अंग्रेजों के कानूनों के खिलाफ हरिद्वार से आर-पार की लड़ाई! मानवाधिकार आयोग में पहुंची याचिका, गुलामी की कानूनी विरासत खत्म करने की मांग से मचा हलचल… भदौरिया एसोसिएट ग्रुप ने खोला कानूनी मोर्चा, गृह सचिव से DGP तक को बनाया पक्षकार; 1947 में देश आजाद होने के बावजूद अंग्रेजों के बनाए कानूनों पर उठाए गंभीर सवाल, नए दौर के हिसाब से कानून बनाने की मांग

अंग्रेजों के कानूनों के खिलाफ हरिद्वार से आर-पार की लड़ाई! मानवाधिकार आयोग में पहुंची याचिका, गुलामी की कानूनी विरासत खत्म करने की मांग से मचा हलचल…
भदौरिया एसोसिएट ग्रुप ने खोला कानूनी मोर्चा, गृह सचिव से DGP तक को बनाया पक्षकार; 1947 में देश आजाद होने के बावजूद अंग्रेजों के बनाए कानूनों पर उठाए गंभीर सवाल, नए दौर के हिसाब से कानून बनाने की मांग
हरिद्वार। देश आजाद हुए करीब 79 साल हो चुके हैं, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के दौर में तैयार हुई कानूनी व्यवस्था की विरासत आज भी कई रूपों में देश के सामने है। इसी मुद्दे को लेकर हरिद्वार के अधिवक्ताओं और कानून के विद्यार्थियों ने अब बड़ा कानूनी कदम उठाया है। भदौरिया एसोसिएट ग्रुप ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून का दरवाजा खटखटाते हुए औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाए गए कानूनों की व्यापक समीक्षा और अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करने की मांग की है।
याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो गया था तो फिर अंग्रेजी शासन की परिस्थितियों में बनाए गए कानूनों को आज भी क्यों ढोया जा रहा है? क्या आजाद भारत की कानूनी व्यवस्था को पूरी तरह नागरिक अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होना चाहिए?
29 अक्टूबर 2026 को दाखिल इस याचिका में उत्तराखंड शासन के प्रमुख सचिव गृह विभाग, प्रमुख सचिव संस्कृति विभाग और पुलिस महानिदेशक को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने आयोग से औपनिवेशिक कानूनों की समीक्षा कर नई कानूनी व्यवस्था विकसित करने के लिए संबंधित विभागों को निर्देशित करने की मांग की है।
छह लोगों ने मिलकर उठाई अंग्रेजी कानूनों के खिलाफ आवाज
इस याचिका में अधिवक्ता अरुण कुमार भदौरिया, अधिवक्ता कमल भदौरिया, अधिवक्ता सुमेधा भदौरिया, अधिवक्ता रेखा पांडेय, एलएलबी के विद्यार्थी चेतन भदौरिया और शाहनवाज मलिक याचिकाकर्ता हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आजादी के बाद देश ने शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, तकनीक और सामाजिक जीवन में बड़े बदलाव देखे हैं, लेकिन कानूनों की समीक्षा उसी गति से नहीं हुई। कई पुराने कानूनों की मूल भावना अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़ी थी। इसलिए उनकी वर्तमान उपयोगिता और नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन होना चाहिए।
1857 की क्रांति से अंग्रेजों की कानून बनाने की नीति तक का जिक्र
याचिका में 1857 की क्रांति को आधार बनाकर अंग्रेजी शासन की नीतियों पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें महान क्रांतिकारी मंगल पांडे और उस दौर में मठ-मंदिरों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अंग्रेज भारतीय समाज के संगठित प्रतिरोध और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के प्रभाव से भयभीत थे। इसी कारण उन्होंने भारतीयों पर नियंत्रण मजबूत करने के लिए प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्थाएं तैयार कीं।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि अंग्रेजी शासन के दौरान बड़ी संख्या में भारतीयों को फांसी, काला पानी और कठोर सजाएं दी गईं। विशेष रूप से ब्राह्मणों और मठ-मंदिरों के पुजारियों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया गया है। हालांकि इन दावों के समर्थन में ऐतिहासिक अभिलेखों और प्रमाणित आंकड़ों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
1860 से 1927 तक के कानूनों को बनाया बहस का मुद्दा
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों में भारतीय दंड संहिता 1860, पुलिस एक्ट 1861, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम 1863, आर्म्स एक्ट 1878, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 और वन अधिनियम 1927 का उल्लेख किया है।
