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उत्तराखंड में पोर्टल पत्रकारों के विज्ञापन रेट पर कलमकारों में रोष, ₹40 रोज की दर पर उठे गंभीर सवाल,, डिजिटल मीडिया के लिए ₹1200 मासिक विज्ञापन दर को लेकर नाराजगी—छोटे पोर्टलों पर आर्थिक बोझ बढ़ने का आरोप, ₹25 हजार एफडी की शर्त ने बढ़ाई चिंता

उत्तराखंड में पोर्टल पत्रकारों के विज्ञापन रेट पर कलमकारों में रोष, ₹40 रोज की दर पर उठे गंभीर सवाल,,

डिजिटल मीडिया के लिए ₹1200 मासिक विज्ञापन दर को लेकर नाराजगी—छोटे पोर्टलों पर आर्थिक बोझ बढ़ने का आरोप, ₹25 हजार एफडी की शर्त ने बढ़ाई चिंता

देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड में डिजिटल और वेब मीडिया से जुड़े पत्रकारों एवं छोटे समाचार पोर्टल संचालकों के बीच सूचना विभाग की विज्ञापन व्यवस्था को लेकर असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। एक मीडिया रिपोर्ट में उत्तराखंड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग (DIPR) की ओर से डिजिटल बैनर विज्ञापनों के लिए निर्धारित ₹1200 प्रति बैनर प्रतिमाह की दर पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यह राशि प्रतिदिन के हिसाब से करीब ₹40 बैठती है। छोटे और स्वतंत्र समाचार पोर्टलों से जुड़े कलमकारों का कहना है कि डिजिटल पत्रकारिता में होने वाले वास्तविक खर्च की तुलना में यह दर बेहद कम है।

मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ा है क्योंकि छोटे पोर्टल संचालकों को वेबसाइट संचालन, सर्वर, डोमेन, इंटरनेट, फील्ड रिपोर्टिंग, कैमरा एवं अन्य तकनीकी संसाधनों पर लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में सरकारी विज्ञापन से मिलने वाली सीमित राशि को लेकर पत्रकारों के एक वर्ग में यह सवाल उठ रहा है कि क्या मौजूदा विज्ञापन व्यवस्था वास्तव में जमीनी और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता को प्रोत्साहित कर पाएगी।

₹1200 महीने का विज्ञापन, प्रतिदिन करीब ₹40—पोर्टल संचालकों की चिंता

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विभाग द्वारा वेब पोर्टलों के लिए डिजिटल बैनर की दर ₹1200 मासिक निर्धारित की गई है। यदि इसे दैनिक आधार पर देखा जाए तो यह राशि करीब ₹40 प्रतिदिन बनती है। पत्रकारों का तर्क है कि एक समाचार पोर्टल को प्रतिदिन खबरों की कवरेज, फोटो-वीडियो, इंटरनेट, वेबसाइट मेंटेनेंस और फील्ड रिपोर्टिंग पर इससे कहीं अधिक खर्च करना पड़ता है।

खासकर छोटे शहरों और पर्वतीय क्षेत्रों से संचालित होने वाले पोर्टलों के लिए समस्या और गंभीर हो सकती है। इन पोर्टलों में कई पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद स्थानीय समस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, अपराध, जनहित और ग्रामीण क्षेत्रों की खबरों को प्रमुखता से सामने लाते हैं।

ऐसे में पत्रकारों का एक वर्ग मांग कर रहा है कि डिजिटल मीडिया की मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विज्ञापन दरों की समीक्षा की जाए और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे वास्तविक एवं सक्रिय समाचार पोर्टलों को आर्थिक रूप से मजबूती मिल सके।

चार विज्ञापन मिले तो भी ₹4800 मासिक—संचालन खर्च पर बड़ा सवाल

रिपोर्ट के अनुसार यदि किसी पोर्टल को अधिकतम चार डिजिटल बैनर भी आवंटित होते हैं तो उसकी कुल मासिक विज्ञापन आय करीब ₹4800 बनती है। छोटे पोर्टल संचालकों का कहना है कि इतनी राशि में वेबसाइट की तकनीकी लागत, सर्वर होस्टिंग, डोमेन, इंटरनेट और फील्ड रिपोर्टिंग का खर्च निकालना भी मुश्किल है।

