सोलर लाइट प्रकरण में दोनों अधिकारियों ने खोली अपनी बात, बोले—“लाइटें खरीदी थीं, गांव में रखी थीं और अब आठों लग चुकी हैं” तत्कालीन DPRO मौ. मुस्तफा खान ने भुगतान के दबाव से किया इनकार-बोले-“भुगतान के लिए मैंने कोई दबाव नहीं बनाया” निलंबित अनुज शर्मा बोले—“आरोप निराधार, मुझे अपना पक्ष रखने का मौका मिले”दोनों अधिकारियों की मांग—रिकॉर्ड से हो पूरी जांच
सोलर लाइट कांड में नया अपडेट! आठ लाइटों ने खोली ‘घोटाले’ की नई कहानी....दबाव’ के आरोप पर मुस्तफा खान का पलटवार तत्कालीन DPRO मौ. मुस्तफा खान बोले—“घोटाला कहां हुआ?” निलंबित अनुज शर्मा ने भी माना—“लाइट खरीदी थी, पंचायत घर के पास रखी थी, अब आठों लग चुकी हैं”अब जांच की असली कसौटी—कागज नहीं, टाइमलाइन!अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि लाइटें लगीं या नहीं… सवाल यह है कि भुगतान के वक्त फाइल में क्या लिखा था और जमीन पर क्या था?

सोलर लाइट प्रकरण में दोनों अधिकारियों ने खोली अपनी बात, बोले—“लाइटें खरीदी थीं, गांव में रखी थीं और अब आठों लग चुकी हैं”
तत्कालीन DPRO मौ. मुस्तफा खान ने भुगतान के दबाव से किया इनकार-बोले-“भुगतान के लिए मैंने कोई दबाव नहीं बनाया” निलंबित अनुज शर्मा बोले—“आरोप निराधार, मुझे अपना पक्ष रखने का मौका मिले”दोनों अधिकारियों की मांग—रिकॉर्ड से हो पूरी जांच

हरिद्वार। सोलर लाइटों की खरीद और ₹1.48 लाख के भुगतान को लेकर चल रहे विवाद में अब तत्कालीन जिला पंचायत राज अधिकारी मौ. मुस्तफा खान और निलंबित ग्राम पंचायत विकास अधिकारी अनुज शर्मा दोनों का पक्ष सामने आया है। दोनों अधिकारियों ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की जांच दस्तावेजों, भुगतान रिकॉर्ड और जियो-टैगिंग के आधार पर किए जाने की बात कही है।
तत्कालीन DPRO मौ. मुस्तफा खान ने साफ कहा कि “जब आठों लाइटें खरीदी गईं, गांव में पहुंचीं और अब लग भी चुकी हैं, तो घोटाला कहां हुआ?” वहीं अनुज शर्मा का कहना है कि लाइटें खरीदी गई थीं, कुछ समय पंचायत घर के पास रखी गईं और स्थान चिन्हित होने के बाद उन्हें स्थापित कर दिया गया।
मुस्तफा खान बोले—“मेरी जानकारी में लाइटें गांव में मौजूद थीं”
तत्कालीन DPRO मौ. मुस्तफा खान ने अपने पक्ष में कहा कि संबंधित ग्राम पंचायत में आठ सोलर लाइटें खरीदी गई थीं और वे पंचायत घर के पास रखी हुई थीं। बाद में सभी लाइटों को अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए जाने की जानकारी उनके सामने आई।
उनका कहना है कि उन्होंने लाइटों के इंस्टॉलेशन का वीडियो भी मंगवाया है, जिसमें आठों लाइटों के लगाए जाने की जानकारी सामने आती है।मुस्तफा खान ने कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी योजना में लाइटों का प्रस्ताव बनाया गया था, उसे घोटाला नहीं कहा जा सकता। उनके अनुसार ग्राम पंचायत स्तर पर गांव की जरूरत के हिसाब से GPDP में योजनाएं प्रस्तावित की जाती हैं।
“भुगतान के लिए मैंने कोई दबाव नहीं बनाया”
अपने ऊपर लगाए गए भुगतान के दबाव के आरोपों को मुस्तफा खान ने स्पष्ट रूप से खारिज किया।
उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत एक स्वतंत्र संस्था है और प्रधान तथा ग्राम पंचायत विकास अधिकारी की संयुक्त भूमिका से भुगतान प्रक्रिया पूरी होती है। ऑनलाइन भुगतान में संबंधित अधिकारियों की स्वीकृति और डिजिटल प्रक्रिया होती है।
उनका तर्क है कि ऐसी स्थिति में उनके द्वारा व्यक्तिगत रूप से किसी अधिकारी पर भुगतान का दबाव बनाए जाने के आरोप को भुगतान प्रक्रिया और डिजिटल रिकॉर्ड से जांचा जाना चाहिए।
अनुज शर्मा बोले—“लाइटें खरीदी थीं, पंचायत घर के पास रखी थीं”
निलंबित ग्राम पंचायत विकास अधिकारी अनुज शर्मा ने भी अपने ऊपर लगे आरोपों पर अपना पक्ष रखा।
उन्होंने बताया कि ग्राम पंचायत में सोलर लाइटें खरीदी गई थीं और पंचायत घर के पास रखी गई थीं। उनके अनुसार लाइट लगाने के स्थान को लेकर पहले योजना बनाई गई और बाद में चिन्हित स्थानों पर लाइटें स्थापित की गईं।
अनुज शर्मा ने बताया कि लाइटों की खरीद सितंबर में हुई थी, जबकि उनका प्रस्ताव जून में तैयार किया गया था। उन्होंने दावा किया कि लाइटें अब स्थापित हो चुकी हैं और उनके पास जियो-टैगिंग फोटो भी मौजूद हैं।
“अगर लाइटें मौजूद थीं तो मुझे दोषी कैसे माना गया?”
