उर्स खत्म, क्या अब पटरी पर लौटेगी कलियर दरगाह की ‘कार्रवाई व्यवस्था’? मेले की तैयारियों और व्यवस्थाओं के बीच ठंडी पड़ी शिकायतों पर अब निगाहें—गोलक प्रकरण, अवैध कब्जे, ठेका विवाद, शीरमाल आदेश और कथित संरक्षण पर फिर उठे सवाल,, उर्स संपन्न होने के बाद जनता का सीधा सवाल—अब किस बहाने रुकेगी कार्रवाई की गाड़ी? बंद फाइलें खुलेंगी या फिर शिकायतें दोबारा फाइलों में दब जाएंगी?

उर्स खत्म, क्या अब पटरी पर लौटेगी कलियर दरगाह की ‘कार्रवाई व्यवस्था’?
मेले की तैयारियों और व्यवस्थाओं के बीच ठंडी पड़ी शिकायतों पर अब निगाहें—गोलक प्रकरण, अवैध कब्जे, ठेका विवाद, शीरमाल आदेश और कथित संरक्षण पर फिर उठे सवाल,,
उर्स संपन्न होने के बाद जनता का सीधा सवाल—अब किस बहाने रुकेगी कार्रवाई की गाड़ी? बंद फाइलें खुलेंगी या फिर शिकायतें दोबारा फाइलों में दब जाएंगी?

पिरान कलियर। 758वें पिरान कलियर उर्स का समापन हो चुका है और अब सबसे बड़ा सवाल दरगाह की उन शिकायतों और विवादित मामलों को लेकर खड़ा हो गया है, जिन पर उर्स की तैयारियों और मेले की व्यवस्थाओं के दौरान कार्रवाई का इंतजार बना रहा। अब जब लाखों जायरीनों की आमद वाला उर्स संपन्न हो गया है, निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि क्या दरगाह की कथित अनियमितताओं, अवैध कब्जों, ठेका विवादों और लंबित शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था फिर पटरी पर लौटेगी?
पिछले कई महीनों से दरगाह से जुड़े अलग-अलग मामलों में सवाल उठते रहे हैं। कथित गोलक गबन प्रकरण में जांच, निलंबन और बाद में सुपरवाइजर की बहाली तथा फाइल बंद होने की चर्चा हो या दरगाह की जमीन पर कथित कब्जों का मामला—शिकायतकर्ताओं की ओर से लगातार कार्रवाई की मांग की जाती रही है।
अब उर्स खत्म हो चुका है, इसलिए सवाल और सीधा है—
क्या अब जिम्मेदार अधिकारी इन मामलों की फाइलें दोबारा खोलकर वास्तविक स्थिति सामने लाएंगे?
गोलक प्रकरण की बंद फाइल पर फिर नजर
दरगाह की गोलक से जुड़े कथित गबन मामले में पहले जांच और कार्रवाई की बात सामने आई थी। एक सुपरवाइजर के निलंबन और बाद में बहाली की चर्चा के बाद मामला शांत पड़ गया।
लेकिन उर्स के बाद अब फिर सवाल उठ रहा है कि जांच की अंतिम स्थिति क्या है?
क्या जांच रिपोर्ट मौजूद है?
क्या कथित नुकसान की राशि का निर्धारण हुआ?
क्या किसी की जिम्मेदारी तय हुई?
और यदि जांच बंद हो चुकी है तो उसका लिखित आधार क्या है?
उर्स की भीड़ खत्म हो गई, लेकिन यह सवाल खत्म नहीं हुए।
अवैध कब्जों पर अब चलेगी कार्रवाई की गाड़ी?
दरगाह की संपत्तियों पर कथित कब्जों को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। रातों-रात लोहे का ढांचा खड़ा होने से लेकर दरगाह की जमीन के इस्तेमाल तक कई सवाल उठे।
अब उर्स समाप्त होने के बाद प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि मौके पर जाकर संपत्तियों का सत्यापन करे।
कौन सी जमीन दरगाह की है?
कहां कब्जा है?
कहां निर्माण की अनुमति है?
कहां नोटिस जारी हुए?
और कहां वास्तव में कब्जा हटाया गया?
इन सवालों का जवाब भौतिक सत्यापन और रिकॉर्ड मिलान से ही सामने आ सकता है।
हलवा-पराठा, सोहन हलवा ठेका और कथित ‘फ्रेंचाइजी मॉडल’
उर्स से पहले और उसके दौरान दरगाह क्षेत्र में हलवा-पराठा और सोहन हलवा ठेके को लेकर उठे सवाल भी अब फिर चर्चा में हैं।
एक दुकान के ठेके से कथित तौर पर कई दुकानों तक कारोबार पहुंचने के आरोप और इसे ‘फ्रेंचाइजी मॉडल’ बताए जाने पर निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी।
यहां सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा दरगाह का राजस्व है।
ठेका कितने में हुआ?
