1400 साल पहले कर्बला में हक और इंसाफ के लिए दी गई थी महान कुर्बानी, 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन और 72 साथियों की शहादत आज भी देती है इंसानियत का पैगाम फुरात नदी के किनारे कर्बला की धरती पर लिखी गई थी अमर शहादत की इबारत, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ डटे रहे इमाम हुसैन

1400 साल पहले कर्बला में हक और इंसाफ के लिए दी गई थी महान कुर्बानी, 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन और 72 साथियों की शहादत आज भी देती है इंसानियत का पैगाम
फुरात नदी के किनारे कर्बला की धरती पर लिखी गई थी अमर शहादत की इबारत, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ डटे रहे इमाम हुसैन
हरिद्वार/डेस्क। इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की 10वीं तारीख, जिसे यौमे आशूरा कहा जाता है, पूरी दुनिया में गहरे सम्मान और श्रद्धा के साथ याद की जाती है। यह दिन हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कर्बला में दी गई महान शहादत की याद दिलाता है।
इतिहास के अनुसार, लगभग 1400 वर्ष पहले इराक के कर्बला में फुरात नदी के किनारे इमाम हुसैन ने अन्याय और अत्याचार के सामने झुकने से इनकार कर दिया। उन्हें और उनके साथियों को कई दिनों तक पानी से भी वंचित रखा गया, लेकिन उन्होंने सत्य, न्याय और इंसानियत के सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। अंततः 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने शहादत स्वीकार की।
इस्लामी परंपरा में कर्बला की घटना को सत्य, न्याय, धैर्य, त्याग और इंसानियत की रक्षा के सर्वोच्च उदाहरण के रूप में देखा जाता है। मुहर्रम के अवसर पर दुनिया भर में मजलिस, जुलूस और दुआओं का आयोजन किया जाता है, जहां इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद कर लोगों को सत्य और इंसाफ के रास्ते पर चलने का संदेश दिया जाता है।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि कर्बला की शहादत केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर दौर में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और मानवता की रक्षा करने की प्रेरणा है।



