पतंजलि विश्वविद्यालय में आज प्राच्य विद्या का महाकुंभ! राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन करेंगे 52वें सम्मेलन का उद्घाटन स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण करेंगे राज्यपाल का स्वागत, 4 से 5 हजार संस्कृत विद्वानों के जुटने की संभावना; प्राचीन शास्त्रों की प्रामाणिकता पर होगा मंथन, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

पतंजलि विश्वविद्यालय में आज प्राच्य विद्या का महाकुंभ! राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन करेंगे 52वें सम्मेलन का उद्घाटन
स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण करेंगे राज्यपाल का स्वागत, 4 से 5 हजार संस्कृत विद्वानों के जुटने की संभावना; प्राचीन शास्त्रों की प्रामाणिकता पर होगा मंथन, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में आज 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का भव्य शुभारंभ होने जा रहा है। सुबह 9:30 बजे आयोजित होने वाले उद्घाटन समारोह में महामहिम राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे और सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। योगगुरु स्वामी रामदेव और पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण जी महाराज द्वारा राज्यपाल का स्वागत किया जाएगा। भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य और प्राचीन शास्त्रों के अध्ययन को लेकर आयोजित इस सम्मेलन पर देशभर के विद्वानों की निगाहें टिकी हैं।
देश-विदेश के विद्वानों और संतों का लगेगा जमावड़ा
आयोजकों के अनुसार, सम्मेलन में देश-विदेश के संस्कृत विद्वानों, धर्माचार्यों, शंकराचार्यों के प्रतिनिधियों और विभिन्न संप्रदायों के संतों के शामिल होने की संभावना है। आयोजन में लगभग 4 से 5 हजार संस्कृत विद्वानों तथा सैकड़ों आध्यात्मिक प्रतिनिधियों की भागीदारी प्रस्तावित है। इतनी बड़ी संख्या में विद्वानों और आध्यात्मिक प्रतिनिधियों की संभावित मौजूदगी के चलते पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजन को लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं।
कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति कुलपति डॉ. साध्वी देवप्रिया, अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन की महासचिव प्रो. कविता होले, संयुक्त सचिव प्रो. शिवानी वी. सहित अनेक विद्वानों और पदाधिकारियों के शामिल होने की जानकारी दी गई है।
प्राचीन शास्त्रों की प्रामाणिकता पर होगा मंथन
सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष प्राचीन भारतीय ग्रंथों और शास्त्रों के प्रामाणिक अध्ययन से जुड़ा है। इसमें संस्कृत साहित्य, भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन धर्मग्रंथों के मूल स्वरूप को समझने पर चर्चा की जाएगी। शास्त्रों में कथित प्रक्षेपों की पहचान, प्राचीन ग्रंथों की प्रमाणिकता और उनकी विभिन्न व्याख्याओं की समीक्षा जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहेंगे।आयोजकों का कहना है कि सम्मेलन का उद्देश्य राजनीतिक बहस से अलग रहकर शास्त्रों का अध्ययन, शोध और प्रमाण-आधारित विमर्श आगे बढ़ाना है। ऐसे में सम्मेलन के दौरान सामने आने वाले निष्कर्ष और विद्वानों के विचार विशेष महत्व रखेंगे।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, आयोजन पर रहेगी नजर
सम्मेलन में बड़ी संख्या में अतिथियों, विद्वानों और संतों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। कार्यक्रम को व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं।
अब सभी की निगाहें सम्मेलन के उद्घाटन और उसके बाद होने वाले शास्त्रीय विमर्श पर टिकी हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन और संस्कृत साहित्य की प्रामाणिकता को लेकर होने वाली चर्चाएं इस आयोजन को खास बना सकती हैं।



