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क्या सख्त कार्रवाई की कीमत चुका रहे हैं डीपीआरओ? अस्पताल के बेड से उठे बड़े सवाल! 21 वर्षों के निष्कलंक सेवा रिकॉर्ड का दावा, बोले— “बिना सुनवाई जांच और मीडिया ट्रायल “प्राकृतिक न्याय “और भारतीय संविधान से प्राप्त “जीवन के अधिकार “पर सीधा प्रहार” 51 मिनी सचिवालय को धरातल पर उतारने और “राष्ट्र निर्माण केंद्र “के पायलट प्रोजेक्ट जैसे अपने अभिनव पहल को सफलता से किर्यान्वित करते हुए 101 मिनी सचिवालय का सपना, भ्रष्टाचार पर लगातार निडर कार्रवाई करने वाले और अब मुख्यालय अटैच— क्या महज संयोग या फिर किसी बड़ी पटकथा का हिस्सा?

क्या सख्त कार्रवाई की कीमत चुका रहे हैं डीपीआरओ? अस्पताल के बेड से उठे बड़े सवाल!

21 वर्षों के निष्कलंक सेवा रिकॉर्ड का दावा, बोले— “बिना सुनवाई जांच और मीडिया ट्रायल “प्राकृतिक न्याय “और भारतीय संविधान से प्राप्त “जीवन के अधिकार “पर सीधा प्रहार”

51 मिनी सचिवालय को धरातल पर उतारने और “राष्ट्र निर्माण केंद्र “के पायलट प्रोजेक्ट जैसे अपने अभिनव पहल को सफलता से किर्यान्वित करते हुए 101 मिनी सचिवालय का सपना, भ्रष्टाचार पर लगातार निडर कार्रवाई करने वाले और अब मुख्यालय अटैच— क्या महज संयोग या फिर किसी बड़ी पटकथा का हिस्सा?

हरिद्वार। पंचायत विभाग में इन दिनों सबसे अधिक चर्चा जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) अतुल प्रताप सिंह को लेकर है। एक ओर विभागीय जांच की प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी ओर गंभीर बीमारी के चलते मेदांता हॉस्पिटल में इलाज करा रहे डीपीआरओ ने कई बार फ़ोन करने के बाद फ़ोन उठाया और फिर उन्होंने इस गंभीर परिस्थिति में भी मीडिया ट्रायल कराने पर पूरे घटनाक्रम पर कई बड़े सवाल खड़े किए हैं। उनका दावा है कि उन्हें बिना सुने ही संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया गया, जबकि वह शासन के दिनांक 15 जून के अटैचमेंट आदेश आने से पहले ही वह दिन रविवार एवं दिनांक 14 जून से जिलाधिकारी की स्वीकृति के बाद चिकित्सकीय अवकाश पर हैं और वर्तमान में मेदांता अस्पताल में उपचाराधीन हैं।साथ ही कहा कि सत्य परेशान तो हो सकता है परंतु माँ गंगा के आशीर्वाद से विजय सत्य की ही होगी ,उन्होंने केवल इतना कहा की सभी मामले माo उत्तराखंड उच्च न्यायालय में विचाराधीन है और वे sub judice मामले में कोई comment नहीं कर सकते एवं मामला29 जून को हाई कोर्ट नैनीताल में सुनवाई हेतु डबल बेच में लगा है ,उनके द्वारा सभी बाते अब माo उच्च न्यायालय में ही रखी जायेंगी

डीपीआरओ का कहना है कि जिस समय जांच समिति उनके कार्यालय पहुंची और उससे जुड़ी खबरें मीडिया में प्रसारित हुईं, उस समय वह मेदानता अस्पताल में उपचार करा रहे थे। उनका सवाल है कि जब संबंधित अधिकारी गंभीर रूप से बीमार होकर अवकाश पर हो, तब बिना उसका पक्ष जाने इस प्रकार की कार्रवाई और सार्वजनिक चर्चाएं क्या प्राकृतिक न्याय की भावना के अनुरूप कही जा सकती हैं?

अतुल प्रताप सिंह ने दावा किया कि उनका 21 वर्षों का निष्कलंक और उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड रहा है। उनके अनुसार उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में शासन की योजनाओं को जमीन पर उतारने, पंचायत व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और सरकारी धन के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए लगातार कार्य किया। उनका कहना है कि यदि किसी अधिकारी पर आरोप हैं तो निष्पक्ष जांच अवश्य होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले उसे अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना भी उतना ही आवश्यक है।

उन्होंने अपनी स्वास्थ्य स्थिति का उल्लेख करते हुए बताया कि वह लंबे समय से हृदय रोग से जूझ रहे हैं। पहले दो स्टेंट लगाए जा चुके हैं और वर्ष 2024 में तीसरा स्टेंट भी डालना पड़ा। वर्तमान में भी उनकी तबीयत खराब होने के कारण मेदांता अस्पताल में इलाज चल रहा है। उनका कहना है कि पूरा विभाग उनकी चिकित्सकीय स्थिति से पूरी तरह अवगत था, इसके बावजूद जांच की एकतरफा कार्रवाई आगे बढ़ी जबकि उनके द्वारा अपने खिलाफ चल रहे षड्यंत्र के बारे में मौखिक और लिखित रूप में शासन को माह अप्रैल से ही कई बार बता चुके है और नियमानुसार निष्पक्ष जांच की मांग भी की थी।

डीपीआरओ का नाम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि उनके कार्यकाल में पंचायत विभाग में कई बड़े फैसले लिए गए। कथित फर्जी डिग्री, वित्तीय अनियमितताओं और नियमों के उल्लंघन के मामलों में कई ग्राम प्रधानों, उपप्रधानों और पंचायत अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इस परिस्थिति में घटनाक्रम और कार्रवाइयों के बाद पंचायत विभाग में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर नई बहस शुरू हुई थी।अब देखना होगा की उच्च न्यायालय इसे किस प्रकार लेता है ….

इसी दौरान 101 ग्राम पंचायतों में मिनी सचिवालय विकसित करने की उनकी पहल को भी व्यापक सराहना मिली। इस योजना का उद्देश्य पंचायतों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना और ग्रामीणों को अधिकाधिक सरकारी सेवाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराना था। अब उनके मुख्यालय अटैच होने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह महत्वाकांक्षी अभियान पहले जैसी गति से आगे बढ़ पाएगा।

डीपीआरओ का दावा है कि उन्होंने सरकारी धन और जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की। उनका कहना है कि पंचायत व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही स्थापित करने के लिए कई कठोर निर्णय लिए गए, जिनका असर पूरे जिले में दिखाई दिया। हालांकि इन दावों की विभागीय स्तर पर स्वतंत्र पुष्टि होना अभी शेष है।

उन्होंने कहा कि किसी भी अधिकारी को जांच पूरी होने से पहले सार्वजनिक रूप से दोषी जैसा प्रस्तुत करना उसकी प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। उनका कहना है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है और प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत स्पष्ट रूप से कहता है कि पहले सुनवाई, फिर निर्णय।

फिलहाल विभागीय जांच जारी है और शासन की ओर से अंतिम निर्णय आना बाकी है। विभाग की ओर से भी अभी तक इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है— क्या किसी अधिकारी को जांच पूरी होने से पहले सार्वजनिक रूप से कठघरे में खड़ा करना उचित है, या फिर प्राकृतिक न्याय की पहली शर्त यही है कि पहले उसका पक्ष सुना जाए? इसका उत्तर अब विभागीय जांच और उसके निष्कर्ष ही तय करेंगे।

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