शांतरशाह में ‘पौधरोपण’ पर बवाल की निकली हवा! किसानों ने कहा—न फसल बर्बाद हुई, न सिंचाई विभाग से शिकायत; फिर विरोध के पीछे कौन? नदी कटाव रोकने की मुहिम पर उठे सवालों के बीच मैदान में उतरे सिंचाई विभाग के अफसर, 2,000 से 2,500 पौधे नष्ट करने का आरोप; सरकारी जमीन के कथित अवैध रास्ते पर JCB का एक्शन, जांच के बाद होगी कार्रवाई!…. अधिशासी अभियंता विकास त्यागी की दोटूक—जांच में दोषी मिले तो होगी कानूनी कार्रवाई!

शांतरशाह में ‘पौधरोपण’ पर बवाल की निकली हवा! किसानों ने कहा—न फसल बर्बाद हुई, न सिंचाई विभाग से शिकायत; फिर विरोध के पीछे कौन?
नदी कटाव रोकने की मुहिम पर उठे सवालों के बीच मैदान में उतरे सिंचाई विभाग के अफसर, 2,000 से 2,500 पौधे नष्ट करने का आरोप; सरकारी जमीन के कथित अवैध रास्ते पर JCB का एक्शन, जांच के बाद होगी कार्रवाई!…. अधिशासी अभियंता विकास त्यागी की दोटूक—जांच में दोषी मिले तो होगी कानूनी कार्रवाई!

हरिद्वार/शांतरशाह। नदी किनारे सरकारी जमीन, पौधरोपण को लेकर विवाद और किसानों की फसल बर्बाद होने के आरोप! शांतरशाह में पिछले दिनों गरमाए मामले की जब अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर पड़ताल की, तो तस्वीर के कई पहलू सामने आए। सोशल मीडिया पर फसल नष्ट किए जाने की चर्चाओं के बीच कई पट्टाधारकों ने साफ कहा कि उनकी फसल को कोई नुकसान नहीं हुआ और उन्हें सिंचाई विभाग के पौधरोपण अभियान से कोई परेशानी नहीं है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने पौधरोपण के दौरान कर्मचारियों के साथ कथित अभद्रता और लगाए गए पौधों को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए हैं। मामला अब केवल पौधे लगाने या हटाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में बरसाती नदी से होने वाला मिट्टी का कटाव, सरकारी भूमि का संरक्षण और क्षेत्र में कथित अवैध खनन की शिकायतें भी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर भूमि संरक्षण के लिए चलाए जा रहे अभियान को लेकर विवाद क्यों खड़ा हुआ और इसके पीछे की वास्तविक वजह क्या है?
मौके पर पहुंचे अधिकारी, पट्टाधारकों से आमने-सामने बातचीत
विवाद की वास्तविक स्थिति जानने के लिए उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता विकास त्यागी और एसडीओ भारत भूषण शर्मा ने मौके का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने स्थानीय ग्रामीणों और भूमि पट्टाधारकों से बातचीत कर उनकी समस्याएं जानीं। इस दौरान कई लोगों ने फसल बर्बाद होने की बात से इनकार किया। ग्रामीणों का कहना था कि नदी के किनारे मिट्टी का कटाव रोकने के लिए पेड़ लगाए जा रहे हैं, तो इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। कुछ पट्टाधारकों ने यह भी स्पष्ट किया कि सिंचाई विभाग से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। शिवपाल, विजेंद्र और अन्य ग्रामीणों के बयानों में भी जमीन के पट्टों तथा फसल को नुकसान होने के सवाल पर अलग-अलग बातें सामने आईं, लेकिन मौके पर बातचीत के दौरान कई पट्टाधारकों ने पौधरोपण से किसी नुकसान की बात स्वीकार नहीं की। हालांकि, इन बयानों के आधार पर पूरे विवाद का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। जमीन के पट्टों, राजस्व अभिलेखों और विभागीय सीमाओं की जांच से ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
विकास त्यागी का दावा—अवैध खनन की शिकायतों के बाद शुरू हुआ अभियान
सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता विकास त्यागी ने बताया कि शांतरशाह क्षेत्र में बरसात के दौरान नदी का तेज बहाव किनारों की मिट्टी को बहा ले जाता है। इससे जमीन के कटाव और क्षरण का खतरा बना रहता है। विभाग को क्षेत्र में कथित अवैध खनन की शिकायतें भी प्राप्त हुई थीं।उन्होंने बताया कि सरकारी भूमि के संरक्षण, पर्यावरण को बढ़ावा देने और अनधिकृत गतिविधियों पर रोक लगाने के उद्देश्य से पौधरोपण अभियान शुरू किया गया था। विभाग का कहना है कि नदी किनारे खाली पड़ी भूमि पर हरियाली विकसित करने से मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद मिल सकती है। विकास त्यागी के मुताबिक, पौधरोपण शुरू होने के बाद विभागीय कर्मचारियों को कथित तौर पर डराने-धमकाने और उनके साथ अभद्रता करने की शिकायतें सामने आईं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अभियान के तहत लगाए गए करीब 2,000 से 2,500 पौधों को नुकसान पहुंचाया गया। यह विभाग की ओर से लगाए गए आरोप हैं। पौधों को नुकसान पहुंचाने वालों की पहचान और घटना की परिस्थितियों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
नदी के कटाव से बचाव की योजना, किसानों के हित का भी दावा
विभागीय अधिकारियों के अनुसार, बरसाती नदी का बहाव कई बार इतना तेज होता है कि किनारों की उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। इससे जमीन के क्षरण का खतरा बढ़ जाता है। पौधरोपण अभियान का उद्देश्य नदी किनारे हरियाली बढ़ाने के साथ भूमि को सुरक्षित रखने का प्रयास करना है।विभाग का कहना है कि इस कार्य में स्थानीय लोगों, ग्राम पंचायत और संबंधित विभागों के सहयोग की भूमिका महत्वपूर्ण है। भूमि का कटाव रुकेगा तो आसपास की कृषि भूमि को भी भविष्य में लाभ मिल सकता है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पट्टाधारक को वास्तव में फसल या जमीन से संबंधित नुकसान हुआ है, तो उसकी शिकायत की जांच की जानी चाहिए। भूमि के अधिकारों और पट्टों की शर्तों का सम्मान करते हुए ही संबंधित कार्रवाई की वैधानिकता सुनिश्चित की जा सकती है।
सरकारी जमीन पर कथित अवैध रास्ता बंद, JCB से खुदवाया गड्ढा
मौके के निरीक्षण के दौरान सिंचाई विभाग ने सरकारी भूमि की सुरक्षा के लिए एक और कार्रवाई की। विभाग के अनुसार, उसकी जमीन से निकाले जा रहे कथित अवैध रास्ते को बंद कराने के लिए जेसीबी मशीन से गड्ढा खुदवाया गया और सीमेंट के पिलर लगवाए गए। इस कार्रवाई का उद्देश्य विभागीय भूमि को सुरक्षित रखना और भविष्य में अनधिकृत रास्ते या अतिक्रमण की आशंका को रोकना बताया गया। विभाग ने संकेत दिया कि भूमि संरक्षण और अवैध गतिविधियों से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा। हालांकि, रास्ते की स्थिति, भूमि के स्वामित्व और कार्रवाई की वैधानिकता का निर्धारण संबंधित अभिलेखों और नियमों के अनुसार किया जाना आवश्यक है।
पिछले साल भी बनाई गई थी टास्क फोर्स
अधिशासी अभियंता विकास त्यागी ने बताया कि पिछले वर्ष भी क्षेत्र में कथित अवैध खनन की गतिविधियों को रोकने के लिए टास्क फोर्स गठित कर रात्रि गश्त कराई गई थी। विभाग का दावा है कि इस दौरान खनन गतिविधियों पर रोक लगाने के प्रयास किए गए। अब पौधरोपण के दौरान लगाए गए पौधों को नुकसान पहुंचाने और कर्मचारियों को धमकाने की शिकायतों की जांच की जा रही है। विभाग ने कहा है कि संबंधित व्यक्तियों की पहचान होने पर नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
अब जांच खोलेगी पूरे विवाद की परतें
शांतरशाह में मौके पर हुई बातचीत के बाद फसल बर्बादी के आरोपों पर सवाल जरूर खड़े हुए हैं, लेकिन पूरे मामले का निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। एक तरफ कई पट्टाधारक नुकसान से इनकार कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ विभाग पौधों को नुकसान पहुंचाने और कथित अवैध गतिविधियों की शिकायतों की जांच कर रहा है।
अब निगाहें विभागीय जांच और भूमि अभिलेखों पर टिकी हैं। यदि पौधों को नुकसान पहुंचाने वालों की पहचान होती है, तो विभाग नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है। वहीं, यदि किसी किसान की वास्तविक शिकायत सामने आती है, तो उसका निष्पक्ष समाधान भी जरूरी होगा।शांतरशाह में विवाद के बीच फिलहाल सिंचाई विभाग ने भूमि संरक्षण की मुहिम जारी रखने का रुख अपनाया है। अब देखना होगा कि जांच में कौन-से तथ्य सामने आते हैं और नदी किनारे सरकारी जमीन को सुरक्षित रखने की यह मुहिम आगे क्या रूप लेती है।



