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वन विभाग पर उठे सवालों के बीच निष्पक्षता भी जरूरी, बिना जांच किसी अधिकारी को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं,, प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन आरोपों का फैसला तथ्यों और जांच से होना चाहिए

वन विभाग पर उठे सवालों के बीच निष्पक्षता भी जरूरी, बिना जांच किसी अधिकारी को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं,,

प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन आरोपों का फैसला तथ्यों और जांच से होना चाहिए

हरिद्वार में वन विभाग और डीएफओ स्वप्निल अनिरुद्ध के खिलाफ हुए प्रदर्शन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल आरोप लग जाने भर से किसी अधिकारी को दोषी मान लिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में विरोध और प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन किसी भी अधिकारी की कार्यशैली पर अंतिम निष्कर्ष केवल निष्पक्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

वन विभाग पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण, वन्यजीवों की सुरक्षा और वन संपदा के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करता है। ऐसे विभाग में कार्यरत अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाना एक संवेदनशील विषय है। यदि किसी के पास भ्रष्टाचार या अनियमितता के ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें संबंधित जांच एजेंसियों और सक्षम अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्ष जांच के माध्यम से सच्चाई सामने आ सके।

डीएफओ स्वप्निल अनिरुद्ध को लेकर सार्वजनिक रूप से लगाए गए आरोप अभी जांच के दायरे में नहीं हैं और न ही किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया है। ऐसे में केवल प्रदर्शनों और नारों के आधार पर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि ईमानदार अधिकारियों को बिना वजह विवादों में न घसीटा जाए और यदि कहीं कोई गड़बड़ी हो तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए। आरोप और जवाबदेही दोनों लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

जनहित में यही उचित होगा कि इस पूरे मामले को भावनाओं या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर देखा जाए। निष्पक्ष जांच ही किसी भी विवाद का सबसे विश्वसनीय समाधान है और वही तय करेगी कि आरोपों में कितना दम है।

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