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1984 के सिख विरोधी दंगों के 42 साल बाद हरिद्वार से उठा इंसाफ का सवाल! राज्य मानवाधिकार आयोग पहुंची याचिका, प्रभावित परिवारों के लिए सरकारी नौकरी और मुआवजे की मांग….. भदौरिया एडवोकेट एसोसिएट ने मुख्य सचिव से लेकर DGP तक को बनाया पक्षकार; प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रोजगार, ₹5 लाख अतिरिक्त सहायता, पेंशन और पुनर्वास की जांच कराने की मांग, जनपदवार बनेगी सत्यापन समिति

हरिद्वार। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में निर्दोष सिख नागरिकों के विरुद्ध हुई हिंसा का दर्द आज भी हजारों परिवारों के लिए पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आर्थिक सहायता और रोजगार का सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इसी मुद्दे को लेकर हरिद्वार के अधिवक्ताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों से प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने, सरकारी सहायता की वास्तविक स्थिति सामने लाने और प्रत्येक पात्र परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की गई है।

यह याचिका अरुण कुमार भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, सुमेधा भदौरिया एडवोकेट पत्नी अनिरुद्ध प्रताप सिंह, चेतन भदौरिया (LLB अध्ययनरत), शाहनवाज मलिक (LLB अध्ययनरत) तथा रेखा पांडेय एडवोकेट की ओर से दायर की गई है। याचिका में उत्तराखंड शासन के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह, प्रमुख सचिव समाज कल्याण, प्रमुख सचिव अल्पसंख्यक कल्याण तथा पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड को विपक्षी पक्षकार बनाया गया है।

याचिका में क्या उठाया गया है सवाल?

याचिकाकर्ताओं ने आयोग को अवगत कराया है कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के कई हिस्सों में सिख समुदाय के विरुद्ध व्यापक हिंसा हुई थी। इस हिंसा में हजारों निर्दोष लोगों की जान गई और महिलाओं तथा बच्चों को गंभीर पीड़ा का सामना करना पड़ा। अनेक परिवारों की संपत्ति, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा पूरी तरह प्रभावित हुई। याचिका में इसे भारतीय लोकतंत्र, मानव गरिमा और नागरिकों के जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकारों पर गंभीर आघात बताया गया है।

याचिका के अनुसार वर्ष 1984 में उत्तराखंड का क्षेत्र तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा था। ऐसे में वर्तमान उत्तराखंड के विभिन्न जनपदों में रहने वाले सिख परिवार भी इस हिंसा से प्रभावित हुए थे। कुछ परिवारों के सदस्यों की मृत्यु अन्य राज्यों में हुई, जबकि उनके परिजन वर्तमान उत्तराखंड में निवास करते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन सभी परिवारों की वास्तविक स्थिति और उन्हें मिली सरकारी सहायता का विस्तृत आकलन आज तक स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है।

2006 और 2014 के राहत पैकेज का भी उठाया मुद्दा

याचिका में केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा 16 जनवरी 2006 को घोषित पुनर्वास पैकेज का उल्लेख किया गया है। इसके तहत दंगों में मृत्यु होने पर मृतक के परिवार को 3.50 लाख रुपये की अनुग्रह सहायता, घायल व्यक्तियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार 1.25 लाख रुपये तक की सहायता तथा मृतकों की विधवाओं और वृद्ध माता-पिता के लिए 2,500 रुपये प्रतिमाह पेंशन का प्रावधान होने की बात कही गई है।

इसके अतिरिक्त वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने प्रभावित परिवारों के लिए पांच लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता देने का निर्णय लिया था। याचिका के मुताबिक 16 दिसंबर 2014 को वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों में मारे गए प्रत्येक पात्र व्यक्ति के निकटतम कानूनी वारिस को पहले से निर्धारित सहायता के अतिरिक्त पांच लाख रुपये देने का फैसला किया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि आखिर उत्तराखंड के कितने प्रभावित परिवारों को इन योजनाओं का वास्तविक लाभ मिला और कितने परिवार आज भी सरकारी सहायता से वंचित हैं।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट का भी हवाला