अनुज शर्मा ने अपने निलंबन को लेकर कहा कि वह अपना पक्ष विभाग के सामने रखना चाहते हैं। उनके मुताबिक उन्हें निलंबन संबंधी पत्र प्राप्त होने के बाद ही वह आगे की कानूनी और विभागीय प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखेंगे।
उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का वास्तविक परीक्षण दस्तावेजों और मौके की स्थिति से किया जाना चाहिए।
दबाव के आरोप पर अनुज शर्मा का अलग दावा
अनुज शर्मा ने बातचीत में कहा कि भुगतान से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने के दौरान उन पर कार्रवाई और FIR का दबाव बनाया गया था। उनका दावा है कि कुछ दस्तावेज पहले से तैयार थे और उनसे उन पर हस्ताक्षर कराए गए।
दूसरी ओर मुस्तफा खान ने भी अपने बयान में दावा किया कि अनुज शर्मा से दबाव में बयान लिए जाने की परिस्थितियों की जांच होनी चाहिए।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले में मूल दस्तावेज, बयान की तारीख, हस्ताक्षर की परिस्थितियां और संबंधित अधिकारियों के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
दोनों अधिकारियों की मांग—रिकॉर्ड से हो पूरी जांच
इस पूरे प्रकरण में दोनों अधिकारियों के बयानों से एक बात स्पष्ट है कि वे अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और अपने पक्ष में दस्तावेजी जांच की बात कर रहे हैं।
अब जांच में यह देखा जाना महत्वपूर्ण होगा कि—
- सोलर लाइटों की खरीद कब हुई?
- प्रस्ताव कब तैयार हुआ?
- भुगतान किस तारीख को हुआ?
- भुगतान से पहले कौन-सा सत्यापन किया गया?
- लाइटें ग्राम पंचायत में कब पहुंचीं?
- उनका इंस्टॉलेशन कब हुआ?
- जियो-टैगिंग किस तारीख की है?
- भुगतान प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों की डिजिटल स्वीकृति थी?
“आठ लाइटें लगी हैं तो फिर विवाद की असली वजह क्या?”
पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि दोनों अधिकारियों के अनुसार सोलर लाइटें खरीदी गई थीं और अब आठों लाइटें स्थापित हैं।
ऐसे में पूरे प्रकरण का निष्पक्ष निष्कर्ष निकालने के लिए केवल किसी एक बयान के आधार पर कार्रवाई या क्लीनचिट देने के बजाय खरीद से लेकर भुगतान और इंस्टॉलेशन तक की पूरी टाइमलाइन सामने आना जरूरी है।
तत्कालीन DPRO मौ. मुस्तफा खान अपने ऊपर लगाए गए भुगतान के दबाव के आरोप को गलत बता रहे हैं, जबकि निलंबित अनुज शर्मा अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताते हुए अपना पक्ष रखने की बात कह रहे हैं।
अब गेंद विभागीय जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के पाले में है। यदि दस्तावेज और जियो-टैगिंग दोनों अधिकारियों के दावों की पुष्टि करते हैं, तो पूरे मामले की तस्वीर पहले सामने आई कहानी से अलग हो सकती है।

सोलर लाइट प्रकरण: प्रशासनिक और विधिक पक्ष पर उठे सवाल
वित्तीय अधिकार, जांच की प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका पर बहस तेज
हरिद्वार। सोलर लाइट खरीद और भुगतान से जुड़े विवाद में अब मामला केवल लाइटों की खरीद या भुगतान तक सीमित नहीं रह गया है। ग्राम पंचायत की वित्तीय प्रक्रिया, अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र, जांच की निष्पक्षता तथा कर्मचारियों और ग्राम प्रधानों पर कथित दबाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
1. ग्राम पंचायत की वित्तीय प्रक्रिया और संयुक्त जिम्मेदारी
पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत एक स्थानीय स्वशासी संस्था के रूप में कार्य करती है। पंचायत स्तर पर होने वाले वित्तीय लेन-देन, भुगतान और खरीद की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत ग्राम प्रधान तथा ग्राम पंचायत विकास अधिकारी/सचिव की भूमिका से जुड़ी होती है।
इसी आधार पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि सोलर लाइटों की खरीद, बिल और भुगतान ग्राम पंचायत स्तर पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत हुए, तो जिला पंचायती राज अधिकारी की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत वित्तीय भूमिका क्या थी?
