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हरिद्वार में सूखी नदी किनारे  ‘दवाइयों के कचरे’ का सनसनीखेज खुलासा! कौन डाल गया एक्सपायर टैबलेट और कैप्सूल-रैपर का जखीरा? प्रदूषण विभाग के रडार पर आया मामला….. पेंटागन मॉल के पीछे मिला फार्मास्यूटिकल वेस्ट, बरसात में गंगा तक पहुंचने का खतरा! जिला प्रदूषण अधिकारी राजेंद्र सिंह कठैत ने कहा—पहले कचरे का नियमानुसार निस्तारण, फिर शुरू होगी कार्रवाई; छह बड़े सवालों के जवाब तलाशेगा विभाग

हरिद्वार में सूखी नदी किनारे  ‘दवाइयों के कचरे’ का सनसनीखेज खुलासा! कौन डाल गया एक्सपायर टैबलेट और कैप्सूल-रैपर का जखीरा? प्रदूषण विभाग के रडार पर आया मामला…..

पेंटागन मॉल के पीछे मिला फार्मास्यूटिकल वेस्ट, बरसात में गंगा तक पहुंचने का खतरा! जिला प्रदूषण अधिकारी राजेंद्र सिंह कठैत ने कहा—पहले कचरे का नियमानुसार निस्तारण, फिर शुरू होगी कार्रवाई; छह बड़े सवालों के जवाब तलाशेगा विभाग

 

एक तरफ गंगा की स्वच्छता के दावे, दूसरी तरफ सूखी नदी किनारे दवाइयों के कचरे का जखीरा! आखिर यह कचरा यहां पहुंचा कैसे, किसने इसे खुले में फेंका और क्या पर्यावरण की सुरक्षा से खिलवाड़ किया गया? धर्मनगरी हरिद्वार में पेंटागन मॉल के पीछे सूखी रो नदी के किनारे एक्सपायर दवाइयां, टैबलेट और जिलेटिन कैप्सूल के खाली सेल मिलने से कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला सामने आते ही प्रदूषण नियंत्रण विभाग सक्रिय हुआ और संबंधित कंपनी के लोगों को मौके पर बुलाया गया। अब इस पूरे प्रकरण में कचरे के स्रोत से लेकर उसके निस्तारण तक की प्रक्रिया पर निगाहें टिक गई हैं।

मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नदी में बरसात के दौरान पानी का बहाव होने पर किनारे पड़ा अपशिष्ट आगे बह सकता है। ऐसे में गंगा तक संभावित प्रदूषण का खतरा भी जांच के दायरे में आ गया है। हालांकि, अभी यह साबित होना बाकी है कि कचरा किसने डाला और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

आखिर कौन डाल गया दवाइयों का जखीरा?

मौके पर पहुंचे जिला प्रदूषण अधिकारी राजेंद्र सिंह कठैत ने बताया कि नदी किनारे मिला कचरा फार्मास्यूटिकल कंपनी का प्रोसेस वेस्ट है। इसमें जिलेटिन कैप्सूल के खाली सेल और टैबलेट दिखाई दी हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दवाइयों से संबंधित अपशिष्ट के निस्तारण के लिए निर्धारित व्यवस्था मौजूद है, तो यह कचरा खुले में क्यों पड़ा मिला? क्या इसे किसी निर्धारित प्रक्रिया के तहत यहां लाया गया था या कहीं और से लाकर फेंका गया? इन सवालों का जवाब जांच, परिवहन रिकॉर्ड और निस्तारण से जुड़े दस्तावेजों से ही मिल सकेगा।

नदी किनारे कचरा मिला, क्या गंगा तक पहुंचेगा प्रदूषण?

यह कोई सामान्य कूड़े का ढेर नहीं, बल्कि दवाइयों से संबंधित अपशिष्ट का मामला है। सूखी रो नदी के किनारे खुले में पड़ा कचरा बरसात के दौरान पानी के बहाव के साथ आगे जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो सकती है।

यही वजह है कि मामले को केवल कचरा हटाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। जरूरी है कि अपशिष्ट को सुरक्षित तरीके से हटाया जाए, उसका उचित निस्तारण हो और यह भी पता लगाया जाए कि नदी किनारे इस तरह कचरा पहुंचने की परिस्थितियां क्या थीं।

जब लक्सर में निस्तारण की सुविधा, तो खुले में क्यों पड़ा वेस्ट?