पत्रकारों का कहना है कि डिजिटल मीडिया अब केवल खबर लिखकर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। एक खबर तैयार करने के लिए मौके पर जाना, वीडियो और फोटो जुटाना, संपादन करना, खबर को वेबसाइट पर प्रकाशित करना तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करना पड़ता है। इसके लिए तकनीकी संसाधनों के साथ-साथ समय और मानवशक्ति की आवश्यकता होती है।

ऐसे में विज्ञापन की मौजूदा दरों को लेकर कलमकारों में यह भावना बन रही है कि सरकार को डिजिटल मीडिया की भूमिका और उसके वास्तविक खर्च को ध्यान में रखकर विज्ञापन नीति में व्यावहारिक बदलाव करने चाहिए।

एक साल की देरी और ₹25 हजार एफडी की शर्त पर भी सवाल

मामले में केवल विज्ञापन दर ही चर्चा का विषय नहीं है। रिपोर्ट में टेंडर प्रक्रिया में कथित देरी और सुरक्षा राशि को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक आवेदकों से पहले ₹10 हजार का डिमांड ड्राफ्ट लिया गया था, जबकि टेंडर प्रक्रिया के बाद ₹25 हजार की फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) को सुरक्षा राशि के रूप में जमा करने की शर्त सामने आई।

छोटे समाचार पोर्टलों के संचालकों का कहना है कि सीमित संसाधनों में काम करने वाले संस्थानों के लिए ₹25 हजार की राशि लंबे समय तक सुरक्षा निधि के रूप में जमा रखना अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा करता है। उनका सवाल है कि यदि सरकार डिजिटल मीडिया को बढ़ावा देना चाहती है तो नीति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें छोटे और वास्तविक पोर्टलों के लिए अनावश्यक आर्थिक बाधाएं कम हों।

फर्जी पोर्टलों पर कार्रवाई की मांग, वास्तविक पत्रकारों के लिए पारदर्शी व्यवस्था जरूरी

कलमकारों के बीच एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा फर्जी अथवा निष्क्रिय पोर्टलों की पहचान और वास्तविक डिजिटल मीडिया संस्थानों के मूल्यांकन का भी है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि पोर्टलों की वास्तविक पहुंच, ट्रैफिक और कंटेंट की गुणवत्ता जांचने के लिए अधिक प्रभावी डिजिटल ऑडिट व्यवस्था की आवश्यकता है।

पत्रकारों का कहना है कि विज्ञापन व्यवस्था में Google Analytics, वास्तविक ट्रैफिक, नियमित प्रकाशन, मौलिक सामग्री, फील्ड रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया रीच जैसे मानकों को पारदर्शी तरीके से शामिल किया जाना चाहिए। इससे एक ओर फर्जी और केवल कागजों पर संचालित पोर्टलों की पहचान हो सकेगी, वहीं दूसरी ओर वास्तविक पत्रकारिता करने वाले संस्थानों को उनका उचित हक मिल सकेगा।

सरकार से नीति की समीक्षा की मांग

डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकारों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में स्थानीय समाचार पोर्टल जनता और शासन-प्रशासन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम कर रहे हैं। दूरदराज के क्षेत्रों की छोटी-बड़ी समस्याएं इन्हीं माध्यमों से सामने आती हैं और कई बार स्थानीय खबरें प्रशासन तक पहुंचकर कार्रवाई का कारण भी बनती हैं।

ऐसे में पत्रकारों का एक वर्ग चाहता है कि सूचना विभाग विज्ञापन दरों, टेंडर प्रक्रिया, सुरक्षा राशि और पोर्टलों के मूल्यांकन की पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करे। साथ ही विज्ञापन आवंटन में पारदर्शिता के लिए स्पष्ट मानक तय किए जाएं।

फिलहाल ₹1200 मासिक विज्ञापन दर और ₹25 हजार एफडी की शर्त को लेकर उठे सवालों ने उत्तराखंड के डिजिटल मीडिया जगत में बहस छेड़ दी है। कलमकारों का कहना है कि पत्रकारिता को केवल विज्ञापन की संख्या से नहीं, बल्कि उसके जनहित में योगदान, विश्वसनीयता और जमीनी पहुंच के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।

हालांकि, इस संबंध में संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि टेंडर की शर्तों, विज्ञापन दरों और चयन प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट हो सके। यदि सरकार वास्तविक डिजिटल पत्रकारिता को मजबूत करना चाहती है, तो पत्रकारों की आपत्तियों पर संवाद के साथ समाधान तलाशना समय की जरूरत मानी जा रही है।

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