उनका कहना है कि इन कानूनों के निर्माण के पीछे उस समय की औपनिवेशिक प्रशासनिक जरूरतें और शासन को नियंत्रित रखने की परिस्थितियां थीं। पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया, जमीन और जंगलों से जुड़े अधिकारों तथा धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन पर अंग्रेजी शासन की नीतियों का प्रभाव रहा।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि अंग्रेजी न्यायिक व्यवस्था में भाषा और प्रशासनिक ढांचे की बाधाओं के कारण आम भारतीयों को अपना पक्ष रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। अदालतों में अंग्रेज अधिकारी, अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभाव था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक स्वतंत्र भारत में न्याय व्यवस्था को आम नागरिकों के लिए अधिक सुलभ और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
मठ-मंदिरों और जमीन के अधिकारों पर भी उठाए सवाल
याचिका में धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और जमीन के अधिकारों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अंग्रेजों ने मठ-मंदिरों पर नियंत्रण स्थापित करने और भारतीयों के पारंपरिक अधिकारों को प्रभावित करने के उद्देश्य से विभिन्न कानूनों का सहारा लिया था।
इसके साथ ही 99 वर्ष की लीज पर जमीन दिए जाने और भूमि अधिकारों से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि औपनिवेशिक दौर की भूमि और वन संबंधी नीतियों की वर्तमान परिस्थितियों में समीक्षा होनी चाहिए, ताकि नागरिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
सिर्फ कानूनों का नाम बदलना नहीं, पूरी व्यवस्था की समीक्षा की मांग
भदौरिया एसोसिएट ग्रुप का कहना है कि आजाद भारत में कानून बनाने का उद्देश्य जनता को भयभीत करना नहीं, बल्कि न्याय देना और संविधान के मूल्यों की रक्षा करना होना चाहिए। याचिका में मांग की गई है कि अंग्रेजों के शासनकाल में बनाए गए सभी कानूनों की सूची तैयार कर उनकी वर्तमान प्रासंगिकता की जांच की जाए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि नए कानून तैयार करने की प्रक्रिया केवल सरकारी अधिकारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें कानूनविदों, न्यायिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि कानून वास्तव में जनता की जरूरतों के अनुरूप बन सकें।
मानवाधिकार आयोग के सामने रखीं चार बड़ी मांगें
याचिका में राज्य मानवाधिकार आयोग से चार प्रमुख मांगें की गई हैं—
- अंग्रेजों द्वारा देश की आजादी से पहले बनाए गए कानूनों की व्यापक समीक्षा कर अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करने की कार्रवाई की जाए।
- वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नए कानून बनाने के लिए संबंधित विभागों को निर्देशित किया जाए।
- नए कानून बनाने से पहले विधि विशेषज्ञों और नागरिक समाज से व्यापक परामर्श लिया जाए।
- उत्तराखंड शासन के गृह विभाग और न्याय विभाग से इस विषय पर उनका पक्ष तथा उपलब्ध कानूनों एवं नीतियों की जानकारी प्राप्त कर विचार किया जाए।
अब आयोग की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
इस याचिका के बाद अब सबसे बड़ा सवाल है कि राज्य मानवाधिकार आयोग इस मांग पर क्या रुख अपनाता है और संबंधित सरकारी विभागों से क्या जवाब सामने आता है। यदि इस मामले में आयोग स्तर पर सुनवाई और विभागीय जवाब की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो औपनिवेशिक दौर के कानूनों की प्रासंगिकता को लेकर नई बहस छिड़ सकती है।
हालांकि इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारतीय दंड संहिता 1860, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हो चुके हैं। इसी तरह भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 को 2013 के कानून ने प्रतिस्थापित कर दिया था और 1878 के आर्म्स एक्ट की जगह 1959 का आर्म्स एक्ट लागू है।
इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं का मूल सवाल बरकरार है—क्या आजाद भारत की कानून व्यवस्था को पूरी तरह आधुनिक, न्यायसंगत और नागरिकों के अधिकारों के अनुरूप बनाने के लिए अब एक व्यापक समीक्षा की जरूरत नहीं है? हरिद्वार से उठी यह कानूनी आवाज अब कितना बड़ा रूप लेती है, इस पर सबकी निगाहें रहेंगी।



