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राज्य क्षत्रिय आयोग की मांग को लेकर मानवाधिकार आयोग पहुंचा भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की उठाई मांग,, “जाति के आधार पर आर्थिक स्थिति का अनुमान उचित नहीं”, क्षत्रिय समाज के कमजोर, किसान, श्रमिक, बेरोजगार और पूर्व सैनिक परिवारों के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग

राज्य क्षत्रिय आयोग की मांग को लेकर मानवाधिकार आयोग पहुंचा भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण की उठाई मांग,,

“जाति के आधार पर आर्थिक स्थिति का अनुमान उचित नहीं”, क्षत्रिय समाज के कमजोर, किसान, श्रमिक, बेरोजगार और पूर्व सैनिक परिवारों के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग

हरिद्वार/देहरादून। उत्तराखंड में क्षत्रिय समाज की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और रोजगार संबंधी स्थिति का तथ्यात्मक अध्ययन कराने तथा राज्य में “राज्य क्षत्रिय आयोग” के गठन की दिशा में कदम उठाने की मांग को लेकर हरिद्वार के अधिवक्ताओं ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून में याचिका दायर की है। 21 अगस्त 2026 को दायर इस याचिका में मुख्य सचिव उत्तराखंड सरकार, प्रमुख सचिव समाज कल्याण विभाग तथा प्रमुख सचिव गृह विभाग को विपक्षी बनाया गया है।

याचिका अरुण कुमार भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट, सुमेधा भदोरिया एडवोकेट तथा एलएलबी अध्ययनरत चेतन भदोरिया की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि क्षत्रिय समाज को केवल जातिगत पहचान के आधार पर एक समान आर्थिक वर्ग मानना उचित नहीं है। समाज में ऐसे अनेक परिवार हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर, निर्धन, बेरोजगार, ग्रामीण, किसान, श्रमिक अथवा पूर्व सैनिक परिवारों से संबंधित हैं और शिक्षा तथा रोजगार के पर्याप्त अवसरों से वंचित रह सकते हैं।याचिका में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धाराओं 12, 13, 17 और 18 के तहत आयोग से इस मामले में प्रारंभिक जांच कर आवश्यक अनुशंसा करने का आग्रह किया गया है।

राज्य गठन के बाद से अब तक व्यापक अध्ययन हुआ या नहीं, मांगी रिपोर्ट

याचिकाकर्ताओं ने राज्य मानवाधिकार आयोग से यह रिपोर्ट मांगने का आग्रह किया है कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तक क्षत्रिय समाज की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति को लेकर राज्य सरकार ने कोई व्यापक सर्वेक्षण, अध्ययन या रिपोर्ट तैयार की है अथवा नहीं।

यदि ऐसा कोई व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है तो याचिका में राज्य सरकार को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की अनुशंसा करने की मांग की गई है। प्रस्तावित समिति में समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, विधि, शिक्षा, रोजगार और मानवाधिकार क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है।

समिति को उत्तराखंड के प्रत्येक जिले से तथ्य और आंकड़े एकत्र करने, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने, शिक्षा और उच्च शिक्षा में भागीदारी का आकलन करने तथा रोजगार और बेरोजगारी से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन करने का दायित्व देने की मांग की गई है।

सरकारी योजनाओं की पहुंच और मानवाधिकार शिकायतों का भी हो अध्ययन

याचिका में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का तथ्यात्मक संकलन, कौशल विकास एवं स्वरोजगार की स्थिति का अध्ययन, सरकारी योजनाओं तक पहुंच का मूल्यांकन और मानवाधिकार संबंधी शिकायतों का तथ्यात्मक संकलन करने की मांग भी की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने संबंधित सरकारी विभागों से रिपोर्ट प्राप्त करने तथा स्वतंत्र शोध और सर्वेक्षण कराने की मांग की है। उनका कहना है कि अध्ययन के आधार पर राज्य सरकार को वार्षिक रिपोर्ट और नीतिगत सुझाव दिए जा सकते हैं, जिससे समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

“दूसरे संवैधानिक आयोगों के अधिकारों पर कोई सवाल नहीं”

