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प्लेट में चिकन या एंटीबायोटिक का खतरा? सस्ता प्रोटीन कहीं सेहत पर भारी न पड़ जाए! ब्रॉयलर चिकन में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर उठे सवाल,, 40 दिन में बाजार तक पहुंचने वाले चिकन की तेज ग्रोथ ने बढ़ाई चिंता—अनुचित एंटीबायोटिक इस्तेमाल से ‘साइलेंट खतरा’ बन सकता है AMR, जनहित में उपभोक्ताओं को जागरूक रहने की जरूरत

प्लेट में चिकन या एंटीबायोटिक का खतरा? ब्रॉयलर चिकन को लेकर उठे गंभीर सवाल! जनहित की अपील,- खाने की थाली में स्वाद जरूरी है, लेकिन उससे पहले सुरक्षा जरूरी है। एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल रोकना सिर्फ सरकार या पोल्ट्री उद्योग की जिम्मेदारी नहीं—यह पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

प्लेट में चिकन या एंटीबायोटिक का खतरा? सस्ता प्रोटीन कहीं सेहत पर भारी न पड़ जाए! ब्रॉयलर चिकन में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर उठे सवाल,,

40 दिन में बाजार तक पहुंचने वाले चिकन की तेज ग्रोथ ने बढ़ाई चिंता—अनुचित एंटीबायोटिक इस्तेमाल से ‘साइलेंट खतरा’ बन सकता है AMR, जनहित में उपभोक्ताओं को जागरूक रहने की जरूरत

नई दिल्ली। चिकन देश में सबसे ज्यादा खाए जाने वाले मांसाहारी खाद्य पदार्थों में शामिल है। सस्ता, आसानी से उपलब्ध और प्रोटीन से भरपूर होने के कारण बड़ी आबादी इसे अपनी डाइट का हिस्सा बनाती है। लेकिन ब्रॉयलर चिकन के तेजी से बढ़ने और पोल्ट्री फार्म में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को लेकर सामने आ रहे सवालों ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि ब्रॉयलर चिकन सामान्य मुर्गी से कम समय में बड़ा कैसे हो जाता है, बल्कि सवाल यह है कि उसकी तेज ग्रोथ के लिए क्या-क्या इस्तेमाल किया जा रहा है और क्या खाद्य सुरक्षा के नियमों का पूरी तरह पालन हो रहा है?

40 दिन में तैयार—आखिर कैसे?

ब्रॉयलर मुर्गियों को विशेष रूप से ऐसी नस्ल और फीड के साथ पाला जाता है, जिससे वे कम समय में बाजार के वजन तक पहुंच सकें। यही वजह है कि उनका विकास पारंपरिक मुर्गियों की तुलना में काफी तेज होता है।

तेजी से वजन बढ़ने के कारण कुछ पक्षियों में पैरों और चलने-फिरने से संबंधित समस्याएं देखी जा सकती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर ब्रॉयलर मुर्गी अस्वस्थ होती है।

असली खतरा चिकन नहीं, एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल!

जनहित में सबसे महत्वपूर्ण बात एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी AMR है। यदि पशुओं में एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक, गलत या अत्यधिक इस्तेमाल किया जाए, तो बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो सकते हैं।

फिर यही प्रतिरोधी बैक्टीरिया मनुष्यों तक पहुंचने पर ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जहां सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं संक्रमण के इलाज में अपेक्षित असर न करें।

यानी खतरा यह नहीं कि “हर चिकन में एंटीबायोटिक है”, बल्कि खतरा यह है कि कहीं नियमों की अनदेखी करके एंटीबायोटिक का इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा।

‘विथड्रॉल पीरियड’ की अनदेखी बनी तो चिंता गंभीर

जिन पशुओं को कुछ दवाएं दी जाती हैं, उनके उत्पाद को बाजार में भेजने से पहले निर्धारित withdrawal period का पालन जरूरी होता है, ताकि दवा के अवशेष सुरक्षित सीमा तक कम हो सकें।

यदि कोई उत्पाद निर्धारित अवधि से पहले बाजार में पहुंचता है, तो यह खाद्य सुरक्षा का गंभीर सवाल बन सकता है। इसलिए पोल्ट्री फार्म से लेकर सप्लाई चेन और बाजार तक निगरानी बेहद जरूरी है।

जनता के लिए जरूरी संदेश

उपभोक्ताओं को घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन आंखें बंद करके किसी भी वायरल दावे पर भरोसा करना भी सही नहीं है। चिकन को अच्छी तरह पकाकर खाना, स्वच्छता का ध्यान रखना और विश्वसनीय स्रोत से खाद्य पदार्थ खरीदना जरूरी है।

वहीं सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है कि पोल्ट्री फार्मों में दवाओं के इस्तेमाल, खाद्य पदार्थों में अवशेष और नियमों के पालन की नियमित जांच सुनिश्चित करें।

चिकन खाना है या टोफू, राजमा और चना जैसे पौध-आधारित प्रोटीन लेना है—फैसला व्यक्ति का है। लेकिन एक बात साफ है: मुनाफे के लिए अगर एंटीबायोटिक नियमों से खिलवाड़ हुआ, तो इसकी कीमत सिर्फ उपभोक्ता नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी पड़ सकती है।

जनहित की अपील,-

खाने की थाली में स्वाद जरूरी है, लेकिन उससे पहले सुरक्षा जरूरी है। एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल रोकना सिर्फ सरकार या पोल्ट्री उद्योग की जिम्मेदारी नहीं—यह पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।

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