कर्बला का पैग़ाम: हक़ की राह में दी गई शहादत कभी बेकार नहीं जाती,, हज़रत इमाम हुसैन और 72 जांनिसारों की कुर्बानी को मुहर्रम में दुनिया भर के मुसलमान अकीदत के साथ करते हैं याद,, सब्र, वफ़ा, ईमान और इंसाफ़ की मिसाल बनी कर्बला की जंग, आज भी इंसानियत को देती है ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने का सबक़

कर्बला का पैग़ाम: हक़ की राह में दी गई शहादत कभी बेकार नहीं जाती,,
हज़रत इमाम हुसैन और 72 जांनिसारों की कुर्बानी को मुहर्रम में दुनिया भर के मुसलमान अकीदत के साथ करते हैं याद,,
सब्र, वफ़ा, ईमान और इंसाफ़ की मिसाल बनी कर्बला की जंग, आज भी इंसानियत को देती है ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने का सबक़
इन्तजार रजा हरिद्वार… मुहर्रम इस्लामी हिजरी साल का पहला महीना है, लेकिन इसकी पहचान केवल नए साल की शुरुआत से नहीं, बल्कि कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना से है जिसने पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा और इंसानियत को सब्र, कुर्बानी और इंसाफ़ का अमर पैग़ाम दिया। यही वजह है कि दुनिया भर के मुसलमान मुहर्रम के दिनों में हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) और उनके 72 जांनिसार साथियों की शहादत को गहरे एहतराम और अकीदत के साथ याद करते हैं।
इस्लामी इतिहास के अनुसार, 10 मुहर्रम 61 हिजरी को इराक़ के कर्बला मैदान में हज़रत इमाम हुसैन ने ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने झुकने से इनकार कर दिया। उनके सामने सत्ता और ताक़त का दबाव था, लेकिन उन्होंने दीन-ए-इस्लाम की असल तालीमात, हक़ और इंसाफ़ की हिफाज़त को सबसे ऊपर रखा। उनके साथ परिवार के सदस्य और महज़ 72 वफ़ादार साथी थे, जबकि सामने बड़ी फ़ौज मौजूद थी।
कर्बला की इस जंग में इमाम हुसैन और उनके साथियों को कई दिनों तक पानी से महरूम रखा गया। छोटे-छोटे बच्चे प्यास से तड़पते रहे, लेकिन किसी ने भी अपने ईमान और उसूलों से समझौता नहीं किया। आख़िरकार यौमे आशूरा के दिन इमाम हुसैन, उनके अहले-बैत और सभी साथियों ने एक-एक कर शहादत का जाम पिया और हमेशा के लिए हक़ की राह के मुसाफ़िर बन गए।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि कर्बला की जंग किसी सत्ता को हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि इंसाफ़, सच्चाई और दीन की हिफाज़त के लिए लड़ी गई थी। यही कारण है कि इमाम हुसैन की शहादत आज भी हर मुसलमान के दिल में ज़िंदा है और उन्हें बुराई के ख़िलाफ़ डटकर खड़े होने की प्रेरणा देती है।
मुहर्रम के दौरान मस्जिदों, इमामबाड़ों और मजलिसों में कर्बला के वाक़ये का ज़िक्र किया जाता है। मुसलमान इमाम हुसैन और उनके साथियों को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं, फ़ातिहा पढ़ते हैं, दुआ करते हैं और उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं। कई जगह ताज़िए निकाले जाते हैं और अमन, भाईचारे तथा इंसानियत की सलामती के लिए दुआएँ की जाती हैं।
उलेमा का कहना है कि कर्बला का सबसे बड़ा पैग़ाम यह है कि इंसान कभी भी ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और ग़लत बात के सामने सिर न झुकाए। अगर हक़ की राह में कुर्बानी देनी पड़े, तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। यही संदेश आज भी पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए रौशनी का काम करता है।
आज सदियाँ बीत जाने के बाद भी कर्बला की याद ताज़ा है। मुहर्रम का महीना मुसलमानों को यह एहसास कराता है कि इमाम हुसैन और उनके 72 जांनिसारों की शहादत केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि इंसाफ़, सब्र, वफ़ादारी, ईमान और इंसानियत की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली नस्लों को हमेशा हक़ के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी।



