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मदरसा विवाद से मचा सियासी तूफान: विधायक शहजाद ने शिक्षा विभाग के अधिकारी पर लगाया ‘साजिश’ का सनसनीखेज आरोप” “विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा विशेषाधिकार हनन का पत्र, बोले— ‘मेरे 26 साल के राजनीतिक सफर को खत्म करने की रची गई साजिश’” अखबार से सोशल मीडिया तक फैली खबरों पर भड़के विधायक, कहा— ‘मुस्लिम समाज में मुझे बदनाम करने की कोशिश’”

इन्तजार रजा हरिद्वार -“मदरसा विवाद से मचा सियासी तूफान: विधायक शहजाद ने शिक्षा विभाग के अधिकारी पर लगाया ‘साजिश’ का सनसनीखेज आरोप”

“विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा विशेषाधिकार हनन का पत्र, बोले— ‘मेरे 26 साल के राजनीतिक सफर को खत्म करने की रची गई साजिश’”

अखबार से सोशल मीडिया तक फैली खबरों पर भड़के विधायक, कहा— ‘मुस्लिम समाज में मुझे बदनाम करने की कोशिश’”

देहरादून/हरिद्वार।
उत्तराखंड की राजनीति में मंगलवार को उस समय बड़ा सियासी विस्फोट हो गया, जब लक्सर विधायक ने हरिद्वार के जिला शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक शिक्षा) अमित कुमार चंद पर गंभीर आरोप लगाते हुए विधानसभा अध्यक्ष श्रीमती को विशेषाधिकार हनन का पत्र सौंप दिया। विधायक ने आरोप लगाया कि शिक्षा विभाग के अधिकारी ने राजनीतिक षड्यंत्र के तहत उनके खिलाफ भ्रामक खबरें फैलवाकर न सिर्फ उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया, बल्कि उन्हें उनके ही समाज में कटघरे में खड़ा कर दिया।

विधायक शहजाद द्वारा दिए गए पत्र के सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में जबरदस्त हलचल मच गई है। मामला केवल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब इसे जनप्रतिनिधि की गरिमा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सदन के विशेषाधिकारों से जोड़कर देखा जा रहा है।

पत्र में विधायक ने स्पष्ट लिखा कि उनके खिलाफ यह प्रचारित किया गया कि उन्होंने पीएम पोषण योजना के अंतर्गत संचालित मदरसों की शिकायत कर उनकी सहायता धनराशि रुकवाने का काम किया। जबकि उनका कहना है कि उन्होंने किसी भी मदरसे के खिलाफ न तो अपने लैटर पैड पर और न ही किसी अन्य दस्तावेज पर कोई शिकायत की है। इसके बावजूद 8 मई 2026 से लगातार अखबारों, यूट्यूब चैनलों, टीवी समाचारों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर ऐसी खबरें प्रसारित की जा रही हैं, जिनमें उन्हें मुस्लिम समाज विरोधी के रूप में पेश किया जा रहा है।

विधायक मौ शहजाद ने अपने पत्र में पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि वह समय-समय पर सदन में सर्वसमाज और मुस्लिम समाज के ज्वलंत मुद्दों को उठाते रहे हैं, लेकिन अब उन्हें उसी समाज के बीच बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने लिखा कि इन खबरों को देखकर उन्हें “आत्मग्लानि” हो रही है और यह पूरा घटनाक्रम उनके 26 वर्षों के राजनीतिक जीवन को खत्म करने की साजिश जैसा प्रतीत हो रहा है।

सबसे बड़ा आरोप विधायक ने जिला शिक्षा अधिकारी अमित कुमार चंद पर लगाया। उन्होंने कहा कि अधिकारी ने किसी राजनीतिक व्यक्ति के साथ मिलकर योजनाबद्ध तरीके से यह पूरा षड्यंत्र रचा, जिससे उनकी मानहानि हो, राजनीतिक नुकसान पहुंचे और विशेषाधिकारों का हनन हो। विधायक ने इसे केवल व्यक्तिगत हमला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुने हुए जनप्रतिनिधियों की गरिमा पर सीधा प्रहार बताया।

इस घटनाक्रम के बाद हरिद्वार से लेकर देहरादून तक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि किसी सरकारी अधिकारी द्वारा किसी विधायक के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण तरीके से खबरें फैलाने या माहौल बनाने की पुष्टि होती है, तो यह बेहद गंभीर मामला माना जाएगा। ऐसे मामलों में विधानसभा की विशेषाधिकार समिति जांच कर सकती है और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की सिफारिश भी संभव है।

वहीं, इस पूरे मामले ने एक और बहस को जन्म दे दिया है— क्या अब सरकारी तंत्र राजनीतिक संघर्षों का हिस्सा बनने लगा है? क्या प्रशासनिक पदों का इस्तेमाल राजनीतिक छवि बिगाड़ने के लिए किया जा रहा है? विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों खेमों में इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सूत्रों की मानें तो विधायक समर्थकों में भी इस घटनाक्रम को लेकर भारी नाराजगी है। सोशल मीडिया पर लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई समर्थकों का कहना है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि अपने ही समाज में गलत तरीके से बदनाम किया जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। वहीं कुछ लोग इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग भी कर रहे हैं ताकि सच्चाई सामने आ सके।

विधानसभा अध्यक्ष श्रीमती ऋतु खंडुरी को सौंपे गए पत्र में विधायक शहजाद ने मांग की है कि उनके विशेषाधिकारों की रक्षा करते हुए संबंधित अधिकारी के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि यदि ऐसे मामलों पर कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई भी अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर जनप्रतिनिधियों को निशाना बना सकता है।

अब पूरे मामले पर निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या यह मामला विशेषाधिकार समिति तक पहुंचेगा? क्या शिक्षा विभाग के अधिकारी से जवाब तलब होगा? और क्या इस राजनीतिक संग्राम में कोई बड़ा खुलासा सामने आएगा? इन सवालों ने उत्तराखंड की राजनीति का तापमान अचानक बढ़ा दिया है।

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