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साबरी गेस्ट हाउस के कमरों पर कब्जे का विवाद गरमाया, अनीस कस्सार के 2011 के आवंटन दावे के साथ मौ. रफी के कथित अवैध कब्जे पर भी सवाल,, सुपरवाइजर की तहरीर में अनीस कस्सार पर ताला तोड़ने और दरगाह का सामान खुर्द-बुर्द करने का आरोप, अनीस बोले—“2011 में मेरे नाम आवंटित हुए थे कमरे, किराये की रसीद और पूरी फाइल मौजूद,, एक तरफ कमरे पर कार्रवाई के लिए पुलिस तक पहुंचा दरगाह प्रशासन, दूसरी तरफ दक्षिणी गेट परिसर में मौ. रफी के वर्षों पुराने अवैध कथित कब्जे पर कार्रवाई को लेकर उठे सवाल—“एक के लिए तहरीर, दूसरे के लिए खामोशी क्यों?”

लेकिन दरगाह संपत्ति के मामले में दो अलग-अलग कानून नहीं चल सकते—एक के लिए पुलिस तहरीर और दूसरे के लिए कथित खामोशी, यही सवाल अब सबसे ज्यादा चुभ रहा है। निष्पक्ष जांच हो, सभी रिकॉर्ड सामने आएं और जिसके पास वैध अधिकार है वह सामने आए—यही इस पूरे विवाद का सबसे साफ और न्यायसंगत समाधान है।,,एक मामले में प्रशासन अचानक सक्रिय हो और दूसरे मामले में वर्षों तक फाइल धूल खाती रहे।

साबरी गेस्ट हाउस के कमरों पर कब्जे का विवाद गरमाया, अनीस कस्सार के 2011 के आवंटन दावे के साथ मौ. रफी के कथित अवैध कब्जे पर भी सवाल,,

सुपरवाइजर की तहरीर में अनीस कस्सार पर ताला तोड़ने और दरगाह का सामान खुर्द-बुर्द करने का आरोप, अनीस बोले—“2011 में मेरे नाम आवंटित हुए थे कमरे, किराये की रसीद और पूरी फाइल मौजूद,,

एक तरफ कमरे पर कार्रवाई के लिए पुलिस तक पहुंचा दरगाह प्रशासन, दूसरी तरफ दक्षिणी गेट परिसर में मौ. रफी के वर्षों पुराने अवैध कथित कब्जे पर कार्रवाई को लेकर उठे सवाल—“एक के लिए तहरीर, दूसरे के लिए खामोशी क्यों?”

रुड़की/कलियर। पिरान कलियर स्थित दरगाह साबिर पाक की संपत्तियों को लेकर विवाद अब महज एक कमरे के ताले और कब्जे के आरोप तक सीमित नहीं रह गया है। साबरी गेस्ट हाउस के कमरों को लेकर सामने आई तहरीर, वर्ष 2011 के कथित आवंटन से जुड़े दस्तावेज और दरगाह परिसर की दूसरी संपत्तियों पर कथित कब्जे के आरोपों ने दरगाह प्रशासन की संपत्ति प्रबंधन व्यवस्था पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक तरफ दरगाह के सुपरवाइजर मोहम्मद हारून ने पुलिस को तहरीर देकर लंढौरा निवासी अनीस कस्सार पर कमरों का ताला तोड़ने, अंदर रखा दरगाह का सामान अस्त-व्यस्त करने और कब्जे की कोशिश करने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ अनीस कस्सार इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए दावा कर रहे हैं कि संबंधित दो कमरे वर्ष 2011 में उनके नाम आवंटित किए गए थे और उनके पास किराया जमा करने की रसीद भी मौजूद है।

विवाद यहीं खत्म नहीं होता। दरगाह की दूसरी संपत्ति को लेकर मौ. रफी के वर्षों पुराने कथित कब्जे पर भी पहले से सवाल उठते रहे हैं। इस मामले में सवाल यह है कि अगर दरगाह प्रशासन अपनी संपत्ति को लेकर इतना गंभीर है कि एक मामले में पुलिस को तहरीर दी जा रही है, तो वर्षों से चले आ रहे दूसरे कथित कब्जे की फाइल पर कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? प्रकाशित रिपोर्ट में भी इस कथित कब्जे की निष्पक्ष जांच और समान कार्रवाई की मांग उठाई गई है।