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए संविधान के अनुच्छेद 338, 338ए और 338बी के तहत स्थापित संवैधानिक आयोगों के अस्तित्व या अधिकारों पर कोई प्रश्न नहीं उठाया गया है और न ही उनके अधिकारों को कम करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार मांग केवल इतनी है कि क्षत्रिय समाज के संबंध में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार एवं मानवाधिकार से जुड़ी वास्तविक समस्याओं का तथ्याधारित अध्ययन कराने के लिए उपयुक्त संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम में मानवाधिकारों को जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से जुड़े अधिकारों के रूप में परिभाषित किया गया है। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने आर्थिक एवं सामाजिक अवसरों से वंचित लोगों की स्थिति का निष्पक्ष अध्ययन आवश्यक बताया है।

उत्तराखंड में क्षत्रिय समाज की कितनी आबादी? आधिकारिक अलग आंकड़ा उपलब्ध नहीं

याचिका के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल क्षत्रिय समाज की आबादी को लेकर भी उठता है। उपलब्ध जनगणना-2011 के सार्वजनिक आधिकारिक आंकड़ों में उत्तराखंड के लिए क्षत्रिय/राजपूत समुदाय की अलग से राज्यव्यापी जनसंख्या का प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। जनगणना के प्रकाशित आंकड़े अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे संवैधानिक वर्गों के लिए विस्तृत आंकड़े उपलब्ध कराते हैं।

इसलिए बिना किसी आधिकारिक सर्वेक्षण के क्षत्रिय समाज की निश्चित आबादी बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। यही बिंदु याचिका में प्रस्तावित जिला-वार सर्वेक्षण और तथ्य-संग्रह को महत्वपूर्ण बनाता है।

इतिहास में भी रही है योद्धा और सामाजिक नेतृत्व की भूमिका

उत्तराखंड के इतिहास में राजपूत/ठाकुर और विभिन्न क्षत्रिय परंपराओं से जुड़े शासक परिवारों, योद्धाओं और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका विभिन्न कालखंडों में दिखाई देती है। गढ़वाल और कुमाऊं के ऐतिहासिक राजवंशों ने लंबे समय तक क्षेत्रीय शासन व्यवस्था को प्रभावित किया। आधुनिक इतिहास में भी उत्तराखंड के लोगों ने ब्रिटिश शासन, बेगार, जंगल और स्थानीय अधिकारों से जुड़े आंदोलनों में भाग लिया।

स्वतंत्रता संघर्ष के संदर्भ में हरिद्वार के कुंजा बहादुरपुर विद्रोह का भी विशेष उल्लेख मिलता है। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार राजा विजय सिंह ने 1824 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया और आसपास के क्षेत्रों से लगभग एक हजार लोगों की सेना जुटाई थी। इस संघर्ष में बड़ी संख्या में लोगों ने बलिदान दिया। उपराष्ट्रपति के आधिकारिक वक्तव्य में उत्तराखंड के स्थानीय वीरों और संघर्षों के इतिहास को शोध के माध्यम से सामने लाने की आवश्यकता भी रेखांकित की गई थी।

वहीं उत्तराखंड के स्वतंत्रता आंदोलन में कुमाऊं और गढ़वाल के लोगों ने बेगार विरोध, जंगल अधिकार और राजनीतिक अधिकारों के आंदोलनों में भागीदारी की। ऐसे आंदोलनों में अलग-अलग सामाजिक समूहों की सामूहिक भूमिका रही, इसलिए किसी एक समुदाय के योगदान का आकलन भी प्रमाणित ऐतिहासिक शोध के आधार पर किया जाना जरूरी है।

अब आयोग के सामने रखी गई सात प्रमुख मांगें

याचिका में राज्य मानवाधिकार आयोग से प्रारंभिक जांच कराने, राज्य सरकार से क्षत्रिय समाज की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति से जुड़े सरकारी आंकड़े एवं रिपोर्ट तलब करने तथा वर्ष 2000 के बाद हुए किसी व्यापक अध्ययन की जानकारी मांगने का आग्रह किया गया है।

इसके साथ ही स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने, जिला-वार सामाजिक-आर्थिक अध्ययन कराने, रोजगार एवं शिक्षा की स्थिति का आकलन करने तथा समिति की रिपोर्ट के आधार पर उत्तराखंड राज्य क्षत्रिय आयोग के गठन की व्यवहार्यता पर राज्य सरकार को विचार करने की अनुशंसा करने की मांग की गई है।

अब इस याचिका पर राज्य मानवाधिकार आयोग की प्रारंभिक जांच और आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी। यदि आयोग इस विषय में अध्ययन या विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा करता है तो उत्तराखंड में पहली बार क्षत्रिय समाज की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और रोजगार संबंधी स्थिति को लेकर व्यापक तथ्यात्मक अध्ययन की राह खुल सकती है।

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