15 साल पुराने फर्जी पासपोर्ट केस में आचार्य बालकृष्ण बरी, CBI कोर्ट के फैसले से मिली बड़ी राहत,, देहरादून की विशेष CBI अदालत ने सुनाया फैसला, फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने के आरोप साबित नहीं हुए,,
2011 में दर्ज हुई थी FIR, 2012 में CBI ने दाखिल की थी चार्जशीट; हाईकोर्ट पहले ही गिरफ्तारी पर लगा चुका था अंतरिम रोक IPC की धारा 471 और पासपोर्ट एक्ट के तहत चला मुकदमा, करीब डेढ़ दशक चली कानूनी लड़ाई का हुआ अंत

15 साल पुराने फर्जी पासपोर्ट केस में आचार्य बालकृष्ण बरी, CBI कोर्ट के फैसले से मिली बड़ी राहत,,
देहरादून की विशेष CBI अदालत ने सुनाया फैसला, फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने के आरोप साबित नहीं हुए,,
2011 में दर्ज हुई थी FIR, 2012 में CBI ने दाखिल की थी चार्जशीट; हाईकोर्ट पहले ही गिरफ्तारी पर लगा चुका था अंतरिम रोक
IPC की धारा 471 और पासपोर्ट एक्ट के तहत चला मुकदमा, करीब डेढ़ दशक चली कानूनी लड़ाई का हुआ अंत

देहरादून। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री और बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को 15 साल पुराने फर्जी पासपोर्ट मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। देहरादून की विशेष सीबीआई अदालत ने सोमवार को मामले में फैसला सुनाते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामला भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के इस्तेमाल से जुड़ा था। सीबीआई ने मामले में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उनका इस्तेमाल करने सहित पासपोर्ट एक्ट की धाराओं में कार्रवाई की थी।
2011 में शिकायत के बाद शुरू हुई थी जांच
मामले की शुरुआत अप्रैल 2011 में मिली शिकायत से हुई थी। इसके बाद सीबीआई ने प्रारंभिक जांच की और जुलाई 2011 में एफआईआर दर्ज की। जांच एजेंसी के मुताबिक, बरेली स्थित पासपोर्ट कार्यालय में भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए कुछ शैक्षणिक प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए गए थे, जिनकी प्रमाणिकता को लेकर सवाल उठे थे। जांच के दौरान बुलंदशहर के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय से जुड़े प्रमाणपत्र भी जांच के दायरे में आए। यह संस्थान संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध बताया गया था। सीबीआई ने विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के आधार पर प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल उठाए थे।
2012 में अदालत में दाखिल हुई चार्जशीट
जांच पूरी करने के बाद सीबीआई ने वर्ष 2012 में अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। अक्टूबर 2013 में अदालत ने IPC की धारा 120-B, 420, 468 और 471 समेत पासपोर्ट एक्ट के तहत आरोप तय किए। बाद में आरोपों में संशोधन किया गया और मुकदमा मुख्य रूप से IPC की धारा 471 तथा पासपोर्ट एक्ट की धारा 12(1)(B) के तहत आगे चला।
गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट ने लगाई थी रोक
मामले की सुनवाई के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2011 में आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी थी। उन्हें अपना पासपोर्ट अदालत में जमा कराने का निर्देश दिया गया था। लंबी सुनवाई के दौरान पासपोर्ट अदालत में जमा रहा। वर्ष 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उन्हें पासपोर्ट वापस लेने और उसका नवीनीकरण कराने की अनुमति दी थी।
15 साल बाद आया फैसला
करीब डेढ़ दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद देहरादून की विशेष सीबीआई अदालत ने आचार्य बालकृष्ण को मामले में सभी आरोपों से बरी कर दिया।अदालत के इस फैसले के साथ 2011 से चले आ रहे फर्जी पासपोर्ट मामले में आचार्य बालकृष्ण को बड़ी राहत मिली है। फैसले के बाद उन्होंने इसे न्याय व्यवस्था के प्रति अपने भरोसे की जीत बताया।



