पिरान कलियर उर्स में कथित ‘वसूली का खेल’! सड़क किनारे करीब 30 अस्थाई दुकानों पर बड़ा सवाल, लाखों की रकम की अवैध वसूली की चर्चा,, दरगाह प्रशासन ने दुकानों से किया किनारा तो फिर किसके इशारे पर सज गया पूरा बाजार? झंडा होटल के सामने से फव्वारा चौक तक सड़क के दोनों किनारों पर तथाकथित गेस्ट हाउस संचालक पर बिना टेंडर दुकानें लगवाने और मोटी रकम वसूलने के आरोप की चर्चा,, अब कार्रवाई किस स्तर पर होगी, अब प्रशासन को लेकर अगली कड़ी का इन्तजार
प्रशासन चाहे तो कुछ घंटों में खुल सकता है पूरा ‘वसूली कांड’

पिरान कलियर उर्स में कथित ‘वसूली का खेल’! सड़क किनारे करीब 30 अस्थाई दुकानों पर बड़ा सवाल, लाखों की रकम की अवैध वसूली की चर्चा,,
दरगाह प्रशासन ने दुकानों से किया किनारा तो फिर किसके इशारे पर सज गया पूरा बाजार? झंडा होटल के सामने से फव्वारा चौक तक सड़क के दोनों किनारों पर तथाकथित गेस्ट हाउस संचालक पर बिना टेंडर दुकानें लगवाने और मोटी रकम वसूलने के आरोप की चर्चा,,
अब कार्रवाई किस स्तर पर होगी, अब प्रशासन को लेकर अगली कड़ी का इन्तजार

पिरान कलियर। आस्था, जायरीनों की भीड़ और सालाना उर्स की व्यवस्थाओं के बीच पिरान कलियर में सड़क किनारे लगाई गई अस्थाई दुकानों को लेकर कथित अवैध वसूली का मामला गरमाता जा रहा है। झंडा होटल के सामने से लेकर दरगाह फव्वारा चौक तक सड़क के दोनों ओर दर्जनों अस्थाई मेला दुकानें लगाई गई हैं। आरोप है कि इन दुकानों को किसी स्पष्ट सार्वजनिक टेंडर प्रक्रिया के बिना लगवाया गया और दुकानदारों से दुकान के आकार एवं स्थान के हिसाब से मोटी रकम वसूली जा रही है।
मामले का सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यही है कि जब दरगाह प्रशासन इन दुकानों को अपनी ओर से लगाए जाने से इनकार कर रहा है, तो आखिर इन दुकानों को लगाने और कथित किराया वसूलने का अधिकार किसने दिया?
स्थानीय स्तर पर करीब 30 दुकानों की चर्चा है। दुकानदारों के बीच कथित तौर पर करीब 1300 रुपये प्रति वर्गफीट तक की दर की चर्चा होने की बात सामने आ रही है। यदि इस दर और दुकानों के वास्तविक क्षेत्रफल की पुष्टि होती है तो कथित वसूली लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि रकम की वास्तविक पुष्टि और भुगतान का पूरा हिसाब प्रशासनिक जांच का विषय है।
दरगाह प्रशासन का इनकार… फिर कौन है इस गली के ‘मेला बाजार’ का मालिक?
पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी दरगाह प्रशासन का कथित इनकार है। जब इन अस्थाई दुकानों को लेकर सवाल किया गया तो बताया गया कि दुकानें दरगाह प्रशासन की ओर से नहीं लगाई गई हैं।
यहीं से पूरा मामला रहस्य बन जाता है।
अगर दरगाह प्रशासन ने दुकानें नहीं लगाईं तो फिर सड़क के दोनों ओर दुकानें किसकी अनुमति से लगीं?
अगर किसी अन्य विभाग ने अनुमति दी है तो वह आदेश कहां है?
अगर कोई ठेका दिया गया है तो टेंडर की प्रति कहां है?
ठेकेदार कौन है?
कितनी रकम में ठेका हुआ?
कितने क्षेत्रफल में दुकानें लगाने की अनुमति दी गई?
और सबसे बड़ा सवाल—दुकानदारों से पैसा लेने वाला आखिर कौन है?
इन सवालों के जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है क्योंकि सरकारी अथवा सार्वजनिक स्थानों के व्यावसायिक इस्तेमाल में पारदर्शी अनुमति और अधिकृत प्रक्रिया का सवाल सीधे जुड़ा होता है।

तथाकथित गेस्ट हाउस संचालक का नाम चर्चा में, आरोप बेहद गंभीर
स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस कथित व्यवस्था के पीछे एक तथाकथित गेस्ट हाउस संचालक का नाम चर्चा में बताया जा रहा है।
आरोप है कि इसी व्यक्ति के स्तर से झंडा होटल के सामने से फव्वारा चौक तक सड़क के दोनों ओर अस्थाई दुकानें लगवाई गईं और दुकानदारों से कथित तौर पर मोटी रकम किराये अथवा दुकान लगाने के नाम पर वसूली जा रही है।
हालांकि संबंधित व्यक्ति की भूमिका और रकम वसूली के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि प्रशासन संबंधित व्यक्ति का पक्ष भी सामने लाए और उससे पूछा जाए कि उसके पास दुकानें लगाने और रकम वसूलने का कौन सा वैध अधिकार अथवा दस्तावेज मौजूद है।
यदि उसके पास वैध टेंडर या अनुमति है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है तो फिर प्रशासन को यह पता लगाना होगा कि किसके संरक्षण अथवा अनुमति से यह पूरा इंतजाम खड़ा हुआ।