2011 का आवंटन सामने आया तो पूरी कहानी बदल गई

अनीस कस्सार का कहना है कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे कब्जे के आरोप बेबुनियाद हैं। उनका दावा है कि वर्ष 2011 में वक्फ बोर्ड के आदेश के आधार पर उन्हें साबरी गेस्ट हाउस के पीछे दो कमरों का आवंटन किया गया था।

सामने आए दस्तावेजों में भी 17 जून 2011 के आदेश के अनुपालन में दो कमरों के आवंटन तथा 150 रुपये प्रतिमाह किराये का उल्लेख दिखाई देता है। संबंधित प्रार्थना पत्र में किराया जमा करने और उसकी रसीद दिए जाने का अनुरोध भी किया गया था।

यानी अब मामला केवल यह कह देने से खत्म नहीं हो सकता कि “कमरे पर कब्जा कर लिया गया।” यदि 2011 का आवंटन दस्तावेज वास्तव में अधिकृत रिकॉर्ड का हिस्सा है, तो उसकी वैधता, निरस्तीकरण और वर्तमान स्थिति की जांच जरूरी है।

दूसरी ओर, हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह सवाल भी उठाया गया है कि संबंधित कमरों के आवंटन में सक्षम अधिकारियों की स्वीकृति और नियमों का पालन हुआ था या नहीं। रिपोर्ट में तत्कालीन दरगाह प्रबंधक और सुपरवाइजर की भूमिका तथा किराये की रसीद काटे जाने के आधार पर भी सवाल उठाए गए हैं।

150 रुपये महीना किराया, फिर 10,650 रुपये और आगे की बकाया राशि—फाइल में क्या छिपा है?

मामले को गंभीर बनाने वाला दूसरा दस्तावेज वर्ष 2019 की प्रशासनिक रिपोर्ट है। इसमें उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर किराये की गणना और बकाया राशि का उल्लेख है।

दस्तावेज के अनुसार 150 रुपये प्रतिमाह की दर से एक अवधि का किराया 10,650 रुपये बताया गया और आगे की अवधि के बकाये को लेकर भी कार्रवाई की बात कही गई।

इससे साफ है कि कमरों के संबंध में वर्षों तक किराये और आवंटन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर पत्रावली चलती रही। ऐसे में अब सवाल यह है कि यदि अनीस कस्सार का आवंटन ही गलत था, तो उस आवंटन को कब और किस आदेश से समाप्त किया गया?

क्या 2011 का आवंटन निरस्त हुआ था?

क्या किराया रसीदें आधिकारिक थीं?

किस खाते में किराया जमा हुआ?

2017 में यदि कमरे खाली कराए गए तो उसकी लिखित कार्रवाई क्या थी?

और सबसे बड़ा सवाल—2019 में बकाया किराये की रिपोर्ट बनने के बाद मामले का अंतिम निस्तारण क्या हुआ?

अनीस का दावा—“रसीद भी है, फाइल भी है, फिर कब्जाधारी कैसे?”

अनीस कस्सार ने आरोपों को राजनीतिक और व्यक्तिगत छवि खराब करने की कोशिश बताया है। उनका कहना है कि उनके पास करीब 15 हजार रुपये किराया जमा करने की रसीद मौजूद है और संबंधित किराया रसीद की जानकारी दरगाह के सुपरवाइजर मोहम्मद हारून को भी है।उनका दावा है कि कमरों के आवंटन से संबंधित फाइल भी दरगाह कार्यालय में मौजूद है।

अनीस ने यह भी आरोप लगाया कि दरगाह की संपत्तियों पर अन्य लोगों के कथित कब्जे के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने खुद को भाजपा समर्थित बताते हुए कहा कि उनकी राजनीतिक पहचान के कारण उनकी छवि खराब करने का प्रयास किया जा रहा है।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच का विषय है, लेकिन यदि अनीस द्वारा बताई जा रही रसीद और आवंटन फाइल आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं तो उन्हें जांच के दौरान सामने रखना बेहद जरूरी होगा।

अब मौ. रफी का मामला क्यों बन गया बड़ा सवाल?

