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हरिद्वार के मदरसों में रिकॉर्ड से गायब ‘12 हजार बच्चों’ का रहस्य!..… 31 हजार से 19 हजार पर पहुंचा नामांकन—131 मदरसों की जांच में बड़ा अंतर, 23 मदरसे जांच के घेरे में; पीएम पोषण पर रोक के बाद फर्जी नामांकन और सरकारी धन के इस्तेमाल पर उठे सवाल,, गढ़मीरपुर का ‘ब्राइट केरियर स्कूल’ भी सवालों के घेरे में—सुल्तानपुर से आकर मदरसा बोर्ड स्कूल खोलने, पीएम पोषण विवाद के बाद संचालन समेटने की चर्चा; जांच कहां तक पहुंची, संचालक और रिकॉर्ड कहां हैं?

हरिद्वार के मदरसों में रिकॉर्ड से गायब ‘12 हजार बच्चों’ का रहस्य!..…

31 हजार से 19 हजार पर पहुंचा नामांकन—131 मदरसों की जांच में बड़ा अंतर, 23 मदरसे जांच के घेरे में; पीएम पोषण पर रोक के बाद फर्जी नामांकन और सरकारी धन के इस्तेमाल पर उठे सवाल,,

गढ़मीरपुर का ‘ब्राइट केरियर स्कूल’ भी सवालों के घेरे में—सुल्तानपुर से आकर मदरसा बोर्ड स्कूल खोलने, पीएम पोषण विवाद के बाद संचालन समेटने की चर्चा; जांच कहां तक पहुंची, संचालक और रिकॉर्ड कहां हैं?

हरिद्वार। जिले के मदरसों में दर्ज छात्र संख्या को लेकर सामने आया भारी अंतर अब महज आंकड़ों की गड़बड़ी का मामला नहीं रह गया है। मार्च 2026 के रिकॉर्ड में जहां 31,780 बच्चों का नामांकन दर्ज बताया गया, वहीं अप्रैल में सत्यापन के दौरान यह संख्या घटकर 19,491 रह गई। यानी रिकॉर्ड और सत्यापन के बीच 12,289 बच्चों का अंतर सामने आया है।

हजारों बच्चों के रिकॉर्ड में एकाएक आए इस अंतर ने शिक्षा विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतने बच्चे रिकॉर्ड से कहां चले गए थे? क्या नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद विद्यार्थियों ने दूसरे विद्यालयों का रुख किया? क्या कक्षाओं के बदलाव और पुराने सत्र के समाप्त होने से संख्या कम हुई? या फिर सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए रिकॉर्ड में वास्तविक संख्या से अधिक नामांकन दर्ज किया गया था?

फिलहाल इन सवालों का अंतिम जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। वर्तमान में जान प्रचलित है लेकिन 31,780 से 19,491 तक की गिरावट को सामान्य रिकॉर्ड परिवर्तन मानकर छोड़ देना भी आसान नहीं है।

31,780 से 19,491… आखिर 12,289 नाम कहां गए?

मार्च और अप्रैल के आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर कई सवाल खड़े करता है। यदि विद्यार्थी दूसरे विद्यालयों में चले गए तो उनके स्थानांतरण अथवा नए प्रवेश का रिकॉर्ड होना चाहिए। यदि नए शैक्षणिक सत्र के कारण संख्या कम हुई तो संस्थानवार उसका विवरण सामने आना चाहिए।

और यदि विद्यार्थी वास्तव में इन्हीं मदरसों में पढ़ रहे थे, तो अप्रैल में हुए सत्यापन के दौरान उनकी उपस्थिति और नामांकन संख्या इतनी कम क्यों मिली?

यही वजह है कि अब एक-एक छात्र के रिकॉर्ड का सत्यापन पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।

131 मदरसों की जांच, 23 पर विशेष नजर

हरिद्वार जिले में पीएम पोषण योजना से जुड़े 131 मदरसों की जांच के दौरान छात्र संख्या और रिकॉर्ड में अंतर सामने आने की बात सामने आई है। इनमें 23 मदरसों को जांच के दायरे में रखा गया है।

पीएम पोषण योजना सीधे विद्यार्थियों की संख्या से जुड़ी है। ऐसे में यदि सरकारी रिकॉर्ड में अधिक छात्र दर्ज हों और भौतिक सत्यापन में कम विद्यार्थी मिलें तो यह पता लगाना जरूरी है कि आंकड़े किस आधार पर तैयार किए गए और उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ।

अब सवाल यह भी है कि जिन संस्थानों में छात्र संख्या में बड़ा अंतर मिला, वहां पहले के महीनों में योजना का लाभ किस संख्या के आधार पर दिया गया?

क्या सभी 12 हजार बच्चे रिकॉर्ड फर्जी थे?

यह सवाल सबसे बड़ा है, लेकिन इसका जवाब जांच रिपोर्ट से ही मिल सकता है।

सिर्फ नामांकन कम होने को आधार बनाकर सभी 12,289 बच्चों को फर्जी कहना उचित नहीं होगा। नए सत्र में विद्यार्थी स्कूल बदल सकते हैं, कक्षा पूरी कर सकते हैं, पढ़ाई छोड़ सकते हैं या रिकॉर्ड अपडेट में देरी हो सकती है।

लेकिन दूसरी ओर, 12,289 का अंतर इतना बड़ा है कि इसे सामान्य प्रशासनिक बदलाव बताकर नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

जांच में प्रवेश रजिस्टर, उपस्थिति पंजिका, परीक्षा रिकॉर्ड, स्थानांतरण प्रमाणपत्र, छात्र संबंधी दस्तावेज और सरकारी पोर्टल के आंकड़ों का मिलान किया जाना जरूरी है। इसी से स्पष्ट होगा कि कितने बच्चे वास्तविक थे और कितने नाम केवल रिकॉर्ड तक सीमित थे।