1300 रुपये प्रति वर्गफीट की चर्चा ने बढ़ाया मामला
सबसे ज्यादा चर्चा कथित 1300 रुपये प्रति वर्गफीट की दर को लेकर है। यह रकम वास्तव में कितनी है और किन दुकानों से ली गई है, इसका अभी आधिकारिक सत्यापन नहीं हुआ है।
लेकिन यदि दुकानदारों से वास्तव में इस प्रकार की दर पर रकम ली जा रही है तो करीब 30 दुकानों के हिसाब से रकम का आंकड़ा छोटा नहीं होगा।
यही वजह है कि अब केवल मौखिक पूछताछ से मामला साफ नहीं होगा। प्रशासन को मौके पर पहुंचकर दुकानदारों के ब्यान लेने चाहिए।
किससे कितने रुपये लिए गए?
किसने लिए?
क्या रसीद दी गई?
रसीद पर किस संस्था या व्यक्ति का नाम है?
रकम नकद ली गई या ऑनलाइन?
क्या किसी सरकारी खाते में पैसा जमा हुआ?
इन सवालों के जवाब कथित वसूली की पूरी तस्वीर सामने ला सकते हैं।
टेंडर प्रक्रिया पर भी बड़ा सवाल—दस्तावेज सामने आएं
दरगाह से जुड़े विभिन्न ठेकों में निविदा प्रक्रिया अपनाए जाने के सार्वजनिक रिकॉर्ड मौजूद हैं। जनवरी 2026 में दरगाह से जुड़े 19 ठेकों के लिए टेंडर आमंत्रित किए जाने और पांच ठेकों के स्वीकृत होने की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई थी।
ऐसे में वर्तमान अस्थाई दुकानों को लेकर यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या इन दुकानों के लिए भी कोई वैध टेंडर, ठेका या अनुमति जारी हुई है?
यदि हुई है तो उसे सामने लाने में देरी क्यों?
और यदि कोई टेंडर नहीं हुआ है तो फिर निजी स्तर पर दुकानें लगाने की अनुमति किस आधार पर दी गई?
यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक जांच जरूरी हो जाती है।
उर्स की आस्था के बीच कथित वसूली ने व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया
पिरान कलियर में उर्स केवल एक स्थानीय आयोजन नहीं है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों और विदेशों से भी जायरीन पहुंचते हैं। ऐसे में उर्स के दौरान दुकानें लगाने की व्यवस्था भी पारदर्शी और व्यवस्थित होनी चाहिए।
यदि कोई अधिकृत ठेका है तो दुकानदारों को निर्धारित शुल्क और नियमों की जानकारी मिलनी चाहिए।
लेकिन यदि किसी निजी व्यक्ति द्वारा बिना स्पष्ट अनुमति के दुकानें लगवाकर रकम वसूली जा रही है, तो यह गंभीर सवाल है।
उर्स की आड़ में किसी भी प्रकार की कथित निजी वसूली को सामान्य व्यवस्था मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रशासन चाहे तो कुछ घंटों में खुल सकता है पूरा ‘वसूली कांड’
इस मामले में प्रशासन को लंबी जांच की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए। मौके पर टीम भेजी जाए और हर दुकान का सत्यापन कराया जाए।
दुकानों की संख्या गिनी जाए।
क्षेत्रफल नापा जाए।
दुकानदारों के बयान लिए जाएं।
रकम वसूली की जानकारी ली जाए।
रसीदें जांची जाएं।
टेंडर और अनुमति पत्र मांगे जाएं।
और जिस व्यक्ति पर रकम वसूलने के आरोप हैं, उससे लिखित रूप में पूछा जाए कि वह किस अधिकार के तहत यह रकम ले रहा है।
यदि दस्तावेज सही मिलते हैं तो आरोपों पर विराम लग जाएगा। लेकिन यदि कोई वैध दस्तावेज नहीं मिलता और कथित वसूली के प्रमाण सामने आते हैं तो जिम्मेदारी तय करना प्रशासन का काम होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल—किसका संरक्षण या किसकी अनुमति?
मामला अब केवल दुकानों का नहीं है। सवाल यह है कि अगर दरगाह प्रशासन ने दुकानें नहीं लगाईं, तो फिर सड़क के दोनों ओर यह पूरा अस्थाई बाजार किसके आदेश पर खड़ा हुआ?
क्या किसी अधिकारी को इसकी जानकारी थी?
क्या स्थानीय प्रशासन ने आंखें बंद कर रखी थीं?
क्या संबंधित विभाग ने कोई अनुमति दी?
या फिर किसी निजी व्यक्ति ने खुद ही सार्वजनिक स्थान पर दुकानें लगवाकर कथित वसूली शुरू कर दी?
इन सवालों का जवाब अब जांच से ही मिल सकता है।
यदि आरोप झूठे हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ होनी चाहिए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो सिर्फ दुकानें हटाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कथित रकम वसूली, अनुमति प्रक्रिया और इसमें शामिल लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
पिरान कलियर के उर्स में आस्था के नाम पर किसी भी कथित ‘वसूली के खेल’ को लेकर अब प्रशासन की परीक्षा है।
दस्तावेज सामने आएं, टेंडर सामने आए, अनुमति सामने आए और अगर कुछ भी नहीं है तो कार्रवाई सामने आए।
क्योंकि सवाल सिर्फ 30 दुकानों का नहीं है—सवाल यह है कि उर्स की भीड़ के बीच सड़क किनारे कथित तौर पर लाखों की वसूली का रास्ता किसने खोला?
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। जांच होगी तो सच सामने आएगा—कौन अधिकृत है और कौन कथित तौर पर उर्स की आड़ में निजी कमाई का खेल चला रहा है।