यही वह बिंदु है जहां दरगाह प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल और तीखे हो जाते हैं।

दरगाह परिसर के दक्षिणी गेट क्षेत्र में मौ. रफी के वर्षों से कथित रूप से एक भवन पर कब्जे का आरोप पहले भी उठ चुका है। प्रकाशित रिपोर्ट में स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं के हवाले से कहा गया था कि मौ. रफी लंबे समय से वहां रह रहे हैं और दरगाह की बिजली-पानी सहित अन्य सुविधाओं के इस्तेमाल के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि उनके पास वैध अनुमति या आवंटन है तो वह रिकॉर्ड सामने आना चाहिए और यदि अनुमति नहीं है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

यहीं से दरगाह प्रशासन के लिए सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—

अगर अनीस कस्सार के मामले में कमरा खाली कराने और पुलिस कार्रवाई की जरूरत महसूस की जा रही है, तो मौ. रफी के कथित वर्षों पुराने कब्जे की फाइल पर क्या कार्रवाई हुई?

क्या उन्हें नोटिस दिया गया?

क्या उनके पास कोई वैध आवंटन है?

अगर आवंटन नहीं है तो कमरा अब तक खाली क्यों नहीं कराया गया?

दरगाह की बिजली-पानी अथवा अन्य संसाधनों का इस्तेमाल हुआ तो उसका हिसाब किसने लिया?

इन सवालों को दरगाह प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट करना चाहिए।

“मौ. रफी का नाम आते ही दरगाह दफ्तर से लेकर सिस्टम तक खामोश क्यों?”

यही इस पूरे विवाद का सबसे आक्रामक और अहम सवाल बनकर सामने आया है।

स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि मौ. रफी का नाम सामने आते ही दरगाह कार्यालय से लेकर पूरे प्रशासनिक सिस्टम में खामोशी छा जाती है। हालांकि यह एक आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन यदि दरगाह प्रशासन अपनी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है तो उसे इस आरोप को भी रिकॉर्ड के आधार पर खारिज या साबित करना चाहिए।

क्योंकि कानून का पैमाना व्यक्ति देखकर नहीं बदल सकता।

यदि एक कथित कब्जे के खिलाफ तहरीर दी जा सकती है तो दूसरे कथित कब्जे की जांच भी होनी चाहिए। यदि एक व्यक्ति से किराये और संपत्ति के इस्तेमाल का हिसाब मांगा जा सकता है तो वही व्यवस्था दूसरे व्यक्ति पर भी लागू होनी चाहिए।

यही पारदर्शिता है, यही जवाबदेही है और यही दरगाह की संपत्ति के संरक्षण का वास्तविक पैमाना होना चाहिए।

एक मामले में पुलिस तक पहुंची शिकायत, दूसरे में वर्षों से कथित खामोशी

साबरी गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 16 को लेकर भी दरगाह प्रशासन द्वारा पुलिस को शिकायत दिए जाने की बात सामने आई है। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कमरा नंबर 16 पर करीब दस माह से कथित कब्जे, ताला तोड़ने और सामान खुर्द-बुर्द करने जैसे आरोप लगाए गए हैं। इसी रिपोर्ट में मौ. रफी के कथित पुराने कब्जे की तुलना करते हुए समान कार्रवाई की मांग उठाई गई थी।

यानी अब सवाल केवल अनीस कस्सार बनाम दरगाह प्रशासन का नहीं रह गया है।

सवाल है—

दरगाह की संपत्ति पर कब्जे के मामलों में नियम एक हैं या अलग-अलग?

क्या कार्रवाई व्यक्ति देखकर होगी या दस्तावेज देखकर?

क्या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग और आम व्यक्ति के लिए अलग पैमाना है?