पीएम पोषण पर रोक के बाद बढ़ी गंभीरता

मदरसों की छात्र संख्या को लेकर उठे सवालों के बीच पीएम पोषण योजना पर रोक की कार्रवाई ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

यदि किसी संस्थान में वास्तविक छात्र संख्या रिकॉर्ड से अलग पाई गई तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि पूर्व में सरकारी योजना का लाभ कितने बच्चों के नाम पर लिया गया। सरकारी भुगतान किस रिकॉर्ड के आधार पर हुआ? क्या पुराने भुगतान का ऑडिट होगा? और यदि जांच में सरकारी धनराशि का गलत इस्तेमाल सामने आता है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

इन सवालों के जवाब अब जांच समिति से अपेक्षित हैं।

गढ़मीरपुर का ‘ब्राइट केरियर स्कूल’ भी सवालों के घेरे में!

मदरसों के नामांकन विवाद के बीच गढ़मीरपुर के ब्राइट केरियर स्कूल को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह संस्थान सुल्तानपुर से आकर गढ़मीरपुर में मदरसा बोर्ड से संबंधित स्कूल के रूप में संचालित किए जाने की चर्चा में रहा है।

इसके बाद पीएम पोषण योजना से जुड़े विवाद में नाम आने और जांच की चर्चा के बीच स्कूल का संचालन समेटे जाने की बात कही जा रही है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि स्कूल बंद या स्थानांतरित हुआ तो संचालक कहां हैं और स्कूल का पूरा रिकॉर्ड कहां गया?

क्या शिक्षा विभाग ने स्कूल का प्रवेश रजिस्टर और उपस्थिति पंजिका अपने कब्जे में ली? कितने बच्चों का नामांकन था? मौके पर कितने बच्चे पढ़ते मिले? स्कूल को मदरसा बोर्ड से किस स्तर की मान्यता अथवा अनुमति थी? पीएम पोषण योजना से संबंधित कोई दावा या भुगतान हुआ था?

इन सवालों का जवाब सामने आना बेहद जरूरी है।

‘शिक्षा के नाम पर कारोबार’ के आरोप की भी जांच जरूरी

ब्राइट केरियर स्कूल को लेकर स्थानीय स्तर पर शिक्षा के नाम पर कारोबार और सरकारी योजनाओं से लाभ लेने जैसे सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती, लेकिन यदि किसी संस्थान में कागजी छात्र संख्या और वास्तविक विद्यार्थियों के बीच बड़ा अंतर मिलता है तो मामला गंभीर हो जाता है।

यही कारण है कि ब्राइट केरियर स्कूल से जुड़े मान्यता दस्तावेज, प्रवेश रिकॉर्ड, उपस्थिति रजिस्टर, छात्र संख्या और पीएम पोषण से जुड़े कागजात की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

अब तक क्या कार्रवाई? जवाब का इंतजार

अब सबसे बड़ा सवाल है कि जांच शुरू होने के बाद वास्तव में अब तक क्या कार्रवाई हुई?

क्या संबंधित संस्थानों को नोटिस जारी किए गए? क्या रिकॉर्ड सुरक्षित कराए गए? क्या संचालकों से जवाब मांगा गया? क्या पीएम पोषण के भुगतान की समीक्षा शुरू हुई? क्या किसी मामले में वसूली, एफआईआर या अन्य विभागीय कार्रवाई की गई?

यदि जांच अभी जारी है तो उसकी अंतरिम रिपोर्ट और अंतिम रिपोर्ट कब तक आएगी, यह भी स्पष्ट होना चाहिए।

सिर्फ ‘जांच चल रही है’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। जनता को यह जानने का अधिकार है कि जांच में अब तक क्या सामने आया और आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।

सवाल सिर्फ 12 हजार बच्चों का नहीं, पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है!

हरिद्वार के मदरसों में छात्र संख्या का यह अंतर अब प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा है।

31,780 का आंकड़ा तैयार किस आधार पर हुआ? 19,491 का सत्यापन कैसे हुआ? 12,289 बच्चों का अंतर क्यों आया?

क्या यह नए सत्र और कक्षाओं में बदलाव का परिणाम है?
क्या बच्चे दूसरे स्कूलों में चले गए?
क्या रिकॉर्ड अपडेट नहीं हुआ?
या कहीं सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए वास्तविकता से अधिक छात्र संख्या दर्ज की गई?

और अगर गड़बड़ी साबित होती है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

गढ़मीरपुर के ब्राइट केरियर स्कूल से जुड़े सवाल इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बनाते हैं। सुल्तानपुर से गढ़मीरपुर तक स्कूल के संचालन, मदरसा बोर्ड से जुड़े दस्तावेज, छात्र संख्या और पीएम पोषण योजना से संबंधित रिकॉर्ड की जांच अब जरूरी दिखाई देती है।

अब नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर है।

अगर 12,289 का अंतर प्रशासनिक कारणों से निकला तो उसका स्पष्ट विवरण सामने आना चाहिए। अगर फर्जी नामांकन या सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।

क्योंकि मामला सिर्फ ‘12 हजार बच्चे कहां गए?’ का नहीं है।

मामला यह भी है कि सरकारी योजनाओं का पैसा किस आधार पर जारी हुआ, रिकॉर्ड किसने तैयार किया और निगरानी व्यवस्था इतने बड़े अंतर को समय रहते क्यों नहीं पकड़ पाई?

अब हरिद्वार को जांच नहीं, जांच का नतीजा और कार्रवाई चाहिए।

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