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ग्राम प्रधान की मौत पर फिर चुनाव या पंचायत के भीतर से नया प्रधान? मानवाधिकार आयोग पहुंचा ‘उपचुनाव बनाम जनधन’ का मामला!…. भदौरिया एसोसिएट की याचिका में बड़ा सवाल—एक प्रधान की आकस्मिक मौत के बाद दोबारा चुनाव कराने में सरकारी खजाने से कितना पैसा जाता है? अधिकारियों की ड्यूटी, सुरक्षा, परिवहन से लेकर स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होने तक की रिपोर्ट मांगे जाने की मांग

ग्राम प्रधान की मौत पर फिर चुनाव या पंचायत के भीतर से नया प्रधान? मानवाधिकार आयोग पहुंचा ‘उपचुनाव बनाम जनधन’ का मामला! भदौरिया एसोसिएट की याचिका में बड़ा सवाल—एक प्रधान की आकस्मिक मौत के बाद दोबारा चुनाव कराने में सरकारी खजाने से कितना पैसा जाता है? अधिकारियों की ड्यूटी, सुरक्षा, परिवहन से लेकर स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होने तक की रिपोर्ट मांगे जाने की मांग

प्रधान की कुर्सी खाली, फिर चुनाव का खर्च क्यों? मानवाधिकार आयोग में पहुंचा जनधन बचाने का मुद्दा!

ग्राम प्रधान की आकस्मिक मौत के बाद उपचुनाव की पूरी प्रक्रिया पर सवाल—‘जब पंचायत के निर्वाचित सदस्य मौजूद हैं तो उन्हीं में से क्यों न चुना जाए नया प्रधान?’

हरिद्वार। ग्राम प्रधान की आकस्मिक मौत… कुर्सी खाली… और फिर शुरू हो जाता है उपचुनाव का पूरा सरकारी तंत्र। निर्वाचन अधिकारी से लेकर कर्मचारी, पुलिस बल, मतदान केंद्र, स्टेशनरी, परिवहन और मतगणना तक सरकारी मशीनरी मैदान में उतरती है। इसी पूरी व्यवस्था को लेकर हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने अब उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून में दस्तक दी है।

अरुण भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, सुमेधा भदौरिया एडवोकेट, चेतन भदौरिया एलएलबी अध्यनरत और शाहनवाज मलिक एलएलबी अध्यनरत की ओर से 1 अक्टूबर 2026 को दाखिल याचिका में ग्राम प्रधान की मृत्यु से खाली होने वाले पद पर कराए जाने वाले उपचुनाव की व्यवस्था पर कई सवाल उठाए गए हैं।

‘एक प्रधान की मौत के बाद पूरा चुनावी सिस्टम क्यों?’

याचिका में कहा गया है कि ग्राम पंचायत लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की मूल इकाई है। संविधान के भाग-9 में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार पंचायत का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का होता है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार प्रधान की मृत्यु, त्यागपत्र या पद से हटाए जाने जैसी परिस्थितियों में पद रिक्त हो जाता है और उत्तराखंड पंचायती राज कानून में ऐसी आकस्मिक रिक्ति को भरने की व्यवस्था मौजूद है।

लेकिन सवाल यहीं से उठाया गया है—क्या हर बार पूरी चुनावी प्रक्रिया दोहराना जरूरी है?

याचिका में कहा गया है कि उपचुनाव के लिए निर्वाचन अधिसूचना, निर्वाचन अधिकारी-कर्मचारी, सुरक्षा व्यवस्था, मतदान केंद्र, निर्वाचन सामग्री, स्टेशनरी, परिवहन, प्रशिक्षण और मतगणना समेत कई स्तरों पर सार्वजनिक धन खर्च होता है।

सरकारी खजाने से खर्च, अधिकारियों की ड्यूटी और स्कूलों पर असर

याचिकाकर्ताओं ने आयोग से यह जानकारी भी मांगने का आग्रह किया है कि ग्राम प्रधान की आकस्मिक रिक्ति पर कराए गए उपचुनाव में सरकारी खजाने से वास्तविक रूप से कितना पैसा खर्च हुआ।

याचिका में स्टेशनरी, परिवहन, कार्मिक, सुरक्षा, मतदान केंद्र और अन्य मदों में हुए खर्च का अलग-अलग ब्यौरा मांगे जाने की मांग की गई है।

इसके अलावा चुनावी ड्यूटी में लगाए जाने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या की रिपोर्ट भी मांगी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियमित प्रशासनिक कार्यों से अधिकारियों-कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में लगाए जाने के कारण विकास कार्य, राजस्व कार्य, पंचायत संबंधी कार्य और जनसेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

‘स्कूल में चुनाव और बच्चों की पढ़ाई पर ब्रेक?’