ठेके की शर्तें क्या थीं?
कितनी दुकानों को अधिकार दिया गया?
कितना राजस्व दरगाह खाते में जमा हुआ?
क्या किसी अतिरिक्त कारोबार से दरगाह को आर्थिक लाभ मिला या संभावित नुकसान हुआ?
इन सवालों का जवाब केवल बयान से नहीं, बल्कि टेंडर फाइल, अनुबंध और लेखा रिकॉर्ड से मिलेगा।
शीरमाल के कथित ‘तुगलकी आदेश’ का हिसाब कौन देगा?
शीरमाल बिक्री को लेकर जारी कथित अतिरिक्त आदेश ने भी विवाद पैदा किया था। शिकायतकर्ताओं का आरोप रहा कि एक ठेकेदार के पक्ष में ऐसा प्रभाव पैदा किया गया जिससे दूसरे दुकानदार प्रभावित हुए।
संयुक्त मजिस्ट्रेट की ओर से किसी ठेकेदार को दूसरे दुकानदारों की शीरमाल बिक्री रोकने का अधिकार नहीं होने संबंधी बात सामने आने के बाद सवाल और गंभीर हो गए।
अब उर्स के बाद पूछा जा रहा है—
वह आदेश किसने जारी किया था?
उसका कानूनी आधार क्या था?
क्या उसे वापस लिया गया?
और उससे प्रभावित दुकानदारों की शिकायत का निस्तारण हुआ या नहीं?
मौखिक आदेश और नियुक्ति विवाद भी अभी बाकी
मौ. रफी से जुड़े कथित नियुक्ति विवाद ने भी दरगाह के प्रशासनिक सिस्टम में लिखित और मौखिक आदेशों को लेकर बहस पैदा की।
यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति या सक्रियता किसी लिखित आदेश पर आधारित है तो वह आदेश सामने आना चाहिए।
और यदि मौखिक निर्देशों के आधार पर प्रशासनिक निर्णय लिए गए हैं तो उनकी वैधानिकता भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सरकारी/प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता का सबसे मजबूत आधार लिखित रिकॉर्ड ही होता है।
अब उर्स के बाद बहाने की गुंजाइश कितनी?
उर्स के दौरान प्रशासन का मुख्य फोकस जायरीनों की सुरक्षा, यातायात, सफाई, बिजली, पानी और कानून-व्यवस्था पर होना स्वाभाविक था।
लेकिन अब उर्स संपन्न हो चुका है।
इसलिए अब जनता यह देखना चाहती है कि जिन मामलों को लेकर लंबे समय से शिकायतें चल रही हैं, उन पर फाइलों से निकलकर जमीन पर कार्रवाई कब दिखाई देगी।
यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद संबंधित लोगों को क्लीन चिट दी जाए।
यदि आरोप सही हैं तो जिम्मेदारी तय की जाए।
यदि मामला लंबित है तो उसकी समयसीमा तय की जाए।
लेकिन अनिश्चितकाल तक फाइलों को लटकाए रखना किसी भी व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना जा सकता।
अब असली परीक्षा दरगाह प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों की
उर्स समाप्त होने के बाद कलियर में भीड़ कम होगी, प्रशासनिक दबाव घटेगा और नियमित व्यवस्था वापस आएगी। ऐसे में यही समय है जब दरगाह की पुरानी शिकायतों और विवादित मामलों की निष्पक्ष समीक्षा हो।
गोलक प्रकरण की फाइल खुलेगी या नहीं?
बहाल किए गए सुपरवाइजर की भूमिका पर अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी या नहीं?
कथित अवैध कब्जों का वास्तविक सर्वे होगा या नहीं?
ठेका और कथित फ्रेंचाइजी मॉडल की जांच होगी या नहीं?
शीरमाल आदेश की वैधता सामने आएगी या नहीं?
दरगाह के संभावित राजस्व नुकसान का हिसाब होगा या नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
“उर्स तो खत्म हो गया… अब कार्रवाई की गाड़ी किस पटरी पर दौड़ेगी?”
कलियर की जनता अब सिर्फ कार्रवाई के दावे नहीं, बल्कि लिखित आदेश, जांच रिपोर्ट, राजस्व रिकॉर्ड और जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई देखना चाहती है।
उर्स की भीड़ चली गई है—अब फाइलों की धूल हटाने की बारी है।



