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उत्तराखंड में फिर दिखे दुष्यंत गौतम, संगठनात्मक बैठक में हुई मौजूदगी,, लंबे समय से राजनीतिक गतिविधियों से दूरी को लेकर उठ रहे थे सवाल,, पोस्टर विवाद और अंकिता भंडारी मामले के बाद तेज हुई थीं अटकलें

इन्तजार रजा हरिद्वार- उत्तराखंड में फिर दिखे दुष्यंत गौतम, संगठनात्मक बैठक में हुई मौजूदगी,,

लंबे समय से राजनीतिक गतिविधियों से दूरी को लेकर उठ रहे थे सवाल,,

पोस्टर विवाद और अंकिता भंडारी मामले के बाद तेज हुई थीं अटकलें

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से लगभग गायब चल रहे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रभारी (दुष्यंत गौतम) एक बार फिर पार्टी की संगठनात्मक बैठक में नजर आए हैं। कई महीनों बाद उनकी सक्रिय मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। प्रदेश प्रभारी होने के बावजूद वे लंबे समय से राज्य की बड़ी बैठकों और कार्यक्रमों में दिखाई नहीं दे रहे थे, जिसके चलते पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल उठने लगे थे।

रविवार को देहरादून में आयोजित भाजपा की संगठनात्मक बैठक में जब दुष्यंत गौतम पहुंचे तो कई नेताओं और कार्यकर्ताओं का ध्यान उनकी ओर गया। लंबे समय बाद उनकी उपस्थिति को पार्टी के अंदर एक अहम संकेत के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा संगठन अब उत्तराखंड में आगामी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर फिर से सक्रिय रणनीति बना रहा है।

लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति से दूरी को लेकर उठ रहे थे सवाल

बीते कई महीनों से भाजपा के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से नजर नहीं आ रहे थे। प्रदेश स्तर की कई महत्वपूर्ण बैठकों और कार्यक्रमों में उनकी अनुपस्थिति को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि प्रदेश प्रभारी होने के बावजूद उनका लंबे समय तक राज्य की गतिविधियों से दूर रहना कई सवाल खड़े कर रहा था।

भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में प्रदेश प्रभारी की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। संगठन की रणनीति तय करने से लेकर नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती है। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर भी कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया।

अंकिता भंडारी मामले के बाद बढ़ी थीं राजनीतिक चर्चाएं

दरअसल दुष्यंत गौतम की अनुपस्थिति उस समय ज्यादा चर्चा में आई थी जब (अंकिता भंडारी हत्याकांड) से जुड़े विवाद में उनका नाम कथित तौर पर ‘वीआईपी’ के रूप में सामने आया था। उस दौरान उर्मिला सनावर द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद राजनीतिक माहौल काफी गर्म हो गया था।

हालांकि बाद में दुष्यंत गौतम ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की थी और मानहानि का दावा ठोका था। इसके बावजूद उस समय से ही वे उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों में कम दिखाई देने लगे थे। यही वजह थी कि उनके राज्य से दूरी बनाए रखने को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं।

पोस्टर विवाद ने भी बढ़ाई थी सियासी हलचल

इसी बीच एक और घटनाक्रम ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया था। जब भाजपा नेता (नितिन नवीन) के उत्तराखंड दौरे को लेकर पार्टी कार्यालय के बाहर पोस्टर लगाए गए थे, तब उन पोस्टरों में कई बड़े नेताओं की तस्वीरें शामिल थीं, लेकिन प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम की तस्वीर नहीं थी।

इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेजी से फैलने लगी कि कहीं पार्टी संगठन उनसे दूरी तो नहीं बना रहा है। हालांकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष (महेंद्र भट्ट) ने उस समय इन चर्चाओं को खारिज करते हुए कहा था कि पोस्टर में फोटो न होना महज संयोग है और इसका कोई राजनीतिक मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए।

संगठनात्मक बैठक में मौजूदगी से अटकलों पर लगा विराम

अब रविवार को आयोजित भाजपा की संगठनात्मक बैठक में दुष्यंत गौतम की मौजूदगी के बाद इन तमाम अटकलों पर काफी हद तक विराम लगता दिखाई दे रहा है। बैठक में मुख्यमंत्री (पुष्कर सिंह धामी), सांसद (अजय भट्ट), पूर्व मुख्यमंत्री (त्रिवेंद्र सिंह रावत) और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बैठक में उनकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि वे अभी भी पार्टी संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और उत्तराखंड की राजनीति में उनकी जिम्मेदारी बरकरार है।

राजनीतिक हलकों में फिर तेज हुई चर्चाएं

दुष्यंत गौतम के अचानक संगठनात्मक बैठक में नजर आने के बाद उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। कई लोग इसे भाजपा के अंदरूनी संगठनात्मक समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आगामी राजनीतिक रणनीतियों को लेकर पार्टी अब प्रदेश स्तर पर सक्रियता बढ़ा रही है।

फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि लंबे समय से चल रही अटकलों के बीच उनकी इस मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि वे अभी भी भाजपा संगठन का अहम हिस्सा बने हुए हैं और उत्तराखंड की राजनीति में उनकी भूमिका खत्म नहीं हुई है।

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