नकली दवाओं के खेल पर मानवाधिकार आयोग में दस्तक, भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट ने सरकार से मांगी जवाबदेही,, मेडिकल स्टोर से लेकर मैन्युफैक्चरर तक पूरी सप्लाई चेन की जांच की मांग, हर जिले में ड्रग्स टेस्टिंग लैब और पर्याप्त ड्रग्स इंस्पेक्टर नियुक्त करने की उठी आवाज

नकली दवाओं के खेल पर मानवाधिकार आयोग में दस्तक, भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट ने सरकार से मांगी जवाबदेही,,
मेडिकल स्टोर से लेकर मैन्युफैक्चरर तक पूरी सप्लाई चेन की जांच की मांग, हर जिले में ड्रग्स टेस्टिंग लैब और पर्याप्त ड्रग्स इंस्पेक्टर नियुक्त करने की उठी आवाज

देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड में कथित तौर पर बाजार में पहुंच रही नकली, मिलावटी, मिथ्या लेबल युक्त और मानक विहीन दवाइयों के मामले को लेकर अब राज्य मानवाधिकार आयोग, उत्तराखंड देहरादून में गंभीर सवाल उठाए गए हैं। हरिद्वार के भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट की ओर से राज्य मानवाधिकार आयोग में एक याचिका दायर कर मुख्य सचिव, उत्तराखंड सरकार, प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तथा निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को पक्षकार बनाया गया है।
याचिका में दवाइयों की गुणवत्ता, उनकी निगरानी, सैंपलिंग, वैज्ञानिक परीक्षण और नकली दवाओं की सप्लाई चेन पर प्रभावी कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए व्यापक सुधार की मांग की गई है।
‘दवा सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं’, मरीज के जीवन से जुड़ा है मामला
भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट का कहना है कि औषधि कोई सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं है। जब कोई व्यक्ति बीमारी की स्थिति में चिकित्सक द्वारा लिखी गई दवा खरीदता है तो उसका स्वाभाविक विश्वास होता है कि उसे वास्तविक, सुरक्षित, प्रभावी और निर्धारित गुणवत्ता वाली औषधि मिल रही है।
याचिका के अनुसार यदि किसी मरीज को नकली, मिलावटी, मिथ्या लेबल युक्त अथवा मानक विहीन दवा मिलती है तो उसका उपचार निष्फल होने के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसी आधार पर याचिका में दवाइयों की गुणवत्ता की निगरानी को सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन एवं स्वास्थ्य से जुड़ा सार्वजनिक हित का विषय बताया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा है कि जीवन के अधिकार की सुरक्षा केवल प्रत्यक्ष हिंसा से बचाने तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नियामक व्यवस्था भी आवश्यक है।
सिर्फ मेडिकल स्टोर पर कार्रवाई क्यों? पूरी सप्लाई चेन की हो जांच
याचिका का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नकली या संदिग्ध दवा मिलने की स्थिति में कार्रवाई को केवल मेडिकल स्टोर संचालक तक सीमित नहीं रखने की मांग की गई है।
भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य बिना जांच किसी निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर या होलसेलर को दोषी ठहराना नहीं है। मांग यह है कि जब भी कोई संदिग्ध अथवा नकली दवा सामने आए तो जांच का दायरा उसके पूरे स्रोत और सप्लाई नेटवर्क तक पहुंचे।
याचिका में मैन्युफैक्चरर से लेकर सीएंडएफ एजेंट, एजेंट, डिस्ट्रीब्यूटर, होलसेलर, स्टॉकिस्ट, रिटेलर और अंततः मरीज तक पूरी सप्लाई चेन की जांच की मांग की गई है।
इसके साथ संबंधित दवा के बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग विवरण, लाइसेंस, इनवॉइस, खरीद रिकॉर्ड, बिक्री रिकॉर्ड, ट्रांसपोर्ट दस्तावेज और जीएसटी रिकॉर्ड की जांच को आवश्यक बनाने की मांग की गई है। उद्देश्य यह पता लगाना है कि संदिग्ध दवा बाजार में आखिर किस स्रोत से पहुंची और उसकी सप्लाई में कौन-कौन से स्तर शामिल रहे।