पूर्व डीपीआरओ मौ. मुस्तफा खान के पक्ष से यह तर्क सामने रखा गया है कि किसी विशिष्ट सामग्री की खरीद, बिलिंग अथवा भुगतान ग्राम पंचायत की निर्धारित वित्तीय प्रक्रिया के अनुसार होता है और डीपीआरओ की भूमिका प्रत्यक्ष भुगतानकर्ता की नहीं होती।
2. एक दिवसीय जांच की प्रक्रिया पर सवाल
प्रकरण में की गई जांच की अवधि और उसके आधार पर हुई कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
आरोप है कि जहां पूर्व में विभिन्न शिकायतों पर लंबे समय तक कार्रवाई नहीं हुई, वहीं इस मामले में अपेक्षाकृत तेजी दिखाई गई। संबंधित पक्ष का कहना है कि केवल एक दिन के निरीक्षण अथवा सीमित अवधि की जांच के आधार पर किसी अधिकारी की भूमिका निर्धारित करना उचित नहीं माना जा सकता।
हालांकि, जांच की वैधता और निष्पक्षता का अंतिम निर्धारण संबंधित जांच अभिलेखों, उपलब्ध साक्ष्यों और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
3. कर्मचारियों और ग्राम प्रधानों पर दबाव का आरोप
मामले में कुछ कर्मचारियों और ग्राम प्रधानों पर कथित दबाव बनाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
संबंधित पक्ष का दावा है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई अथवा निलंबन के डर के कारण कर्मचारियों से ऐसे बयान या शिकायतों पर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं, जिनकी स्वतंत्रता पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह जांच की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर प्रश्न होगा। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कर्मचारियों के स्वतंत्र बयान सामने आना आवश्यक है।
4. न्यायिक मामलों के बीच प्रशासनिक कार्रवाई
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू न्यायिक प्रक्रिया भी है। संबंधित पक्ष का कहना है कि स्थानांतरण और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं तथा कुछ मामलों में अंतरिम राहत प्राप्त हुई है।
ऐसी स्थिति में प्रशासनिक स्तर पर होने वाली किसी भी कार्रवाई को न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित आदेशों के अनुरूप होना आवश्यक है। अंतिम न्यायिक निर्णय आने से पहले किसी भी पक्ष की स्थिति को अंतिम निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
5. असली सवाल: जिम्मेदारी किसकी और प्रक्रिया क्या थी?
सोलर लाइट प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि—
- खरीद का निर्णय किस स्तर पर हुआ?
- क्रय आदेश किसने जारी किया?
- बिल किसके नाम से बने?
- भुगतान किस स्तर से स्वीकृत हुआ?
- ग्राम पंचायत के अभिलेखों में क्या दर्ज है?
- लाइटों की वास्तविक स्थापना कब हुई?
- निरीक्षण के समय और वर्तमान स्थिति में क्या अंतर है?
- डीपीआरओ की भूमिका नियमों के तहत कितनी थी?
- जांच में किन अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए गए?
- क्या सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला?
निष्कर्ष
सोलर लाइट प्रकरण को केवल किसी एक अधिकारी के खिलाफ आरोप के रूप में देखने के बजाय पूरी वित्तीय प्रक्रिया और दस्तावेजी रिकॉर्ड की जांच के आधार पर देखा जाना चाहिए।
यदि खरीद और भुगतान ग्राम पंचायत स्तर की निर्धारित प्रक्रिया के तहत हुए हैं, तो प्रत्येक स्तर की वास्तविक जिम्मेदारी दस्तावेजों से तय होनी चाहिए। वहीं यदि जांच में किसी अधिकारी की प्रत्यक्ष भूमिका सामने आती है तो उसका भी तथ्यात्मक परीक्षण आवश्यक है।
फिलहाल विवाद का केंद्र यही है कि क्या कार्रवाई वास्तविक वित्तीय अनियमितता के दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित है या जांच की प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय करने के तरीके पर ही गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।