जिला प्रदूषण अधिकारी राजेंद्र सिंह कठैत के मुताबिक, टैबलेट से संबंधित हानिकारक अपशिष्ट का निस्तारण नियमानुसार किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि लक्सर में सिक्योर लैंडफिल की सुविधा उपलब्ध है, जहां निर्धारित प्रक्रिया के तहत ऐसे अपशिष्ट का निस्तारण किया जाता है।

अधिकारी के अनुसार, अपशिष्ट को ले जाने के लिए फॉर्म-10 सहित निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। संबंधित कंपनी को कचरा अधिकृत निस्तारण स्थल तक पहुंचाना होगा और प्रक्रिया पूरी होने के बाद विभाग को रिपोर्ट देनी होगी।

अब सवाल यह है कि जांच में कचरे के परिवहन और निस्तारण से संबंधित कौन से दस्तावेज सामने आते हैं और क्या पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप पाई जाती है।

कब होगा एक्शन, क्या कंपनी पर गिरेगी गाज?

राजेंद्र सिंह कठैत ने बताया कि प्रदूषण विभाग ने संबंधित कंपनी से संपर्क किया है और कंपनी के लोग मौके पर पहुंच चुके हैं। फिलहाल विभाग की प्राथमिकता नदी किनारे पड़े अपशिष्ट को हटवाकर उसका नियमानुसार निस्तारण कराना है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि निस्तारण की रिपोर्ट मिलने के बाद विभागीय कार्रवाई शुरू होगी। यानी अब कार्रवाई का अगला चरण कंपनी की रिपोर्ट और जांच में सामने आने वाले तथ्यों से जुड़ा है।यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित पक्ष के खिलाफ लागू प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल किसी पक्ष की जिम्मेदारी को अंतिम रूप से तय करना जांच पूरी होने के बाद ही उचित होगा।

क्या निगरानी में हुई चूक या सामने आएगा कोई और तथ्य?

नदी किनारे दवाइयों का अपशिष्ट मिलना इस बात की जांच की जरूरत पैदा करता है कि कचरे का भंडारण, परिवहन और निस्तारण किस तरह किया जा रहा था। क्या अपशिष्ट की नियमित निगरानी हुई? क्या उसके निस्तारण का रिकॉर्ड उपलब्ध है? और क्या संबंधित नियमों का पालन किया गया?

इन बिंदुओं की पड़ताल से ही स्पष्ट होगा कि मामला लापरवाही का है, नियमों के उल्लंघन का या किसी अन्य परिस्थिति का। बिना जांच के किसी अधिकारी या कंपनी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए जवाबदेही तय करना जरूरी है।

कंपनी की चुप्पी के बीच जनता को जवाब कौन देगा?

मौके पर कंपनी के लोगों के पहुंचने की जानकारी सामने आई है, लेकिन कंपनी की ओर से कचरा नदी किनारे मिलने के संबंध में कोई स्पष्ट सार्वजनिक पक्ष उपलब्ध नहीं है। ऐसे में संबंधित कंपनी का जवाब भी महत्वपूर्ण होगा।

कंपनी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मिला हुआ अपशिष्ट किस प्रक्रिया से निकला, उसे कहां ले जाया जाना था और उसके निस्तारण के लिए क्या व्यवस्था की गई थी। इससे जांच को आगे बढ़ाने और वास्तविक जिम्मेदारी तय करने में मदद मिल सकती है।

अब निर्णायक मोड़ पर मामला: कचरा हटेगा, जांच होगी और फिर तय होगी जिम्मेदारी

सूखी रो नदी किनारे मिले फार्मास्यूटिकल वेस्ट का मामला अब तीन अहम मोर्चों पर खड़ा है—अपशिष्ट का सुरक्षित निस्तारण, उसके स्रोत की पहचान और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई।

जिला प्रदूषण अधिकारी राजेंद्र सिंह कठैत ने खुले में कचरा डालने को गलत बताया है। अब विभाग की जिम्मेदारी है कि निस्तारण की प्रक्रिया की पुष्टि करे और जांच के आधार पर आगे कदम उठाए।

सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—दवाइयों का यह जखीरा सूखी नदी किनारे पहुंचा कैसे, जिम्मेदार कौन निकलेगा और क्या कार्रवाई केवल कचरा उठाने तक सीमित रहेगी या नियमों के उल्लंघन पर भी कदम उठाया जाएगा?

हरिद्वार में गंगा और पर्यावरण की सुरक्षा के लिहाज से इस मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना बेहद महत्वपूर्ण है। अब निगाहें प्रदूषण नियंत्रण विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।

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