Daily Live Uttarakhand updateउत्तराखंडएक्सक्लूसिव खबरें

वर्दी की 25 साल की तपस्या, अब हक की बारी! ‘सिल्वर जुबली’ पर उत्तराखंड पुलिस के लिए 21 सुधारों का बिगुल—CM धामी और DGP से सीधी मांग, ड्यूटी के साथ परिवार और सम्मान भी जरूरी…… 10 अक्टूबर 2001 को शुरू हुआ पहला कांस्टेबल बैच, 10 अक्टूबर 2026 को 25 साल पूरे—भदौरिया एसोसिएट ने कहा: पुलिस सिर्फ डंडा और ड्यूटी नहीं, इंसान भी है; अब सप्ताह में एक छुट्टी, पारदर्शी ट्रांसफर, महिला पुलिस को सुविधा और परिवार के करीब पोस्टिंग पर फैसला जरूरी

पुलिसकर्मियों के लिए व्यवहारिक सुधारों की शुरुआत का मौका बनाने की मांग को लेकर हरिद्वार से अरुण भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदौरिया एडवोकेट पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह और चेतन भदौरिया एलएलबी अध्ययनरत ने मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार तथा पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड को पत्र भेजा

वर्दी की 25 साल की तपस्या, अब हक की बारी! ‘सिल्वर जुबली’ पर उत्तराखंड पुलिस के लिए 21 सुधारों का बिगुल—CM धामी और DGP से सीधी मांग, ड्यूटी के साथ परिवार और सम्मान भी जरूरी……

10 अक्टूबर 2001 को शुरू हुआ पहला कांस्टेबल बैच, 10 अक्टूबर 2026 को 25 साल पूरे—भदौरिया एसोसिएट ने कहा: पुलिस सिर्फ डंडा और ड्यूटी नहीं, इंसान भी है; अब सप्ताह में एक छुट्टी, पारदर्शी ट्रांसफर, महिला पुलिस को सुविधा और परिवार के करीब पोस्टिंग पर फैसला जरूरी

 

इन्तजार रजा हरिद्वार। उत्तराखंड पुलिस की वर्दी ने 25 सालों में कानून-व्यवस्था से लेकर अपराध नियंत्रण, वीआईपी ड्यूटी, आपदा, त्योहार, रात्रि गश्त और आपात परिस्थितियों तक हर मोर्चे पर अपनी जिम्मेदारी निभाई है। अब इसी वर्दी के भीतर खड़े उस पुलिसकर्मी की आवाज मुख्यमंत्री और पुलिस मुख्यालय तक पहुंचाने की कोशिश हुई है, जो लंबे समय से ड्यूटी और परिवार के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद कर रहा है।

10 अक्टूबर 2001 को उत्तराखंड में पुलिस कांस्टेबल के पहले बैच की भर्ती हुई थी। 10 अक्टूबर 2026 को इस भर्ती के 25 वर्ष पूरे होने पर सिल्वर जुबली मनाई जाएगी। इसी अवसर को पुलिसकर्मियों के लिए व्यवहारिक सुधारों की शुरुआत का मौका बनाने की मांग को लेकर हरिद्वार से अरुण भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदौरिया एडवोकेट पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह और चेतन भदौरिया एलएलबी अध्ययनरत ने मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार तथा पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड को पत्र भेजा है।

वर्दी की चमक के पीछे छिपी थकान—अब सिस्टम को भी पुलिसकर्मी दिखाई देना चाहिए

पत्र में बेहद साफ शब्दों में कहा गया है कि पुलिस राज्य की कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, नागरिक सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों का सबसे महत्वपूर्ण विभाग है। पुलिसकर्मी अनियमित कार्य समय, रात की ड्यूटी, लगातार कानून-व्यवस्था ड्यूटी, त्योहारों और विशेष अवसरों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी तथा परिवार से लंबे समय तक दूर रहकर काम करते हैं।

लेकिन सवाल यही है—क्या पुलिसकर्मी का मनोबल सिर्फ वेतन से बढ़ता है?

पत्र में कहा गया है कि सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां, पर्याप्त विश्राम, पारिवारिक सुविधा, पारदर्शी स्थानांतरण व्यवस्था और अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत समस्याओं को समझना भी पुलिस बल के मनोबल को मजबूत करता है।

और सबसे खास बात—इनमें से कई सुधारों के लिए किसी बड़े बजट की जरूरत नहीं है। सिर्फ प्रशासनिक सोच बदलने और व्यवस्था को थोड़ा मानवीय बनाने की जरूरत है।

21 मांगें नहीं, पुलिस परिवार के लिए ‘सिस्टम अलर्ट’—अब घोषणा की जरूरत

भदौरिया एडवोकेट एसोसिएट की ओर से रखे गए प्रस्तावों में सबसे पहली और महत्वपूर्ण मांग है कि प्रत्येक पुलिसकर्मी को सप्ताह में एक दिन का अवकाश दिया जाए। वहीं रात की ड्यूटी के बाद पर्याप्त विश्राम की व्यवस्था की मांग भी रखी गई है।

विवाहित महिला पुलिसकर्मियों को ससुराल परिवार के निकट पोस्टिंग, पति-पत्नी दोनों के सरकारी सेवा में होने पर पास-पास नियुक्ति और छोटे बच्चों वाली महिला पुलिसकर्मियों को यथासंभव नजदीकी पोस्टिंग देने की मांग की गई है।

