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दरगाह पिरान कलियर की संपत्ति संसाधनों पर अवैध कब्जों के जाल का खेल कन्नी काट गए जिम्मेदार अफ़सर,, नए सीईओ से थी उम्मीद, पर कार्रवाई में दिखी सुस्ती,,  सर्वे शुरू हुआ, लेकिन क्या वाकई हटेंगे अतिक्रमण या फिर चलेगा दिखावा? बाहरी लोगों का कब्जा, दरगाह के संसाधनों की खुली लूट,, अस्थाई कर्मचारियों की नियुक्ति पर भी उठे सवाल ? बाहरी लोगों की नियुक्ति को लेकर दरगाह कार्यालय से क्यों हो गया पत्र जारी 

इन्तजार रजा हरिद्वार- दरगाह पिरान कलियर की संपत्ति और संसाधनों पर कब्जों का खेल जारी!

“अवैध कब्जे, बाहरी नियुक्तियां और संसाधनों की बंदरबांट पर उठे गंभीर सवाल,, आखिर कब टूटेगा ‘संरक्षण’ का नेटवर्क?”

“नए अधिकारियों से थी उम्मीद, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार सुस्त,, चर्चित सुपरवाइजर के ‘तुगलकी फरमानों’ से बढ़ा आक्रोश,, सर्वे के नाम पर फिर कहीं दिखावा तो नहीं?”

उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध इन दिनों एक बार फिर गंभीर विवादों और सवालों के केंद्र में आ गई है। करोड़ों अकीदतमंदों की आस्था से जुड़ी इस पवित्र दरगाह की संपत्तियों, संसाधनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर लगातार उठ रहे सवाल अब जनचर्चा से आगे बढ़कर जनाक्रोश का रूप लेने लगे हैं। दरगाह की जमीनों, दुकानों और संसाधनों पर कथित अवैध कब्जों का मामला वर्षों से सुर्खियों में रहा है, लेकिन अब आरोप और भी गंभीर हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दरगाह की बेशकीमती संपत्तियों पर प्रभावशाली लोगों ने ऐसा कब्जे का जाल फैला रखा है, जिसे हटाने की हिम्मत प्रशासन नहीं जुटा पा रहा। कई स्थानों पर अवैध निर्माण खुलेआम खड़े हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ नोटिस, सर्वे और बैठकों का खेल चलता दिखाई देता है।

अब एक बार फिर सर्वे शुरू होने की चर्चाएं हैं, लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या इस बार वास्तव में अवैध कब्जे हटेंगे या फिर यह भी “फाइलों में दब जाने वाला अभियान” साबित होगा? क्योंकि अतीत में भी कई बार कार्रवाई के दावे हुए, लेकिन नतीजा वही “ढाक के तीन पात” रहा।

दरगाह क्षेत्र में चर्चा इस बात को लेकर भी तेज है कि अस्थाई कर्मचारियों की नियुक्तियों में भारी अनियमितताएं हुईं। आरोप है कि स्थानीय बेरोजगार युवाओं की अनदेखी कर बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी गई। कई लोगों का कहना है कि नियुक्तियों में योग्यता और नियमों से ज्यादा “सिफारिश और पहुंच” का बोलबाला रहा। यही वजह है कि अब दरगाह कार्यालय से जारी हुए पत्रों और नियुक्तियों को लेकर सवालों की बौछार शुरू हो गई है।

लोग पूछ रहे हैं कि आखिर किन परिस्थितियों में बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया? क्या इसके लिए कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई? क्या नियुक्तियों का विज्ञापन जारी हुआ? क्या स्थानीय लोगों को आवेदन का अवसर मिला? यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ, तो फिर पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?

क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि दरगाह प्रशासन के एक चर्चित सुपरवाइजर की कार्यशैली ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि यह सुपरवाइजर कभी भी तुगलकी फरमान जारी कर देता है और कर्मचारियों व स्थानीय लोगों के साथ मनमाने रवैये से पेश आता है। कई लोग इसे “तानाशाही शैली” करार दे रहे हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में लगातार बढ़ती चर्चाएं प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल जरूर खड़े कर रही हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि दरगाह की संपत्तियां किसी व्यक्ति विशेष की निजी जागीर नहीं, बल्कि पूरी कौम और करोड़ों जायरीनों की धरोहर हैं। यदि इन्हीं संसाधनों पर कब्जे और बंदरबांट का खेल चलता रहेगा, तो दरगाह की साख और व्यवस्था दोनों पर गहरा असर पड़ेगा। दरगाह की सभी संपत्तियों का निष्पक्ष सर्वे कराया जाए और अवैध कब्जों की सूची सार्वजनिक की जाए। साथ ही अस्थाई नियुक्तियों की भी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि किन नियमों के तहत नियुक्तियां हुईं और किस आधार पर बाहरी लोगों को मौका दिया गया।

लोगों का यह भी कहना है कि कार्रवाई केवल छोटे लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि वास्तव में अवैध कब्जे हुए हैं, तो उन प्रभावशाली चेहरों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो वर्षों से सिस्टम पर दबाव बनाकर नियमों को कमजोर करते रहे।

दरगाह क्षेत्र में अब सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी इतने वर्षों तक कन्नी क्यों काटते रहे? क्या उन्हें यह सब दिखाई नहीं दिया, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखा किया गया? क्योंकि जिस स्तर पर कब्जों और नियुक्तियों को लेकर चर्चाएं हो रही हैं, उससे प्रशासनिक चुप्पी भी सवालों के घेरे में आ गई है।

नए अधिकारियों से लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। उम्मीद थी कि वर्षों से लंबित मामलों पर सख्त कार्रवाई होगी, कब्जों पर बुलडोजर चलेगा और संसाधनों की कथित बंदरबांट पर रोक लगेगी। लेकिन अब तक की सुस्त कार्रवाई ने लोगों की उम्मीदों को झटका दिया है।अब जनता सिर्फ बयान और आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई चाहती है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या इस बार सच में अवैध कब्जेदारों पर गाज गिरेगी? क्या बाहरी लोगों की नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या दरगाह के संसाधनों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?

फिलहाल इतना तय है कि की जमीन, संसाधनों और नियुक्तियों को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक व्यवस्था की साख पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि सर्वे और जांच की यह कवायद वास्तव में बदलाव लाती है या फिर एक और अधूरी कहानी बनकर इतिहास के पन्नों में दब जाती है।

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