याचिका में बताया गया है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने वर्ष 2021 में उत्तराखंड सहित देश के नौ राज्यों से वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों से संबंधित मृतकों, घायलों, दर्ज मुकदमों, मुआवजे और प्रभावित परिवारों की विस्तृत जानकारी मांगी थी। 30 अक्टूबर 2024 को समाचार पत्रों में प्रकाशित जानकारी का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि उत्तराखंड भी उन राज्यों में शामिल था, जहां प्रभावित परिवारों के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की नीति अपनाए जाने का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया।

याचिका में कहा गया है कि जिन परिवारों ने अपने कमाने वाले सदस्य पिता, पति या पुत्र को खोया, उनके सामने आज भी आर्थिक संकट, बच्चों की शिक्षा, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। केवल एकमुश्त आर्थिक सहायता देना प्रभावित परिवारों के दीर्घकालिक पुनर्वास का पर्याप्त विकल्प नहीं हो सकता।

सरकारी नौकरी और विशेष भर्ती नीति की मांग

राज्य मानवाधिकार आयोग से प्रमुख मांग की गई है कि वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों से प्रभावित प्रत्येक पात्र परिवार के एक सदस्य को उसकी योग्यता के अनुसार सरकारी नौकरी उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार को निर्देशित किया जाए।

यदि परिवार का पात्र सदस्य मृत्यु अथवा अधिक आयु के कारण भर्ती की शर्तें पूरी नहीं कर पाता है तो परिवार के अन्य पात्र सदस्य को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक पुनर्वास का अवसर दिया जाए। इसके लिए विशेष पुनर्वास एवं भर्ती नीति तैयार करने, आयु सीमा में उचित छूट देने और विशेष भर्ती अभियान चलाने की मांग भी की गई है।

मृतकों, मुआवजे और पेंशन का मांगा पूरा हिसाब

याचिका में राज्य सरकार से यह भी स्पष्ट रिपोर्ट मांगे जाने की मांग की गई है कि उत्तराखंड क्षेत्र में वर्ष 1984 की हिंसा के दौरान कितने सिख नागरिकों की मृत्यु हुई और वर्तमान उत्तराखंड के कितने निवासियों के परिजनों की मृत्यु दूसरे राज्यों में हुई थी। प्रत्येक परिवार का जनपदवार और परिवारवार विवरण तैयार कराया जाए।

इसके साथ ही वर्ष 2006 के पैकेज के तहत 3.50 लाख रुपये तथा वर्ष 2014 के निर्णय के अनुसार अतिरिक्त पांच लाख रुपये की सहायता मिलने या नहीं मिलने की जांच हो। जिन पात्र परिवारों को सहायता नहीं मिली है, उनके अभिलेखों और साक्ष्यों का सत्यापन कर भुगतान कराया जाए। विधवाओं और वृद्ध माता-पिता को निर्धारित पेंशन मिली या नहीं, इसकी भी जांच कराने की मांग की गई है।

हर जिले में बनेगी विशेष सत्यापन समिति

याचिकाकर्ताओं ने प्रत्येक जनपद में विशेष सत्यापन समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है। इसमें जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और प्रभावित सिख समुदाय के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की गई है। समिति प्रभावित परिवारों की पहचान, कानूनी उत्तराधिकारियों, मुआवजे, पेंशन और पुनर्वास संबंधी दावों का सत्यापन करे।

याचिका में वर्ष 2006 और 2014 की योजनाओं के क्रियान्वयन पर राज्य स्तर पर हुई कार्रवाई का भी पूरा ब्यौरा मांगा गया है। यदि कोई पात्र परिवार लाभ से वंचित रह गया है तो उसके कारणों की जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है।

अब इस मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग के समक्ष रखी गई मांगों पर आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर प्रभावित परिवारों और सिख समुदाय की निगाहें टिकी हैं। चार दशक से अधिक पुराने इस मामले को लेकर हरिद्वार से उठी यह कानूनी पहल उत्तराखंड में वर्ष 1984 के दंगों से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और अधिकारों पर एक बार फिर महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रही है।

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