मां-बाप का सम्मान सिखाने वाला फैसला — हरिद्वार SDM जितेन्द्र कुमार की मिसाल,, कानून और संवेदना का संगम — बुजुर्गों के हक में आई ऐतिहासिक पहल,, जिन बच्चों ने छोड़ा था साथ, अब लौटे मां-बाप के चरणों में

इन्तजार रजा हरिद्वार – मां-बाप का सम्मान सिखाने वाला फैसला — हरिद्वार SDM जितेन्द्र कुमार की मिसाल,,
कानून और संवेदना का संगम — बुजुर्गों के हक में आई ऐतिहासिक पहल,,
जिन बच्चों ने छोड़ा था साथ, अब लौटे मां-बाप के चरणों में

हरिद्वार, 12 नवम्बर 2025 —
हरिद्वार प्रशासन ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने पूरे जिले ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा छेड़ दी है। उपजिलाधिकारी (SDM) जितेन्द्र कुमार द्वारा सुनाया गया यह निर्णय न केवल कानूनी रूप से मजबूत है बल्कि मानवीय संवेदना से भी भरपूर है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन अब बुजुर्गों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए भी उतनी ही तत्परता से काम करेगा जितना किसी बड़े आपराधिक मामले में करता है।
संतान की उपेक्षा पर प्रशासन की सख्ती
मामला हरिद्वार क्षेत्र का है, जहां कुछ वृद्ध माता-पिता ने अपने ही बच्चों के खिलाफ गुहार लगाई थी। वे बच्चे, जो कभी मां-बाप के प्यार और परिश्रम की बदौलत बड़े हुए, आज उन्हीं को घर से निकालने और संपत्ति पर कब्जा जमाने की कोशिश में लगे थे।
जब मामला प्रशासन के संज्ञान में आया तो SDM जितेन्द्र कुमार ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने न केवल वृद्ध दंपति की सुरक्षा सुनिश्चित की बल्कि उन नालायक बच्चों को यह सख्त संदेश भी दिया कि कानून अब माता-पिता के पक्ष में मजबूती से खड़ा है।यह आदेश “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007” के तहत सुनाया गया — एक ऐसा कानून जो अब तक कागज़ों तक ही सीमित था, लेकिन SDM जितेन्द्र कुमार ने उसे ज़मीन पर उतारकर समाज को झकझोर दिया।
सामाजिक चेतना का प्रतीक बना फैसला
स्थानीय बुजुर्ग समाजसेवियों ने इस निर्णय को सामाजिक चेतना का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला आने वाली पीढ़ियों को यह सोचने पर मजबूर करेगा कि मां-बाप केवल संपत्ति का साधन नहीं, बल्कि जीवन के सबसे पवित्र स्तंभ हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता गुरमीत सिंह ने कहा, “SDM साहब ने जो किया है, वह एक मिसाल है। आज जब समाज में रिश्तों की कद्र घट रही है, तब ऐसे प्रशासनिक फैसले एक नई उम्मीद देते हैं।” एक अन्य समाजसेवी फरजाना बेगम ने कहा, “यह फैसला उन सभी बुजुर्गों के लिए प्रेरणा है जो अपनों के बीच अकेलापन महसूस करते हैं। अब उन्हें भरोसा रहेगा कि प्रशासन उनके साथ है।”
हरिद्वार बना संवेदनशील प्रशासन की मिसाल
हरिद्वार जैसे धार्मिक शहर में यह फैसला आस्था और न्याय दोनों के संगम का उदाहरण बन गया है। यहां प्रशासन ने न केवल कानून के अनुसार कार्रवाई की बल्कि बुजुर्गों की भावनाओं को भी समझा।
फैसले के बाद SDM जितेन्द्र कुमार ने कहा, “हमारा मकसद सिर्फ आदेश देना नहीं है, बल्कि समाज को यह संदेश देना है कि मां-बाप की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। जो संतान इसका पालन नहीं करती, वह कानून के साथ-साथ समाज की नजर में भी अपराधी है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिले में ऐसे मामलों पर लगातार निगरानी रखी जाएगी और किसी भी वृद्ध व्यक्ति के साथ अन्याय होने पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
जनता ने जताई प्रशंसा, बच्चों को मिला सबक
फैसले की खबर जैसे ही शहर में फैली, सोशल मीडिया से लेकर मंदिर गलियों तक इस पर चर्चा शुरू हो गई। लोगों ने कहा कि यह फैसला “बेटों-बेटियों को आईना दिखाने वाला कदम” है।कई परिवारों ने इसे घर-घर में शिक्षा देने वाला निर्णय बताया।एक स्थानीय महिला ने कहा, “अगर हर जगह ऐसे SDM हों तो कोई मां-बाप अपने ही बच्चों से तंग नहीं होंगे।”कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश प्रशासनिक सख्ती के साथ मानवीय करुणा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे समाज में यह संदेश गया है कि कानून अब केवल अपराधियों के लिए नहीं, बल्कि उन माता-पिता के लिए भी है जिनकी आंखों में अपनों के लिए अब भी उम्मीद बाकी है।
अब लौटे मां-बाप के चरणों में वे बच्चे
सबसे भावुक दृश्य तब देखने को मिला जब आदेश के बाद वे ही बच्चे, जिन्होंने मां-बाप को घर से निकाल दिया था, उनके पास लौटकर माफी मांगते नजर आए।
बुजुर्ग दंपति की आंखों में आंसू थे, पर उनमें गुस्सा नहीं, संतोष और राहत झलक रही थी। उन्होंने कहा — “हमें अब विश्वास है कि सरकार और प्रशासन हमारे साथ हैं। जो हमने खोया था, वह आज हमें लौट आया है — सम्मान।”
भविष्य के लिए मिसाल
इस फैसले ने प्रशासनिक इतिहास में नई रेखा खींच दी है। अब यह केवल एक आदेश नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत बन गया है — “सम्मान दो, वरना कानून सिखाएगा।” समाजशास्त्रियों का मानना है कि यदि देशभर में ऐसे कदम उठाए जाएं तो बुजुर्गों के खिलाफ बढ़ रहे अत्याचारों पर लगाम लगाई जा सकती है।
हरिद्वार का यह फैसला आने वाले समय में राष्ट्रीय उदाहरण के रूप में देखा जाएगा।यह केवल एक बुजुर्ग दंपति की जीत नहीं, बल्कि हर मां-बाप के आत्मसम्मान की जीत है।SDM जितेन्द्र कुमार का यह फैसला न केवल हरिद्वार की प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि जब कानून और संवेदना साथ खड़े हों तो समाज में बदलाव अवश्य आता है।यह आदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए यह सीख छोड़ गया है —
👉 “जिन्होंने हमें चलना सिखाया, उनके कदमों की धूल ही हमारी पूंजी है।”



