पिरान कलियर के बैनर-पोस्टरों से वक्फ बोर्ड अध्यक्ष शादाब शम्स भी गायब,, वक्फ बोर्ड के अधीन दरगाह पिरान कलियर उर्स के प्रचार पोस्टर्स में वक्फ बोर्ड अध्यक्ष की पहचान तक नहीं—सियासी खींचतान में वक्फ संपत्तियों के अवैध कब्जो पर नकेल कसने वाले चेहरों को साइडलाइन किए जाने की चर्चाएं तेज,, 758वें उर्स की प्रचार सामग्री ने खड़े किए बड़े सवाल, बोर्ड की संस्थागत भूमिका और अध्यक्ष शादाब शम्स की मौजूदगी को लेकर उठ रही उंगलियां

पिरान कलियर के बैनर-पोस्टरों से वक्फ बोर्ड अध्यक्ष शादाब शम्स भी गायब,,
वक्फ बोर्ड के अधीन दरगाह पिरान कलियर उर्स के प्रचार पोस्टर्स में वक्फ बोर्ड अध्यक्ष की पहचान तक नहीं—सियासी खींचतान में वक्फ संपत्तियों के अवैध कब्जो पर नकेल कसने वाले चेहरों को साइडलाइन किए जाने की चर्चाएं तेज,,
758वें उर्स की प्रचार सामग्री ने खड़े किए बड़े सवाल, बोर्ड की संस्थागत भूमिका और अध्यक्ष शादाब शम्स की मौजूदगी को लेकर उठ रही उंगलियां

पिरान कलियर। विश्व प्रसिद्ध दरगाह पिरान कलियर में 758वें उर्स को लेकर लगाए गए बैनर-पोस्टर अब सिर्फ स्वागत और मुबारकबाद की सामग्री नहीं रह गए हैं, बल्कि इनकी प्रस्तुति ने वक्फ व्यवस्था, राजनीतिक खींचतान और दरगाह की संपत्तियों को लेकर चल रही चर्चाओं को भी हवा दे दी है।
सामने आए बैनर में उर्स की मुबारकबाद, दरगाह की तस्वीर और स्वागत संदेश प्रमुखता से दिखाई दे रहे हैं। बैनर के निचले हिस्से में “मुख्य कार्यपालक अधिकारी, उत्तराखंड वक्फ बोर्ड, देहरादून” का उल्लेख भी मौजूद है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स का नाम या उनकी अध्यक्षीय पहचान बैनर-पोस्टर की प्रमुख सामग्री में दिखाई नहीं देती।यहीं से सवाल उठता है—जब दरगाह वक्फ बोर्ड के अधीन है और बोर्ड की व्यवस्था से उर्स जुड़ा है, तो बोर्ड के अध्यक्ष की पहचान प्रचार सामग्री में आखिर कहां है?
वक्फ बोर्ड अध्यक्ष गायब, तो क्या संदेश दिया जा रहा है?
किसी धार्मिक आयोजन के बैनर पर हर पदाधिकारी का नाम होना अनिवार्य हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन पिरान कलियर जैसे बड़े वक्फ धार्मिक केंद्र में जब बोर्ड की संस्थागत व्यवस्था से जुड़े आयोजन की प्रचार सामग्री सामने आती है और उसमें बोर्ड के अध्यक्ष की पहचान पूरी तरह नदारद दिखाई देती है, तो राजनीतिक गलियारों से लेकर स्थानीय स्तर तक चर्चाएं शुरू होना स्वाभाविक है।
चर्चा यह भी है कि क्या वक्फ बोर्ड के स्तर पर संपत्तियों और व्यवस्थाओं को लेकर सख्ती करने वाले चेहरों को धीरे-धीरे प्रमुख आयोजनों की तस्वीर से बाहर किया जा रहा है?
हालांकि इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा, लेकिन बैनर की तस्वीर ने इतना सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि आखिर संस्थागत पहचान को इस तरह पीछे क्यों रखा गया?