याचिका में कहा गया है कि सप्लाई चेन के वैज्ञानिक और दस्तावेजी सत्यापन के बाद ही संबंधित व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
हर जिले में ड्रग्स टेस्टिंग लैब की मांग, देरी पर भी उठे सवाल
याचिका में नकली एवं मानक विहीन दवाओं की जांच में वैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी दवा को नकली अथवा मानक विहीन घोषित करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण महत्वपूर्ण है।
इसीलिए राज्य के प्रत्येक जिले में शीघ्र ड्रग टेस्टिंग लैबोरेट्री स्थापित करने की मांग की गई है। तर्क दिया गया है कि यदि किसी संदिग्ध दवा का सैंपल परीक्षण के लिए दूर स्थित प्रयोगशाला में भेजना पड़े और इसमें लंबा समय लग जाए तो इस बीच संबंधित बैच के बाजार में उपलब्ध रहने का जोखिम बना रह सकता है।
इसके साथ प्रत्येक जिले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक विशेष व्यवस्था/सेल गठित करने, आम जनता को नकली दवाओं की पहचान और शिकायत के संबंध में जागरूक करने तथा शिकायत के लिए सरल ऑनलाइन और ऑफलाइन व्यवस्था विकसित करने की मांग भी की गई है।
पर्याप्त ड्रग्स इंस्पेक्टर और संसाधनों की मांग
याचिका में प्रत्येक जिले में पर्याप्त संख्या में ड्रग इंस्पेक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की गई है। साथ ही अधिकारियों को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने और ड्रग सैंपल की जांच के लिए अधिकतम समय सीमा तय करने की व्यवस्था पर राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगे जाने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की ओर से नकली एवं मानक विहीन दवाओं को लेकर जारी ड्रग अलर्ट और गाइडलाइंस का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि इससे स्पष्ट होता है कि दवाइयों की गुणवत्ता की पहचान और उनके विरुद्ध प्रभावी प्रवर्तन सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
मानवाधिकार आयोग से मांगी तीन साल की जिलेवार रिपोर्ट
भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट ने आयोग से राज्य सरकार की ओर से विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट तलब करने की मांग की है। साथ ही पिछले तीन वर्षों में राज्य में लिए गए ड्रग सैंपलों और उनके परीक्षण परिणामों की जिलेवार रिपोर्ट आयोग के समक्ष प्रस्तुत कराने की मांग की गई है।
इसके अलावा पिछले तीन वर्षों में नकली दवाओं के संबंध में की गई कार्रवाई की जिलेवार सूची, प्रत्येक जिले में ड्रग इंस्पेक्टरों की उपलब्धता, सैंपल टेस्टिंग में लगने वाले समय और नकली दवा मिलने के बाद मैन्युफैक्चरर से लेकर सप्लाई चेन तक की गई कार्रवाई का विवरण भी मांगा गया है।
अब आयोग की कार्रवाई पर टिकी नजरें
नकली और मानक विहीन दवाओं का मुद्दा सीधे आम नागरिक के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा होने के कारण इस याचिका ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब नजर इस बात पर है कि राज्य मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड इस याचिका पर क्या संज्ञान लेता है और राज्य सरकार से किस प्रकार की रिपोर्ट एवं जवाब तलब किया जाता है।
याचिका में उठाए गए सवालों का वास्तविक परीक्षण संबंधित सरकारी विभागों की जांच, रिकॉर्ड और वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर ही संभव होगा। हालांकि यदि आयोग इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब करता है तो पिछले तीन वर्षों में दवा सैंपलिंग, परीक्षण और कार्रवाई से जुड़ी जिलेवार तस्वीर सामने आने की संभावना है।
अब सवाल सिर्फ नकली दवा पकड़ने का नहीं, बल्कि उस दवा के बाजार तक पहुंचने की पूरी कहानी सामने लाने का है।



