वक्फ बोर्ड में बड़ा फेरबदल, मौ. आरिफ पदमुक्त (छोटा कद-बडी छलांग),, एक महीने के कार्यकाल पर भी गंभीर सवाल, तुगलकी फैसलों की चर्चाओ से भी बढ़े सवाल,, करीबी दोस्ती निभा गए तत्कालीन साहब गिरधर सिंह रावत को सौंपी गई कमान, अब नये सीईओ और दरगाह साबिर दरबार की व्यवस्थाओं पर रहेगा फोकस,, छोटा कद बड़ी छलांग: एक अध्याय समाप्त, नये सीईओ गिरधार सिंह रावत नई जिम्मेदारी की भी शुरुआत

इन्तजार रजा हरिद्वार- वक्फ बोर्ड में बड़ा फेरबदल, मौ. आरिफ पदमुक्त (छोटा कद-बडी छलांग),,
एक महीने के कार्यकाल पर भी गंभीर सवाल, तुगलकी फैसलों की चर्चाओ से भी बढ़े सवाल,, करीबी दोस्ती निभा गए तत्कालीन साहब
गिरधर सिंह रावत को सौंपी गई कमान, अब नये सीईओ और दरगाह साबिर दरबार की व्यवस्थाओं पर रहेगा फोकस,,
छोटा कद बड़ी छलांग: एक अध्याय समाप्त, नये सीईओ गिरधार सिंह रावत नई जिम्मेदारी की भी शुरुआत
हरिद्वार। उत्तराखंड शासन ने बड़ा प्रशासनिक निर्णय लेते हुए के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) मौहम्मद आरिफ को पद से हटा दिया है। 25 फरवरी को जारी शासनादेश में 12 जनवरी को दिए गए अतिरिक्त प्रभार के आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया गया कि बोर्ड के कार्यों के समयबद्ध और सुचारू संचालन के लिए अग्रिम आदेश तक गिरधर सिंह रावत, अपर सचिव अल्पसंख्यक कल्याण, को मुख्य कार्यपालक अधिकारी का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा जाता है।
मोहम्मद आरिफ पहले से ही में अधिशासी अधिकारी के रूप में तैनात थे और उन्हें 12 जनवरी को वक्फ बोर्ड का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। लेकिन महज लगभग एक महीने के कार्यकाल में ही उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे थे। शासन के इस निर्णय को प्रशासनिक हलकों में एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
एक महीने का कार्यकाल और सवालो की लंबी सूची, करीबी दोस्ती निभा गए तत्कालीन साहब
मौ. आरिफ का कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन विवादों के लिहाज से काफी लंबा साबित हुआ। अपने सीमित समय में कई ऐसी गबन जैसी फाइलों से दरकिनार हुए , जिन्हें कर्मचारियों और संबंधित पक्षों ने “तुगलकी फरमान” तक करार दिया।
सूत्रों के अनुसार, दरगाह की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के बजाय कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां ऐसे व्यक्तियों को सौंप दी गईं जिन पर पहले से आरोप लगे हुए थे। इससे न केवल बोर्ड की साख पर असर पड़ा बल्कि जमीनी स्तर पर कामकाज भी प्रभावित हुआ।

प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि “छोटा कद, बड़ी छलांग” की तर्ज पर अचानक सीईओ बनाए गए मौ. आरिफ को मानक ग्रेड से ऊपर उठाकर जिम्मेदारी दी गई थी। मगर अपेक्षाओं के विपरीत उनका कार्यकाल उपलब्धियों की बजाय सवालों से घिर गया।
दरगाह साबिर दरबार की व्यवस्थाओं पर नहीं दिखा फोकस
वक्फ बोर्ड के अधीन आने वाली प्रमुख धार्मिक संपत्तियों में से एक है पिरान कलियर स्थित । यह दरगाह देशभर के अकीदतमंदों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है।
आरोप है कि मौ. आरिफ ने अपने कार्यकाल में दरगाह की व्यवस्थाओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। भीड़ प्रबंधन, साफ-सफाई, राजस्व पारदर्शिता और व्यवस्थागत सुधार जैसे मुद्दे जस के तस बने रहे।
स्थानीय लोगों और कर्मचारियों के बीच यह चर्चा रही कि प्रशासनिक ऊर्जा सुधारात्मक कदमों की बजाय आदेशों और पदस्थापनों में अधिक खर्च हुई। दरगाह की आय-व्यय प्रणाली को पारदर्शी बनाने और लंबित मामलों को सुलझाने की दिशा में ठोस पहल नजर नहीं आई।
शासन का सख्त संदेश: व्यवस्था सर्वोपरि
25 फरवरी को शासन द्वारा जारी आदेश में साफ शब्दों में कहा गया कि बोर्ड के कार्यों को समयबद्ध और सुचारू रूप से संचालित किए जाने की आवश्यकता है। यही कारण है कि अतिरिक्त प्रभार निरस्त कर दिया गया। अब गिरधर सिंह रावत को अग्रिम आदेश तक सीईओ का दायित्व सौंपा गया है। प्रशासनिक अनुभव और विभागीय समझ को देखते हुए शासन ने यह जिम्मेदारी उन्हें दी है। बोर्ड से जुड़े सूत्रों का मानना है कि नई नियुक्ति के साथ ही व्यवस्थाओं में पारदर्शिता और अनुशासन की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
क्या बदलेगी दरगाह साबिर कलियरी की तस्वीर?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नए सीईओ के नेतृत्व में वक्फ बोर्ड और दरगाह की व्यवस्थाओं में वास्तविक सुधार देखने को मिलेगा?
वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, आय के पारदर्शी उपयोग, लंबित जांचों की निष्पक्ष प्रगति और धार्मिक स्थलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था—ये सभी मुद्दे अब नई प्रशासनिक टीम के सामने हैं। दरगाह साबिर दरबार की व्यवस्था केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। ऐसे में बोर्ड की कार्यशैली पर सीधे तौर पर जनभावनाओं का प्रभाव पड़ता है।
छोटा कद बड़ी छलांग: एक अध्याय समाप्त, नये सीईओ गिरधार सिंह रावत नई जिम्मेदारी की भी शुरुआत
मोहम्मद आरिफ का कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन उसने कई सवाल छोड़ दिए हैं। शासन के त्वरित हस्तक्षेप ने यह संकेत दिया है कि वक्फ बोर्ड जैसे संवेदनशील संस्थान में लापरवाही या विवादों की गुंजाइश नहीं है।
अब निगाहें गिरधर सिंह रावत साहब पर टिकी हैं कि वे किस तरह से प्रशासनिक सख्ती, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ बोर्ड को नई दिशा देते हैं। दरगाह साबिर दरबार की व्यवस्थाओं से लेकर वक्फ संपत्तियों के संरक्षण तक—हर मोर्चे पर ठोस कदम उठाने की चुनौती सामने है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह बदलाव महज औपचारिक है या फिर वास्तव में सुधार की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगा।