उत्तराखंड में वक्फ संपत्तियां लंबे समय से संवेदनशील विषय रही हैं। संपत्तियों के इस्तेमाल, कब्जों, प्रबंधन और संरक्षण को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में वक्फ संपत्तियों पर नकेल कसने, रिकॉर्ड व्यवस्थित करने और संस्थागत व्यवस्था मजबूत करने की कोशिश करने वाले जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसी बीच पिरान कलियर जैसे बड़े वक्फ स्थल के बैनर-पोस्टरों में वक्फ बोर्ड अध्यक्ष शादाब शम्स की पहचान का दिखाई न देना राजनीतिक खींचतान की चर्चाओं को और तेज कर रहा है।
क्या यह महज डिजाइन का मामला है?
या फिर इसके पीछे कोई बड़ा संदेश है?
क्या वक्फ संपत्तियों और व्यवस्थाओं में सख्ती करने वाले लोगों को धीरे-धीरे सार्वजनिक मंचों और प्रचार सामग्री से साइडलाइन किया जा रहा है?
इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं हैं, लेकिन चर्चा जरूर तेज है।
पिरान कलियर में आस्था के साथ सियासत का सवाल
पिरान कलियर देशभर के जायरीनों की आस्था का केंद्र है। यहां आने वाला व्यक्ति राजनीतिक खेमेबंदी देखने नहीं, बल्कि साबिर पाक की दरगाह पर अपनी श्रद्धा और इबादत के लिए पहुंचता है।
ऐसे में यदि उर्स के बैनर-पोस्टर भी राजनीतिक खींचतान का प्रतिबिंब बनने लगें तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
दरगाह की व्यवस्था से जुड़े किसी भी आयोजन में व्यक्तिगत या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के बजाय संस्थागत व्यवस्था सामने आनी चाहिए। खासकर तब, जब मामला वक्फ संपत्तियों और उनके संरक्षण से जुड़ा हो।
कहीं वक्फ बोर्ड की भूमिका को ही पीछे तो नहीं धकेला जा रहा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि बैनर पर वक्फ बोर्ड के CEO का उल्लेख होने के बावजूद बोर्ड अध्यक्ष शादाब शम्स की पहचान क्यों नहीं दिखाई दे रही?
अगर यह केवल बैनर डिजाइन का मामला है तो बात वहीं खत्म हो जाती है। लेकिन यदि अलग-अलग प्रचार सामग्री में लगातार यही तस्वीर सामने आती है, तो फिर सवाल केवल एक पोस्टर का नहीं रहेगा।
फिर यह पूछा जाएगा कि क्या पिरान कलियर की व्यवस्था में वक्फ बोर्ड की संस्थागत भूमिका को धीरे-धीरे पीछे धकेला जा रहा है?
और अगर ऐसा नहीं है तो बोर्ड की भूमिका और अध्यक्ष की पहचान को प्रचार सामग्री में स्पष्ट रूप से सामने रखने में आखिर आपत्ति क्या है?
सियासत और वक्फ संपत्ति—दोनों को अलग रखना जरूरी
वक्फ संपत्तियां किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं हैं। इनका संरक्षण और सही इस्तेमाल संस्थागत जिम्मेदारी है। इसलिए इन संपत्तियों से जुड़े धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक खींचतान का प्रभाव दिखाई देना चिंता बढ़ा सकता है।
पिरान कलियर की पहचान साबिर पाक की दरगाह, वक्फ व्यवस्था और जायरीनों की आस्था से है। इस पहचान के बीच यदि राजनीतिक शक्ति संतुलन की लड़ाई दिखाई देने लगे तो सबसे ज्यादा नुकसान उस धार्मिक माहौल का होगा, जिसके लिए कलियर दुनिया भर में जाना जाता है।
बैनर छोटा है, लेकिन सवाल बड़ा है—वक्फ बोर्ड अध्यक्ष शादाब शम्स की पहचान आखिर गायब क्यों है?
क्या यह महज संयोग है, या फिर पिरान कलियर की वक्फ व्यवस्था में चल रही किसी बड़ी राजनीतिक खींचतान का संकेत?
फिलहाल तस्वीर सवाल छोड़ रही है और पिरान कलियर की सियासी गलियों में इन सवालों पर चर्चाएं तेज हैं।



