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साबरी गेस्ट मे अवैध कब्जे पर तहरीर, वर्षों पुराने कब्जे पर खामोशी-मौ. रफी के कथित अवैध कब्जे पर चुप्पी क्यों? कमरा नंबर 16 पर करीब दस माह से कथित कब्जे को लेकर दरगाह प्रशासन ने दी तहरीर, ताला तोड़ने और सामान खुर्द-बुर्द करने के आरोप; अब वर्षों से दक्षिणी गेट परिसर के भवन पर कथित अवैध कब्जे को लेकर उठे बड़े सवाल,, एक मामले में पुलिस तक पहुंची शिकायत, दूसरे मामले में वर्षों से कार्रवाई क्यों नहीं? मौ. रफी को कथित संरक्षण किसका— दरगाह के संसाधनों के इस्तेमाल की रिकवरी का भी मुद्दई सवाल 

साबरी गेस्ट हाउस के कमरा नंबर-16 को लेकर दरगाह प्रशासन की पुलिस से शिकायत के बाद गरमाया मामला—मौ. रफी के कथित पुराने कब्जे को लेकर उठे सवाल, आखिर किसके इशारे पर चल रहा है संरक्षण का खेल?

साबरी गेस्ट मे अवैध कब्जे पर तहरीर, वर्षों पुराने कब्जे पर खामोशी-मौ. रफी के कथित अवैध कब्जे पर चुप्पी क्यों?

कमरा नंबर 16 पर करीब दस माह से कथित कब्जे को लेकर दरगाह प्रशासन ने दी तहरीर, ताला तोड़ने और सामान खुर्द-बुर्द करने के आरोप; अब वर्षों से दक्षिणी गेट परिसर के भवन पर कथित अवैध कब्जे को लेकर उठे बड़े सवाल,,

एक मामले में पुलिस तक पहुंची शिकायत, दूसरे मामले में वर्षों से कार्रवाई क्यों नहीं? मौ. रफी को कथित संरक्षण किसका— दरगाह के संसाधनों के इस्तेमाल की रिकवरी का भी मुद्दई सवाल 

कलियर। पिरान कलियर स्थित दरगाह साबरी गेस्ट हाउस के कमरों पर कथित कब्जे का मामला अब पुलिस की चौखट तक पहुंच चुका है। खबर सामने आने के बाद दरगाह प्रशासन की ओर से कोतवाली कलियर में तहरीर देकर कार्रवाई की मांग किए जाने से मामले ने तूल पकड़ लिया है। तहरीर में कमरों का ताला तोड़ने, सामान खुर्द-बुर्द करने और दरगाह संपत्ति पर अनधिकृत कब्जे जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

लेकिन इसी कार्रवाई ने अब एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या दरगाह की संपत्तियों को लेकर कार्रवाई का पैमाना सभी के लिए एक जैसा है? एक ओर कमरा नंबर 16 पर कथित कब्जे को लेकर प्रशासन पुलिस तक पहुंच गया, वहीं दूसरी ओर आरोप है कि मौ. रफी वर्षों से दरगाह के दक्षिणी गेट परिसर स्थित एक भवन पर कथित रूप से कब्जा जमाए हुए है। यदि यह आरोप सही है तो सवाल सिर्फ कब्जे का नहीं, बल्कि उस कब्जे पर वर्षों तक आंखें मूंदे रहने वाली व्यवस्था का भी है।

एक मामले में तहरीर, दूसरे में वर्षों की खामोशी— कार्रवाई का यह कैसा पैमाना?

प्राप्त जानकारी के अनुसार मौ. रफी मूल रूप से जिला मुरादाबाद का निवासी बताया जा रहा है। आरोप है कि उसने दरगाह के दक्षिणी गेट परिसर स्थित एक भवन पर लंबे समय से कथित रूप से कब्जा कर रखा है।

स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मौ. रफी दरगाह परिसर के एक कमरे में लंबे समय से रह रहा है और वहां दरगाह की बिजली, पानी तथा अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल भी करता रहा है। आरोप यह भी है कि उसके पास वहां रहने अथवा दरगाह की संपत्तियों और संसाधनों का इस्तेमाल करने का कोई वैध अधिकार नहीं है। ऐसे में सवाल सीधा है—यदि कब्जा अवैध है तो वर्षों से कमरा खाली क्यों नहीं कराया गया? और यदि कब्जा वैध है तो दरगाह प्रशासन उसके पक्ष में मौजूद अनुमति, आवंटन आदेश या अन्य दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं करता?vयही वह बिंदु है जहां पूरे मामले में कथित दोहरी नीति की चर्चा तेज हो गई है।

मौ. रफी को किसका संरक्षण? सवाल इसलिए गंभीर

दरगाह संपत्ति पर कथित वर्षों पुराने कब्जे को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर मौ. रफी के पीछे किसका संरक्षण है? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आई है कि किसी बड़े अधिकारी के कथित मौखिक आदेश से संबंधित एक वीडियो वायरल हुआ था। हालांकि वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और उसके वास्तविक संदर्भ की जांच आवश्यक है।

लेकिन यदि ऐसा कोई वीडियो मौजूद है तो उसकी सत्यता, समय, संदर्भ और उसमें दिखाई देने वाले व्यक्तियों की भूमिका की जांच क्यों न हो? पुलिस और प्रशासन के लिए यह जांच का विषय होना चाहिए कि क्या किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति के कथित मौखिक निर्देश के कारण दरगाह की संपत्ति से संबंधित कार्रवाई रोकी गई थी। कानून अगर कमरा नंबर 16 के लिए लागू है तो वही कानून मौ. रफी के कथित कब्जे पर भी लागू होना चाहिए। यही निष्पक्ष प्रशासन की असली कसौटी है।

दस माह बनाम वर्षों का सवाल—किस कब्जे पर कितनी तेजी?