गर्भवती महिला पुलिसकर्मियों के लिए कार्य में आवश्यक समायोजन और बड़े थानों में महिला पुलिसकर्मियों के लिए अलग विश्राम एवं स्वच्छता सुविधा उपलब्ध कराने की मांग भी पत्र में शामिल है।

पुलिस थानों को लेकर भी सुझाव गंभीर है। प्रत्येक थाने में चाय-कैंटीन की व्यवस्था, ताकि लंबे समय तक ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों को न्यूनतम सुविधाएं मिल सकें।

ट्रांसफर में ‘सिफारिश’ नहीं, सिस्टम चले—ऑनलाइन स्टेटस की मांग

स्थानांतरण व्यवस्था को लेकर पत्र में सबसे ज्यादा जोर पारदर्शिता पर दिया गया है। मांग है कि स्थानांतरण नीति बिना भेदभाव के लागू हो और लंबे समय से दुर्गम या कठिन क्षेत्रों में सेवा दे रहे पुलिसकर्मियों को निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद स्थानांतरण में प्राथमिकता मिले।

फायर ब्रिगेड में तैनात महिला एवं पुरुष कर्मचारियों को गृह जनपद पोस्टिंग की सुविधा देने का सुझाव भी रखा गया है।

वहीं अच्छे सेवा रिकॉर्ड वाले पुलिसकर्मियों को पसंदीदा स्थानांतरण, प्रशिक्षण, प्रशंसा पत्र, परिवार के निकट पोस्टिंग, अवकाश के अनुरोध और विशेष जिम्मेदारियों में प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

सबसे बड़ा बदलाव—स्थानांतरण आवेदन का ऑनलाइन स्टेटस। पुलिसकर्मी खुद देख सके कि उसका आवेदन किस स्तर पर लंबित है। इससे अनावश्यक सिफारिशों और कार्यालयों के चक्कर कम होने की उम्मीद जताई गई है।

थाने में सिर्फ अपराध की मीटिंग नहीं, कर्मचारी की परेशानी भी सुनी जाए

पत्र में प्रत्येक जनपद के प्रत्येक थाने में महीने में कम से कम एक बार वेलफेयर मीटिंग कराने की मांग है। इसमें पुलिसकर्मी अपनी वास्तविक समस्याएं अधिकारियों के सामने रख सकें और उसका रिकॉर्ड जिले के उच्च अधिकारियों तक भेजा जाए।

साल में एक-दो बार फैमिली वेलफेयर कार्यक्रम, पुलिसकर्मियों की सालाना स्वास्थ्य जांच, जन्मदिन और सेवा उपलब्धियों पर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा शुभकामनाएं तथा अच्छे काम के लिए तत्काल प्रशंसा पत्र देने की व्यवस्था का सुझाव भी दिया गया है।

साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों से बिना औपचारिकता के थाना कर्मचारियों से बातचीत कर उनकी वास्तविक कठिनाइयों को समझने की अपेक्षा की गई है।

परिवार पर संकट आए तो वर्दी को भी इंसान बनने का अधिकार

पुलिसकर्मी के परिवार में मृत्यु या गंभीर दुर्घटना होने पर तत्काल छुट्टी अथवा ड्यूटी राहत की स्पष्ट प्रक्रिया बनाने की मांग भी पत्र में है।

पुलिस कर्मचारियों के परिवारों को सेवा संबंधी सामान्य जानकारी उपलब्ध कराने के लिए जिला स्तर पर वेलफेयर हेल्प डेस्क बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

पत्र के अनुसार इन सुधारों से सरकार पर बड़ा वित्तीय भार नहीं पड़ेगा, लेकिन इसका असर सीधे पुलिसकर्मियों के मनोबल पर पड़ेगा। थकान कम होगी, पारिवारिक तनाव घटेगा, महिला पुलिसकर्मियों को बेहतर कार्यस्थल मिलेगा और स्थानांतरण व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी।

10 अक्टूबर को सिर्फ सिल्वर जुबली नहीं—क्या बदलेगी पुलिस की तस्वीर?

अब नजर 10 अक्टूबर 2026 पर है। यह तारीख उत्तराखंड पुलिस के पहले कांस्टेबल बैच की 25वीं वर्षगांठ है। भदौरिया एडवोकेट एसोसिएट ने उम्मीद जताई है कि सिल्वर जुबली के अवसर पर मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक इन व्यवहारिक सुधारों पर सकारात्मक घोषणा कर सकते हैं।

यह मांग सिर्फ पुलिसकर्मी की सुविधा की मांग नहीं है। यह उस व्यवस्था को मजबूत करने की मांग है, जो दिन-रात जनता की सुरक्षा में खड़ी रहती है।

वर्दी की कहानी सिर्फ अपराधी पकड़ने की कहानी नहीं होती। वर्दी के पीछे भी एक परिवार, एक मां, एक पत्नी, एक पति, एक बच्चा और एक इंसान होता है।

अब सवाल सीधा है—25 साल की सेवा के सिल्वर जुबली मुकाम पर पुलिस को सिर्फ बधाई मिलेगी या वर्दी के पीछे खड़े इंसान को भी उसका हक मिलेगा?

10 अक्टूबर को इसका जवाब मिलने का इंतजार रहेगा।

Related Articles

Back to top button