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पसमांदा मुस्लिम कौन हैं, जिन्हें प्रभावित करने की कोशिश में भाजपा? मुस्लिम समाज के पिछड़े और दलित तबके को कहा जाता है पसमांदा, लंबे समय से सामाजिक हिस्सेदारी और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा यह वर्ग,, ‘पसमांदा’ फारसी शब्द, जिसका अर्थ है ‘पीछे छूटा हुआ’; भाजपा की राजनीति में भी इस वर्ग पर बढ़ा फोकस

पसमांदा मुस्लिम कौन हैं, जिन्हें प्रभावित करने की कोशिश में भाजपा?

मुस्लिम समाज के पिछड़े और दलित तबके को कहा जाता है पसमांदा, लंबे समय से सामाजिक हिस्सेदारी और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा यह वर्ग,,

‘पसमांदा’ फारसी शब्द, जिसका अर्थ है ‘पीछे छूटा हुआ’; भाजपा की राजनीति में भी इस वर्ग पर बढ़ा फोकस

नई दिल्ली। भारत की राजनीति में मुस्लिम समाज के भीतर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके को लेकर चर्चा लगातार तेज होती रही है। इसी क्रम में इन दिनों पसमांदा मुस्लिम शब्द राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता से सामने आता है। भाजपा भी लंबे समय से पसमांदा मुस्लिमों तक अपनी पहुंच बढ़ाने और उन्हें राजनीतिक रूप से जोड़ने की कोशिश करती रही है।

‘पसमांदा’ फारसी शब्द है, जिसका अर्थ ‘पीछे छूटा हुआ’ या ‘पिछड़ा हुआ’ माना जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और देश के कई अन्य हिस्सों में मुस्लिम समाज की पिछड़ी और दलित पृष्ठभूमि वाली जातियों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।

मुस्लिम समाज में भी सामाजिक स्तरों का विभाजन

पसमांदा आंदोलन से जुड़े संगठनों और कई अध्ययनों में मुस्लिम समाज को सामाजिक स्तरों और बिरादरियों में विभाजित बताया गया है। आम तौर पर मुस्लिम समाज के उच्च सामाजिक समूहों को ‘अशरफ’ और पिछड़े व दलित तबकों को ‘अजलाफ’ तथा ‘अरजाल’ जैसे वर्गों के रूप में संदर्भित किया जाता है।

अशरफ वर्ग में सैयद, शेख, पठान, मुगल सहित कई बिरादरियों को शामिल किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों की सामाजिक स्थिति मुस्लिम समाज के भीतर अपेक्षाकृत ऊंची मानी जाती रही है।

इसके विपरीत बड़ी संख्या में ऐसे मुस्लिम समुदाय हैं जिनकी सामाजिक पृष्ठभूमि भारतीय उपमहाद्वीप की पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों से जुड़ी रही है। इन्हीं समुदायों को व्यापक रूप से पसमांदा मुस्लिम कहा जाता है।

धर्म से अलग सामाजिक पहचान का सवाल

पसमांदा आंदोलन का प्रमुख तर्क यह रहा है कि मुस्लिम समाज को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर एकसमान मानना पर्याप्त नहीं है। इस वर्ग का कहना है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक असमानताएं मौजूद हैं।

पसमांदा संगठनों की राजनीति में शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं।

करीब एक सदी पुराना है पसमांदा आंदोलन

पसमांदा राजनीति की जड़ें नई नहीं हैं। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में मुस्लिम समाज के पिछड़े तबकों की सामाजिक हिस्सेदारी को लेकर आवाजें उठनी शुरू हुई थीं। बाद में अलग-अलग क्षेत्रों में पिछड़े मुस्लिम समुदायों ने संगठित होकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक पहचान के लिए आंदोलन किए।

1990 के दशक में ‘पसमांदा’ शब्द और आंदोलन को नई राजनीतिक पहचान मिली। 1998 के आसपास पसमांदा संगठनों ने इसे व्यापक सामाजिक-राजनीतिक पहचान के तौर पर आगे बढ़ाया। इसके बाद उत्तर भारत की राजनीति में पसमांदा मुद्दा लगातार चर्चा में आता गया।

भाजपा क्यों साध रही पसमांदा मुस्लिमों को?

भाजपा की ओर से पसमांदा मुस्लिमों तक पहुंच बनाने की कोशिश को मुस्लिम समाज के भीतर सामाजिक विविधता को राजनीतिक रूप से संबोधित करने की रणनीति के तौर पर देखा जाता है। पार्टी नेताओं की ओर से कई बार यह तर्क दिया गया है कि मुस्लिम समाज में पिछड़े और गरीब वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना जरूरी है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पसमांदा वर्ग को साधने की कोशिश का एक बड़ा कारण यह भी है कि मुस्लिम समाज को एक समान राजनीतिक समूह के बजाय अलग-अलग सामाजिक वर्गों में देखने की रणनीति भाजपा के लिए नए राजनीतिक समीकरण बनाने का रास्ता खोल सकती है।

पसमांदा राजनीति में प्रतिनिधित्व सबसे बड़ा मुद्दा

पसमांदा नेताओं की ओर से लंबे समय से सवाल उठाया जाता रहा है कि मुस्लिम समाज की आबादी में पिछड़े और दलित समुदायों की बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद राजनीति, शिक्षा, सरकारी नौकरियों और नेतृत्व के स्तर पर उनका प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम क्यों है।

यही वजह है कि पसमांदा आंदोलन केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में सामाजिक न्याय, समान अवसर और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दे भी हैं।

भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह वर्ग?

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में मुस्लिम मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में मुस्लिम समाज के भीतर सामाजिक आधार पर अलग-अलग समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश का चुनावी महत्व भी है।

भाजपा की पसमांदा रणनीति को इसी व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। हालांकि पसमांदा समुदाय के भीतर भी राजनीतिक विचार और प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। इसलिए इस वर्ग को किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थक मानना भी सही नहीं होगा।

पसमांदा मुस्लिम मूल रूप से मुस्लिम समाज के उन पिछड़े, अति पिछड़े और दलित सामाजिक समूहों के लिए इस्तेमाल होने वाली व्यापक पहचान है, जो सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। यही वर्ग अब देश की चुनावी राजनीति में भी महत्वपूर्ण राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।

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