने की तलब में इबादत करता है।
उर्स के दौरान चादरपोशी की रस्म बेहद एहतराम के साथ अदा की गई। सज्जादा नशीन और दरगाह के खादिमों की सरपरस्ती में जायरीनों ने दरगाह पर चादर पेश कर अपनी अकीदत का इज़हार किया। इसके साथ ही ग़ुस्ल शरीफ की रस्म भी अदा की गई, जिसमें दरगाह को गुलाब जल और केवड़े की खुशबू से महकाया गया। इस मौके पर मौजूद अकीदतमंदों ने अपने हाथ उठाकर मुल्क में अमन-ओ-चैन, भाईचारे और तरक्की के लिए खास दुआएं मांगीं।
महफ़िल-ए-समाअ (कव्वाली) उर्स का खास हिस्सा रही, जहां मशहूर कव्वालों ने सूफियाना कलाम पेश कर महफिल में मौजूद लोगों के दिलों को रूहानी सुकून से भर दिया। “भर दो झोली मेरी” और “ताजदार-ए-हरम” जैसे कलामों पर अकीदतमंद झूम उठे और पूरा माहौल इश्क-ए-इलाही में डूबा नजर आया। यह महफ़िल देर रात तक जारी रही, जिसमें हर तबके के लोगों ने शिरकत की।
उर्स के समापन पर कुल शरीफ की रस्म अदा की गई, जिसमें कुरआन की तिलावत और खास दुआओं के साथ कार्यक्रम का इख़्तिताम हुआ। इस दौरान जायरीनों में लंगर (तबर्रुक) भी बड़े पैमाने पर तकसीम किया गया, जिसमें सभी ने बराबरी और भाईचारे का पैगाम महसूस किया। लंगर की व्यवस्था बेहद उम्दा रही, जहां दूर-दराज़ से आए मेहमानों के लिए खाने-पीने का मुकम्मल इंतजाम किया गया।इस मौके पर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और अन्य राज्यों के अलावा विदेशों से भी अकीदतमंदों ने शिरकत कर अपनी हाजिरी दर्ज कराई। दरगाह परिसर में हर तरफ “या साबिर” की सदाएं गूंजती रहीं, जो इस रूहानी आयोजन की खास पहचान बनी रहीं।
उर्स के सफल आयोजन में अंजुमन गुलामाने चिश्तिया साबरिया वेलफेयर सोसायटी, सज्जादा नशीन और दरगाह से जुड़े तमाम खादिमों का खास योगदान रहा। प्रशासन की ओर से भी सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर पुख्ता इंतजाम किए गए, जिससे जायरीनों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। हज़रत बाबा गुलाम जिलानी साबरी का यह सालाना उर्स मुबारक मोहब्बत, इंसानियत और सूफी परंपरा की बेहतरीन मिसाल बनकर सामने आया, जिसने हर दिल में अमन और भाईचारे का पैगाम छोड़ा।



