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दरगाह में ‘सिस्टम की सेंध’ का सनसनीखेज खेल: अवैध कब्जाधारी मौ. रफी को नौकरी दिलाने की साजिश के आरोपों से मचा हड़कंप!,, “ज्वाइंट मजिस्ट्रेट पहले ही लगा चुके थे रोक, फिर किसके इशारे पर दोबारा सक्रिय हुआ नियुक्ति का खेल?” “दरगाह की बिजली, कमरा और संसाधनों का वर्षों से कथित अवैध इस्तेमाल— अब कब्जा खाली कराने और रिकवरी की उठी मांग”

इन्तजार रजा हरिद्वार-दरगाह में ‘सिस्टम की सेंध’ का सनसनीखेज खेल: अवैध कब्जाधारी मौ. रफी को नौकरी दिलाने की साजिश के आरोपों से मचा हड़कंप!,,

“ज्वाइंट मजिस्ट्रेट पहले ही लगा चुके थे रोक, फिर किसके इशारे पर दोबारा सक्रिय हुआ नियुक्ति का खेल?”

“दरगाह की बिजली, कमरा और संसाधनों का वर्षों से कथित अवैध इस्तेमाल— अब कब्जा खाली कराने और रिकवरी की उठी मांग”

कलियर दरगाह परिसर एक बार फिर गंभीर विवादों और अंदरूनी खेल के आरोपों से सुर्खियों में आ गया है। इस बार मामला दरगाह के दक्षिणी गेट परिसर में कथित अवैध कब्जा जमाकर रह रहे मौ. रफी नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिस पर वर्षों से दरगाह की संपत्तियों और संसाधनों का गैरकानूनी तरीके से इस्तेमाल करने के आरोप लग रहे हैं। इतना ही नहीं, इस व्यक्ति को दरगाह कार्यालय में नियुक्त कराने के लिए कथित तौर पर अंदरखाने लगातार ताना-बाना बुने जाने और अधिकारियों के आदेशों को नजरअंदाज करने के भी गंभीर आरोप सामने आए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मौ. रफी मूल रूप से जिला मुरादाबाद का निवासी बताया जा रहा है, जिसने दरगाह के दक्षिणी गेट परिसर स्थित एक भवन पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर रखा है। आरोप है कि यह पूरा मामला दरगाह कार्यालय में तैनात एक सुपरवाइजर के संरक्षण में वर्षों से चलता रहा। सूत्रों का दावा है कि उक्त सुपरवाइजर लगातार मौ. रफी की नियुक्ति कराने के लिए प्रयासरत रहा और नियम-कायदों को किनारे रखकर फाइलों को आगे बढ़ाने की कोशिशें की जाती रहीं।

इस मामले की शिकायत पूर्व में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट रुड़की से भी की गई थी। शिकायत के बाद पूर्व तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट द्वारा नायब तहसीलदार श्री चित्र कुमार त्यागी को जांच के आदेश दिए गए थे। जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। दिनांक 14 जुलाई 2017 को प्रस्तुत रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से यह पाया गया कि मौ. रफी को दरगाह कार्यालय में रखने की कोशिश “आपत्तिजनक” और “साजिश” का हिस्सा प्रतीत होती है। जांच रिपोर्ट के बाद तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने दरगाह प्रबंधक और संबंधित सुपरवाइजर से स्पष्टीकरण भी तलब किया था।

अब सवाल यह उठ रहा है कि जब प्रशासनिक स्तर पर पहले ही इस व्यक्ति की नियुक्ति और गतिविधियों पर सवाल खड़े हो चुके थे, तो आखिर किसके संरक्षण में यह मामला दोबारा जिंदा किया गया? आखिर किन लोगों ने पुराने आदेशों और रिपोर्टों को दरकिनार कर दोबारा नियुक्ति का रास्ता तैयार करने की कोशिश की? सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों और आदेशों को दबाने तथा कुछ रिकॉर्ड “खुर्द-बुर्द” किए जाने की भी चर्चा है।

सबसे बड़ा सवाल दरगाह की संपत्तियों के कथित दुरुपयोग को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि मौ. रफी वर्षों से दरगाह परिसर के कमरे में रहकर दरगाह की बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल करता रहा, जबकि उसके पास वहां रहने या संसाधनों के उपयोग का कोई वैध अधिकार नहीं था। अब स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं ने मांग उठाई है कि न सिर्फ उक्त कमरे को तत्काल खाली कराया जाए, बल्कि अब तक इस्तेमाल किए गए संसाधनों की रिकवरी भी संबंधित व्यक्ति से की जाए।

मामले में पूर्व दरगाह प्रबंधक मौ. हारून और श्रीमती रजिया द्वारा उच्चाधिकारियों को भेजी गई रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया था। बताया जा रहा है कि इन रिपोर्टों में भी पूरे प्रकरण को गंभीर बताते हुए कठोर कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। इसके बावजूद वर्षों तक कोई ठोस कदम न उठना कई सवाल खड़े कर रहा है।

दरगाह से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन और वक्फ बोर्ड इस मामले में निष्पक्ष और कठोर जांच कराते हैं तो कई बड़े नाम और अंदरूनी गठजोड़ सामने आ सकते हैं। लोगों का आरोप है कि दरगाह जैसी आस्था की जगह को कुछ लोग निजी लाभ और “सेटिंग सिस्टम” का अड्डा बनाना चाहते हैं, जहां नियमों से ज्यादा प्रभाव और सिफारिश चलती है।

अब निगाहें प्रशासन और वक्फ बोर्ड पर टिकी हैं कि क्या पुराने आदेशों, जांच रिपोर्टों और शिकायतों के आधार पर इस पूरे मामले में सख्त कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। दरगाह हितों की बात करने वाले लोगों ने साफ कहा है कि यदि अवैध कब्जा, संसाधनों का दुरुपयोग और नियमविरुद्ध नियुक्ति जैसे मामलों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो यह दरगाह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल होगा।

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