याचिका में सरकारी स्कूलों को मतदान केंद्र बनाए जाने के मुद्दे को भी उठाया गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में मतदान केंद्र बनाए जाने की स्थिति में चुनावी प्रक्रिया के दौरान बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होने की बात याचिका में कही गई है।

आयोग से यह रिपोर्ट मंगाने की मांग की गई है कि कितने सरकारी विद्यालयों को मतदान केंद्र बनाया गया और चुनावी प्रक्रिया के कारण कितने समय तक शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हुईं।

सबसे बड़ा प्रस्ताव—पंचायत के अंदर से ही चुनें नया प्रधान

याचिका में सबसे महत्वपूर्ण मांग यह है कि ग्राम प्रधान की मृत्यु होने पर निर्वाचित उपप्रधान को शेष कार्यकाल के लिए प्रधान का कार्यभार देने की कानूनी व्यवस्था बनाई जाए।

इसके अलावा ग्राम पंचायत के निर्वाचित सदस्यों में से ही प्रधान का चुनाव कराने की व्यवस्था किए जाने की मांग की गई है।

यानी जिस पंचायत के सदस्यों को जनता पहले ही चुन चुकी है, उसी निर्वाचित पंचायत के भीतर से लोकतांत्रिक और वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से शेष कार्यकाल के लिए प्रधान चुना जाए।

याचिकाकर्ताओं ने उपचुनाव न कराने की वर्तमान सीमा पर भी पुनर्विचार की मांग की है, विशेष रूप से तब जब प्रधान के कार्यकाल की शेष अवधि बहुत कम बची हो।

आयोग से मांगा ‘खर्च का पूरा हिसाब’

याचिका में राज्य मानवाधिकार आयोग से राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से रिपोर्ट मंगाने की मांग की गई है कि ग्राम प्रधान की आकस्मिक मृत्यु के बाद होने वाले प्रत्येक उपचुनाव में अनुमानित और वास्तविक खर्च कितना हुआ।

साथ ही यह भी बताया जाए कि उसमें—

  • स्टेशनरी पर कितना खर्च हुआ?
  • परिवहन पर कितना खर्च हुआ?
  • कार्मिकों पर कितना खर्च हुआ?
  • सुरक्षा व्यवस्था पर कितना खर्च हुआ?
  • मतदान केंद्रों पर कितना खर्च हुआ?
  • मतगणना एवं अन्य व्यवस्थाओं पर कितना खर्च हुआ?

याचिका में यह रिपोर्ट भी मांगे जाने की मांग है कि ऐसे उपचुनावों में कुल कितने सरकारी अधिकारी-कर्मचारी लगाए जाते हैं।

‘बचे सरकारी पैसे को विकास में लगाओ’

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकारी खजाना जनता से प्राप्त राजस्व और करों से चलता है। इसलिए सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में मितव्ययिता और बेहतर प्रशासन का सवाल महत्वपूर्ण है।

उनकी मांग है कि यदि पंचायत के निर्वाचित सदस्यों में से ही वैधानिक प्रक्रिया के तहत शेष कार्यकाल के लिए प्रधान चुनने का विकल्प बनाया जा सकता है, तो इससे उपचुनाव पर होने वाले खर्च और प्रशासनिक संसाधनों के इस्तेमाल को कम करने पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, यह याचिकाकर्ताओं की मांग और तर्क हैं; इस पर अंतिम निर्णय राज्य मानवाधिकार आयोग अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिया जाना बाकी है।

अब निगाहें राज्य मानवाधिकार आयोग पर हैं कि इस याचिका पर क्या कार्रवाई होती है और राज्य सरकार तथा राज्य निर्वाचन आयोग से किस तरह की रिपोर्ट तलब की जाती है।

प्रधान की कुर्सी खाली होने के बाद हर बार चुनावी रणभूमि सजाने की व्यवस्था बनाम पंचायत के भीतर से नया नेतृत्व चुनने का विकल्प—हरिद्वार से उठी यह याचिका अब उत्तराखंड की पंचायत व्यवस्था में एक बड़ी बहस का दरवाजा खोलती नजर आ रही है।

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