कमरा नंबर 16 को लेकर करीब दस माह से कथित कब्जे की बात सामने आई है। इस मामले में दरगाह प्रशासन ने पुलिस को तहरीर दे दी है। लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मौ. रफी से जुड़ा कथित कब्जा वर्षों पुराना है। तो फिर सवाल उठता है—यदि दस महीने पुराने कथित कब्जे पर पुलिस कार्रवाई की मांग हो सकती है, तो वर्षों पुराने कथित कब्जे पर कार्रवाई की फाइल कहां है?

क्या उस मामले में कोई जांच हुई? क्या कोई नोटिस जारी हुआ? क्या कब्जा खाली कराने का आदेश हुआ? यदि आदेश हुआ तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ? क्या दरगाह की संपत्ति पर रहने वाले व्यक्ति से बिजली-पानी का खर्च वसूल किया गया? और यदि नहीं किया गया तो दरगाह को हुए संभावित आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी किसकी तय होगी? इन सवालों के जवाब अब दरगाह प्रशासन, संबंधित अधिकारियों और वक्फ बोर्ड को देने चाहिए।

ताला टूटने की जांच हो तो पुराने कब्जे की फाइल भी खुले

साबरी गेस्ट हाउस के कमरों का ताला तोड़े जाने और सामान खुर्द-बुर्द किए जाने के आरोप गंभीर हैं। पुलिस को इस मामले में निष्पक्ष जांच करनी चाहिए कि कमरों के ताले किसने खोले, किस परिस्थिति में खोले गए और अंदर मौजूद सामान का क्या हुआ। लेकिन उसी निष्पक्षता के साथ दरगाह की अन्य संपत्तियों पर कथित पुराने कब्जों की भी जांच होनी चाहिए। यदि दरगाह संपत्ति सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति के रूप में संरक्षित है तो उसकी सुरक्षा और निगरानी महज कागजों पर नहीं हो सकती। दरगाह प्रशासन को संपत्तियों की सूची, आवंटन की स्थिति, किराया, कब्जे की अवधि और संबंधित आदेशों का रिकॉर्ड स्पष्ट रखना होगा।

यदि किसी भवन या कमरे पर वर्षों से कथित कब्जा था तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं?यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं थी तो संपत्ति प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?इन सवालों का जवाब प्रशासनिक जांच से ही सामने आ सकता है।

बिजली-पानी का हिसाब भी हो, सिर्फ कमरा खाली कराना काफी नहीं

शिकायतकर्ताओं की मांग है कि यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने बिना वैध अधिकार के दरगाह परिसर में रहकर बिजली, पानी अथवा अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल किया, तो सिर्फ कमरा खाली कराने तक मामला सीमित न रहे।

अब तक इस्तेमाल किए गए संसाधनों का रिकॉर्ड तैयार कर नियमानुसार रिकवरी की प्रक्रिया भी तय की जाए। दरगाह की संपत्ति किसी निजी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं हो सकती। यदि संपत्ति का इस्तेमाल नियमों के विरुद्ध हुआ है तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

अब वक्फ बोर्ड और प्रशासन की अग्नि परीक्षा 

पूरे मामले में अब निगाहें प्रशासन और वक्फ बोर्ड पर टिकी हैं। सवाल यह नहीं है कि किसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और किसके खिलाफ नहीं।

सवाल यह है कि क्या सभी के लिए एक ही नियम लागू होगा?

कमरा नंबर 16 की शिकायत पर पुलिस कार्रवाई की मांग हो रही है तो वर्षों से कथित कब्जे के आरोपों की फाइल भी खुलनी चाहिए। पुराने आदेश, जांच रिपोर्ट, शिकायतें, आवंटन रिकॉर्ड और कथित वायरल वीडियो—सबकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि मौ. रफी के पास वैध अनुमति है तो उसे सामने रखा जाए और विवाद खत्म किया जाए। यदि अनुमति नहीं है और कब्जा अवैध पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई हो।

कानून की किताब किसके लिए बंद है?

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दरगाह संपत्ति पर कार्रवाई की कानूनी किताब सिर्फ कुछ मामलों में खुलती है और कुछ प्रभावशाली मामलों में बंद हो जाती है? यदि कमरा नंबर 16 पर कथित कब्जा गंभीर है तो वर्षों से चले आ रहे कथित कब्जे को भी गंभीरता से लेना होगा।दरगाह प्रशासन यदि वास्तव में अपनी संपत्तियों को अतिक्रमण और दुरुपयोग से बचाना चाहता है तो उसे चुनिंदा कार्रवाई नहीं, समान कार्रवाई करनी होगी।

फिलहाल कमरा नंबर 16 पर दी गई तहरीर ने एक पुरानी और बड़ी बहस को फिर सामने ला दिया है—दरगाह की संपत्ति पर कथित कब्जे के मामलों में कार्रवाई का पैमाना क्या है और वर्षों से कथित रूप से काबिज लोगों के लिए वही नियम कब लागू होगा? अब गेंद पुलिस, प्रशासन और वक्फ बोर्ड के पाले में है। या तो सभी मामलों में कानून समान रूप से चलेगा, या फिर दोहरे मापदंड के आरोप और गहरे होंगे।

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