अगर ऐसा नहीं है तो दरगाह प्रशासन को सभी मामलों की एक साथ निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।

कमरों की फाइल खुलेगी तो कई सवालों के जवाब मिलेंगे

मामले की निष्पक्ष जांच के लिए केवल पुलिस तहरीर पर्याप्त नहीं होगी। दरगाह प्रशासन और वक्फ बोर्ड को संबंधित मूल रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए—

  • 17 जून 2011 का मूल आवंटन आदेश।
  • दोनों कमरों की आवंटन फाइल।
  • 150 रुपये प्रतिमाह किराये का रिकॉर्ड।
  • कथित 15 हजार रुपये जमा की रसीद।
  • 2016-17 का नोटिस।
  • वर्ष 2019 की बकाया किराये की रिपोर्ट।
  • वर्ष 2017 में कमरा खाली कराने की कथित कार्रवाई का रिकॉर्ड।
  • कमरा नंबर 16 की वर्तमान स्थिति।
  • दक्षिणी गेट परिसर में मौ. रफी के कथित कब्जे से संबंधित रिकॉर्ड।
  • यदि मौ. रफी के पास कोई वैध आवंटन/अनुमति है तो उसकी प्रति।
  • बिजली-पानी एवं अन्य संसाधनों के भुगतान का हिसाब।

दरगाह संपत्ति निजी जागीर नहीं, हर कब्जे का हिसाब जरूरी

दरगाह की संपत्ति किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं हो सकती। यदि किसी व्यक्ति के पास वैध आवंटन है तो उसे रिकॉर्ड में स्पष्ट होना चाहिए। यदि किराया निर्धारित है तो उसकी नियमित वसूली होनी चाहिए। यदि कोई कब्जा अवैध पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है जब एक मामले में प्रशासन अचानक सक्रिय हो और दूसरे मामले में वर्षों तक फाइल धूल खाती रहे।

इसलिए अब दरगाह प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह आरोपों से ऊपर उठकर अपने रिकॉर्ड को सार्वजनिक जांच के लिए खोले।

अब फैसला तहरीर नहीं, दस्तावेज करेंगे

अनीस कस्सार के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच पुलिस करेगी। ताला किसने तोड़ा, सामान किसने हटाया और कब्जे की कोशिश हुई या नहीं—यह जांच का विषय है।

लेकिन साथ ही 2011 के आवंटन की वैधता भी जांचनी होगी।

इसी तरह मौ. रफी के कथित पुराने कब्जे को लेकर भी यदि कोई वैध आवंटन है तो उसे सामने रखा जाए। अगर नहीं है तो वर्षों से चली आ रही स्थिति पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, इसका जवाब भी दरगाह प्रशासन को देना चाहिए।

क्योंकि सवाल किसी एक अनीस कस्सार या मौ. रफी का नहीं है। सवाल यह है कि दरगाह साबिर पाक की संपत्ति का मालिकाना रिकॉर्ड, आवंटन व्यवस्था, किराया वसूली और कब्जे की निगरानी आखिर किस सिस्टम के भरोसे चल रही है?

अब वक्त आरोप लगाने से ज्यादा पूरी फाइल खोलने का है।

अगर अनीस का आवंटन वैध है तो रिकॉर्ड उनके पक्ष में बोलेगा। अगर अवैध है तो कार्रवाई होनी चाहिए। अगर मौ. रफी का कब्जा वैध है तो उनका दस्तावेज सामने आना चाहिए। अगर कथित कब्जा अवैध है तो कार्रवाई का रास्ता साफ होना चाहिए।

लेकिन दरगाह संपत्ति के मामले में दो अलग-अलग कानून नहीं चल सकते—एक के लिए पुलिस तहरीर और दूसरे के लिए कथित खामोशी, यही सवाल अब सबसे ज्यादा चुभ रहा है।

निष्पक्ष जांच हो, सभी रिकॉर्ड सामने आएं और जिसके पास वैध अधिकार है वह सामने आए—यही इस पूरे विवाद का सबसे साफ और न्यायसंगत समाधान है।

नोट: मौ. रफी और अनीस कस्सार से जुड़े कब्जे/आवंटन संबंधी दावे इस रिपोर्ट में उपलब्ध दस्तावेजों, संबंधित पक्षों के कथनों और पूर्व प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर रखे गए हैं। किसी व्यक्ति के कब्जे को अंतिम रूप से अवैध घोषित करने का अधिकार सक्षम प्राधिकारी/न्यायिक प्रक्रिया को है। मौ. रफी का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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