हरिद्वार की ग्राम पंचायतों में ‘सुशासन क्रांति’ की दस्तक! डीपीआरओ अतुल प्रताप सिंह ने गांव-गांव मिनी सचिवालय और राष्ट्र निर्माण केंद्रों का छेड़ा मेगा मिशन,, “अब समस्याओं के लिए नहीं दौड़ेगी जनता, हर गांव में सुनवाई और समाधान की नई व्यवस्था होगी तैयार” — पंचायत तंत्र को जवाबदेही, डिजिटल मॉनिटरिंग और जनसेवा का सख्त ब्लूप्रिंट,, “101 मिनी सचिवालय, बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा, स्वच्छता पर सख्ती और डिजिटल जनसुनवाई” — हरिद्वार में पंचायत व्यवस्था को नए युग में ले जाने की बड़ी तैयारी,,

इन्तजार रजा हरिद्वार- हरिद्वार की ग्राम पंचायतों में ‘सुशासन क्रांति’ की दस्तक! डीपीआरओ अतुल प्रताप सिंह ने गांव-गांव मिनी सचिवालय और राष्ट्र निर्माण केंद्रों का छेड़ा मेगा मिशन,,
“अब समस्याओं के लिए नहीं दौड़ेगी जनता, हर गांव में सुनवाई और समाधान की नई व्यवस्था होगी तैयार” — पंचायत तंत्र को जवाबदेही, डिजिटल मॉनिटरिंग और जनसेवा का सख्त ब्लूप्रिंट,,
“101 मिनी सचिवालय, बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा, स्वच्छता पर सख्ती और डिजिटल जनसुनवाई” — हरिद्वार में पंचायत व्यवस्था को नए युग में ले जाने की बड़ी तैयारी,,
हरिद्वार, 23 मई। हरिद्वार की पंचायत व्यवस्था अब पारंपरिक ढर्रे से निकलकर बदलाव के नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। जिला पंचायत राज अधिकारी अतुल प्रताप सिंह ने पंचायत प्रशासन को सिर्फ योजनाओं और बैठकों तक सीमित रखने के बजाय उसे गांव स्तर पर सक्रिय, जवाबदेह और जनकेंद्रित बनाने की बड़ी कवायद शुरू कर दी है। विकास भवन से आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग समीक्षा बैठक में जो एजेंडा सामने आया, उसने साफ कर दिया कि अब पंचायतों की भूमिका केवल विकास कार्यों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि गांवों में प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूत रीढ़ बनने की तैयारी है।
जनपद के 25 मिनी सचिवालयों से जुड़े ग्राम प्रधानों, ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों, सहायक विकास अधिकारियों, ब्लॉक कोऑर्डिनेटरों और डाटा एंट्री ऑपरेटरों के साथ हुई समीक्षा बैठक में पंचायत व्यवस्था के लिए ऐसा विजन रखा गया, जिसे प्रशासनिक गलियारों में एक बड़े बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है।
बैठक का सबसे बड़ा आकर्षण रहा “राष्ट्र निर्माण केंद्र”। प्रशासन अब पंचायत भवनों को सिर्फ सरकारी कार्यों का स्थान नहीं बल्कि नई पीढ़ी के निर्माण का केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके तहत 6 से 12 वर्ष तक के बच्चों को मूल्य आधारित और नैतिक शिक्षा देने की योजना पर तेजी से काम शुरू किया गया है।
डीपीआरओ ने बताया कि रावली महदूद और शाहपुर शीतलाखेड़ा में शुरू किए गए पायलट प्रोजेक्ट के परिणाम बेहद सकारात्मक रहे हैं। यहां एलईडी टीवी और डिजिटल माध्यमों के जरिए बच्चों को सीखने और संस्कार आधारित शिक्षा से जोड़ा जा रहा है। अब इस योजना को व्यापक रूप देने का लक्ष्य तय किया गया है। प्रशासन ने 15 अगस्त तक 51 मिनी सचिवालय, 02 अक्टूबर तक 75 और 25 दिसंबर तक 101 मिनी सचिवालयों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है।
यानी पंचायत भवन अब सिर्फ सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि गांवों के छोटे प्रशासनिक केंद्र बनते दिखाई देंगे। बैठक में यह भी तय किया गया कि प्रत्येक सोमवार को मिनी सचिवालयों में जनसुनवाई आयोजित की जाएगी। इससे ग्रामीणों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए बार-बार ब्लॉक और जिला कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
शिकायतों को मौके पर सुना जाएगा और उनका समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा। यदि कोई मामला उच्च स्तर का हुआ तो उसे तत्काल व्हाट्सऐप के माध्यम से संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा। साथ ही प्रत्येक शिकायत—चाहे वह लिखित हो या मौखिक—उसे दिनांकवार रजिस्टर में दर्ज करना अनिवार्य किया गया है।
बैठक में पंचायतों को स्वच्छता के मोर्चे पर भी गंभीर जिम्मेदारी दी गई। गांवों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को व्यवस्थित करने, घर-घर कूड़ा पृथक्करण, प्लास्टिक कचरे का अलग संग्रहण और नियमित रिकॉर्ड व्यवस्था पर जोर दिया गया। डीपीआरओ ने कहा कि स्वच्छता सिर्फ सरकारी अभियान नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बननी चाहिए।उन्होंने बच्चों की भूमिका को सबसे प्रभावी बताते हुए कहा कि यदि बच्चे घरों में स्वच्छता को लेकर सवाल करेंगे तो परिवारों की आदतों में भी बदलाव आएगा।
साथ ही स्पष्ट किया गया कि गंदगी फैलाने वालों और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर उत्तराखंड पंचायतीराज अधिनियम-2016 की धारा 25 के तहत कार्रवाई की जाएगी। नोटिस, जुर्माना और वसूली की प्रक्रिया भी लागू होगी। मानसून को देखते हुए पंचायतों को नालों और नालियों की सफाई तत्काल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। जिन पंचायतों के पास संसाधनों की कमी है, उन्हें आपदा न्यूनीकरण मद से प्रस्ताव भेजने को कहा गया है।
यह समीक्षा बैठक एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं आगे दिखाई दी। पंचायत व्यवस्था को गांवों में सीधे सुशासन और सेवा का मॉडल बनाने की जो रणनीति सामने आई है, उसने आने वाले समय की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह महत्वाकांक्षी योजना कागजों से निकलकर गांवों की जमीन पर कितनी तेजी से उतरती है।



